रोशनी के महापर्व दीपावली पर देश भर के अनगिनत घरों में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक पाना खरीदने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। आधुनिक बाजार में आज रंग-बिरंगे और आकर्षक डिजाइनों से सजे हुए अनगिनत पाना आसानी से मिल जाते हैं, जिन्हें आमतौर पर आधुनिक प्रिंटिंग मशीनों की मदद से थोक में तैयार किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर विचार किया है कि इन मशीनी उत्पादों से बिल्कुल अलग, एक बेहद खास पारंपरिक तरीके से भी लक्ष्मीजी का पाना तैयार होता है? इस पारंपरिक कला में किन अनोखी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है और मां लक्ष्मी के स्वरूप को इतना जीवंत व आकर्षक कैसे बनाया जाता है, इसके पीछे एक दिलचस्प और प्राचीन संस्कृति छिपी है।
बीकानेर की मथेरण चित्रकला का अनूठा संसार
राजस्थान के बीकानेर शहर में आज भी इस जिज्ञासा का उत्तर सदियों पुरानी मथेरण चित्रकला की प्राचीन परंपरा में सुरक्षित है। आधुनिक मशीनों का उपयोग करने के बजाय यहां के कुशल कलाकार अपने हाथों की बेहद बारीक कारीगरी से मां लक्ष्मी का पाना तैयार करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात यह है कि इसमें किसी भी प्रकार के केमिकल या कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, जमीन से मिलने वाले प्राकृतिक खनिजों और पारंपरिक सामग्रियों से ही तमाम रंग तैयार किए जाते हैं। यहां तक कि मां लक्ष्मी के आभूषणों और श्रृंगार का कार्य भी सीधे 22 कैरेट शुद्ध सोने के माध्यम से संपन्न किया जाता है।
पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत
शाही रियासत के काल से ही मंदिरों, ऐतिहासिक महलों, प्राचीन हवेलियों और आम नागरिकों के घरों की दीवारों को अपनी कला से सजाती आ रही मथेरण चित्रकला बीकानेर की बेहद समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा रही है। मथेरण या महात्मा समुदाय के पारंपरिक चित्रकार अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ मिलकर इस नायाब कला को लगातार आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। दीपावली के पर्व पर विशेष रूप से तैयार किए जाने वाले लक्ष्मीजी के ये पाना इसी गौरवशाली परंपरा की एक अनूठी और जीवित मिसाल हैं।
आस्था के साथ जुड़ी है शहर की पहचान
आज के दौर में जहां बाजारों में मिलने वाले अधिकांश पाना प्रिंटिंग मशीनों से बनते हैं और उनमें रासायनिक रंगों का खुलकर प्रयोग होता है, वहीं बीकानेर के कलाकार आज भी प्राकृतिक तत्वों, पारंपरिक विधियों और हाथों की नक्काशी पर भरोसा करते हैं। यह केवल एक तस्वीर को रंगने या उकेरने की कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही उस अमूल्य विरासत को संजोए रखने का गंभीर प्रयास है जिसमें गहरी आस्था के साथ-साथ बीकानेर की सांस्कृतिक अस्मिता भी पूरी तरह समाहित है.
गंगाजल और गुलाबजल का पवित्र उपयोग
जाने-माने चित्रकार रामकुमार भादाणी ने जानकारी देते हुए बताया कि लक्ष्मीजी का पाना बनाने का पवित्र कार्य हर साल पुष्य नक्षत्र के शुभ दिन से आरंभ किया जाता है। हाल ही में आए पुष्य नक्षत्र के अवसर पर इस वर्ष के नए पाने बनाने का कार्य शुरू कर दिया गया है। इसे तैयार करने के दौरान शुद्धता का बहुत अधिक ध्यान रखा जाता है। सामान्य पानी के स्थान पर इन रंगों को तैयार करने और घोलने के लिए पूरी तरह शुद्ध गंगाजल तथा गुलाबजल का ही प्रयोग किया जाता है।
प्राकृतिक खनिजों से बनते हैं पारंपरिक रंग
रामकुमार भादाणी ने आगे बताया कि इस पारंपरिक पाना की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता इसके प्राकृतिक रंग हैं। चित्रकारी में सफेद रंग की आवश्यकता पूरी करने के लिए कली का उपयोग किया जाता है, जबकि पीले रंग के लिए पेवड़ी काम में लाई जाती है। इसके अलावा, गहरा काला रंग प्राप्त करने के लिए शुद्ध देसी घी का दीपक जलाया जाता है और उससे निकलने वाले धुएं को विशेष रूप से एकत्र किया जाता है। इस एकत्रित धुएं में गुड़ का पानी मिलाकर एक खास मिश्रण तैयार किया जाता है, और इन्हीं पारंपरिक रंगों से मां लक्ष्मी के स्वरूप में बारीक चित्रकारी की जाती है।
22 कैरेट सोने से होता है माता का श्रृंगार
चित्रकार रामकुमार बताते हैं कि इन पानों में मां लक्ष्मी का श्रृंगार बेहद खास और पारंपरिक विधि से किया जाता है। इसके लिए अंबोजेरी की पुरानी तकनीक को अपनाया जाता है, जिसमें घड़े की मिट्टी को बारीक पीसकर उसमें गुड़ और गोंद मिलाया जाता है ताकि एक विशेष घोल तैयार किया जा सके। इस घोल के ऊपर सुनहरी मनोत का कार्य किया जाता है और अंत में सोने की परत चढ़ाई जाती है। इसके पश्चात, पूरे 22 कैरेट सोने का उपयोग करके मां लक्ष्मी का संपूर्ण श्रृंगार किया जाता है। माता को उनके पारंपरिक सोलह श्रृंगार से सुसज्जित किया जाता है, जिसमें सुंदर मुकुट, मोतियों का हार, भुजबंद, कंदोला, नथ, कड़े और पाजेब जैसी मनमोहक आकृतियां शामिल होती हैं।
चतुर्भुजी स्वरूप और जलते हुए अमृत कलश
कारीगर ने विस्तार से बताया कि इस पारंपरिक पाने में मां लक्ष्मी का अलौकिक चतुर्भुजी स्वरूप उकेरा जाता है। माता के नेत्र कमल के फूल के समान विशाल, भौहें धनुषाकार और मस्तक पर स्वर्ण मुकुट सुशोभित होता है। चित्र के दोनों तरफ दो सफेद हाथियों को दर्शाया जाता है, जिन्हें भारतीय संस्कृति में ऐश्वर्य और अपार समृद्धि का प्रतीक माना गया है। इन दोनों हाथियों की सूंड में अमृत कलश होता है और वे लगातार मां लक्ष्मी का जलाभिषेक करते हुए प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, हाथियों के शरीर पर नीले रंग की चुंदड़ी और उनके मस्तक पर हरे रंग का ओढ़ना भी बहुत खूबसूरती से दर्शाया जाता है।
पूरे साल बनी रहती है कलाकृति की मांग
रामकुमार भादाणी बताते हैं कि इस अनूठी कला की मांग केवल दीपावली के त्योहार तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि उनके पास पूरे सालभर ऑर्डर आते रहते हैं। सामान्यतः एक वर्ष के दौरान लगभग 108 लक्ष्मीजी के पाना तैयार किए जाते हैं। पुष्य नक्षत्र के अलावा महानिशा यानी महारात्रि के विशेष अवसर पर भी इन कलाकृतियों पर विशेष कार्य किया जाता है। धनतेरस से लेकर दीपावली के मुख्य पर्व तक ग्राहक स्वयं आकर अपने पाना प्राप्त करते हैं। इन कलाकृतियों का कोई भी निश्चित या निर्धारित मूल्य नहीं होता है, बल्कि कलाप्रेमी लोग अपनी स्वेच्छा और अगाध श्रद्धा के अनुसार कलाकारों को कीमत अर्पित करते हैं।

















