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कोंडागांव में देवी-देवताओं की भी लगती है अदालत, जानिए बस्तर की प्रसिद्ध भादोम जात्रा की परंपराछत्तीसगढ़
13 सित॰ 2026, 1:25 pm (40 मिनट पहले)· 0

कोंडागांव में देवी-देवताओं की भी लगती है अदालत, जानिए बस्तर की प्रसिद्ध भादोम जात्रा की परंपरा

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल अंतर्गत कोंडागांव में भादो महीने में भादोम जात्रा आयोजित होती है, जहां ग्रामीणों की शिकायत पर भंगाराम माई के दरबार में देवी-देवताओं को भी रिमांड और सजा का सामना करना पड़ता है।

छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में स्थित कोंडागांव जिले के आदिवासी समाज में देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था और अटूट विश्वास की परंपरा देखने को मिलती है। ग्रामीण अपनी छोटी से छोटी समस्या, बीमारी या मन्नत लेकर स्थानीय देवी-देवताओं की शरण में पहुंचते हैं। हालांकि, यदि मन्नत पूरी न हो या लोगों की तकलीफें दूर न हों, तो यह अनूठी परंपरा देवी-देवताओं से भी जवाबदेही तय करने का अवसर देती है। हर वर्ष भादो के महीने में एक विशेष आयोजन किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में भादो या भादोम जात्रा कहा जाता है। इस जात्रा के दौरान ग्रामीण अपने घरों और गांवों के देवी-देवताओं को एक साथ लेकर बाहर निकलते हैं।

कटघरे में देवी-देवता: जानिए रवानगी और अस्थायी जेल की प्रक्रिया

भादोम जात्रा के दौरान परेशान और पीड़ित ग्रामीण अपने गांव के देवी-देवताओं को भंगाराम माई के दरबार में लेकर पहुंचते हैं। ग्रामीणों द्वारा अपने देवी-देवताओं को गांव की सीमा से बाहर निकालने की इस पूरी प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर 'रवानगी' नाम दिया जाता है। रवानगी संपन्न होने के बाद, ग्रामीण अपने देवी-देवताओं के प्रतीकों को मंदिर परिसर के ठीक सामने स्थापित कर देते हैं। यह स्थान एक प्रकार की अस्थायी जेल के रूप में कार्य करता है। मंदिर समिति के अध्यक्ष ईश्वर कोर्राम के अनुसार, किसी भी देवी-देवता को अंतिम सजा सुनाए जाने से पहले इसी स्थान पर रिमांड पर रखा जाता है।

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सर्वोच्च अदालत जैसी सुनवाई और ईश्वर कोर्राम का वक्तव्य

भंगाराम माई के इस पावन दरबार की तुलना ग्रामीण किसी सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) से करते हैं। इस स्थल पर केवल सामान्य पेशी ही आयोजित नहीं होती, बल्कि पूरे नियमों के साथ अंतिम फैसला भी सुनाया जाता है। यदि सुनवाई के दौरान देवी-देवताओं पर लगे आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो उन्हें दंडित किया जाता है और मंदिर के समीप स्थित एक खुली जेल में कैद कर दिया जाता है। संचालन समिति के अध्यक्ष ईश्वर कोर्राम का कहना है कि जब गांव के लोगों की परेशानियां हल नहीं होती हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी प्रक्रिया के तहत खुद देवी-देवताओं को भी जवाबदेही के दायरे में लाया जाता है।

वार्षिक हिसाब-किताब और इतिहासकार घनश्याम नाग का विश्लेषण

स्थानीय इतिहासकार घनश्याम नाग इस अनूठी और पौराणिक प्रथा पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि देवी-देवताओं को भी इस देव अदालत की कड़ी कसौटी से गुजरना पड़ता है। उन्हें पूरे साल के दौरान किए गए कामकाज का विस्तृत हिसाब-किताब देना होता है। साल भर में ग्रामीणों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों का सामना करना पड़ता है और दोष सिद्ध होने पर तय सजा भी भुगतनी होती है। घनश्याम नाग आगे बताते हैं कि सजा पाए देवी-देवता बाद में अपने भक्तों या ग्रामीणों के सपने में आते हैं। सपने में मिलने वाले संदेश के पश्चात ही उनकी ससम्मान सम्मानजनक वापसी कराई जाती है। भंगाराम माई का यह दरबार बस्तर की उस जीवंत संस्कृति का प्रमाण है जहां न्याय के कटघरे में आम इंसान ही नहीं, बल्कि देवी-देवता भी खड़े नजर आते हैं।

नागपुर के डॉक्टर से बने 'डॉक्टर देव': बीमारी के इलाज की ऐतिहासिक कथा

भंगाराम माई के इस प्रांगण में केवल न्याय और सजा का काम ही नहीं होता, बल्कि यहाँ तरह-तरह की बीमारियों का आध्यात्मिक उपचार भी किया जाता है। इतिहासकार घनश्याम नाग ने इसके पीछे छिपे ऐतिहासिक संदर्भ का विस्तार से उल्लेख किया है। उनके अनुसार, अतीत में एक समय पूरे बस्तर अंचल में भीषण हैजा (कॉलेरा) की महामारी फैल गई थी। इस बीमारी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान जा रही थी और हाहाकार मचा हुआ था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन शासन द्वारा नागपुर से एक कुशल डॉक्टर को बस्तर भेजा गया।

नागपुर से आए उस डॉक्टर ने दिन-रात एक करके कठिन परिश्रम किया और पूरे बस्तर क्षेत्र को हैजा महामारी के प्रकोप से पूरी तरह मुक्त करा दिया। हालांकि, जब वह डॉक्टर अपना कर्तव्य पूरा करके वापस लौट रहे थे, तो दुर्भाग्यवश घाटी में एक सड़क दुर्घटना के दौरान उनकी अकाल मृत्यु हो गई। घनश्याम नाग के अनुसार, भंगाराम माई इस बात को अच्छी तरह जानती थीं कि वह डॉक्टर एक देवतुल्य आत्मा थे, जिन्होंने अपनी मेहनत से पूरे बस्तर को जीवनदान दिया था। इसलिए दुर्घटना के पश्चात डॉक्टर की पवित्र आत्मा को देवी-देवताओं की टोली में स्थान दे दिया गया।

उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई कि बस्तर के सभी 9 परगना के किसी भी गांव में यदि दोबारा हैजा या अन्य संक्रामक बीमारी फैलेगी, तो उस पर नियंत्रण पाने का दायित्व उन्हीं का होगा। पुराने समय में गांवों में आधुनिक अस्पतालों या चिकित्सा सुविधाओं का अभाव रहता था। ऐसी स्थिति में जब भी किसी गांव में हैजा या अन्य कोई संक्रामक बीमारी फैलती थी, तो ग्रामीण पीड़ित मरीजों को इन 'डॉक्टर देव' के पास लाते थे और वहां धार्मिक बंधन करवाते थे। मान्यता है कि 'डॉक्टर देव' की कृपा से लोग पूरी तरह रोगमुक्त हो जाते थे और यह परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ जारी है।

सवाल-जवाब

भादोम जात्रा क्या है और यह कहाँ आयोजित होती है?
भादोम जात्रा छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल अंतर्गत कोंडागांव में हर साल भादो के महीने में आयोजित होने वाली एक पारंपरिक यात्रा है, जिसमें देवी-देवताओं को भंगाराम माई के दरबार में लाया जाता है।
रवानगी प्रक्रिया का क्या अर्थ है?
ग्रामीणों द्वारा अपने घर और गांव के देवी-देवताओं को गांव की सीमा से बाहर भंगाराम माई के मंदिर प्रांगण तक लाने की प्रक्रिया को 'रवानगी' कहा जाता है।
देवी-देवताओं को रिमांड पर क्यों रखा जाता है?
यदि ग्रामीणों की मन्नतें या समस्याएं हल नहीं होती हैं, तो भंगाराम माई की अदालत में सुनवाई होने तक देवी-देवताओं को मंदिर के सामने अस्थायी जेल में रिमांड पर रखा जाता है।
भंगाराम माई के दरबार में 'डॉक्टर देव' की क्या मान्यता है?
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, नागपुर के एक डॉक्टर ने बस्तर को हैजा महामारी से मुक्त कराया था। अकाल मृत्यु के पश्चात उनकी आत्मा को देव रूप में शामिल कर बीमारियों के इलाज का दायित्व दिया गया।
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