छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में जहां आधुनिक कृषि पद्धतियों और संकर बीजों के बढ़ते चलन ने कई पुरानी फसलों को खेतों से दूर कर दिया है, वहीं कुछ काश्तकार अपनी पुरानी विरासत को बचाने में जुटे हैं। इसी कड़ी में सरगुजा जिले के किसान ललित मांझी ने मड़िया, जिसे स्थानीय बोलचाल में रागी भी कहा जाता है, की पारंपरिक खेती की ओर दोबारा कदम बढ़ाया है। एक दौर था जब स्थानीय आदिवासी परिवारों के दैनिक खानपान में यह मोटा अनाज अनिवार्य रूप से शामिल रहता था। समय के साथ भोजन की आदतें बदलीं और खेतों में संकर किस्मों का दखल बढ़ा, जिससे मड़िया की खेती का दायरा लगातार घटता चला गया। इसके बावजूद ललित मांझी ने अपनी 20 डिसमिल जमीन पर इस फसल को तैयार कर यह संदेश दिया है कि कम खर्च में पोषक और पारंपरिक खेती आज भी संभव है।
आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक थाली का मुख्य आधार
क्षेत्र के ग्रामीण परिवेश में मड़िया केवल एक फसल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जीवनशैली और खानपान की मजबूत कड़ी रही है। ललित मांझी बताते हैं कि उनके परिवार के बुजुर्ग नियमित तौर पर मड़िया का सेवन करते थे और उसी बल पर अपनी शारीरिक ऊर्जा बनाए रखते थे। पुराने जमाने में किसान बाजार से राशन खरीदने के बजाय अपने खेतों में उपजे देशी अनाजों पर ही सालभर के भोजन की व्यवस्था टिकाए रखते थे। मड़िया के मोटे दानों को सुखाकर और पीसकर आटा तैयार किया जाता था, जिसकी रोटियां घर-घर में बनाई जाती थीं। इसके अलावा इसे अन्य स्थानीय खाद्य सामग्रियों के साथ मिलाकर भी पकाया जाता था। हालांकि, जैसे-जैसे लोगों की खानपान की प्राथमिकताएं बदलीं, वैसे-वैसे खेतों से यह पारंपरिक दाना गायब होता चला गया।
राशन व्यवस्था और संकर बीजों के प्रभाव से सिमटी खेती
पारंपरिक अनाजों के रकबे में आई गिरावट की पड़ताल करते हुए ललित मांझी एक बड़ा कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार को मानते हैं। पहले परिवारों को अपने भरण-पोषण के लिए दिन-रात खेतों में पसीना बहाकर अलग-अलग किस्मों के मोटे अनाज और धान उगाने पड़ते थे। अब सरकारी सोसाइटी से रियायती दर पर मिलने वाले चावल की सुलभ उपलब्धता के चलते कई ग्रामीण परिवारों की निर्भरता अपने खेतों में पारंपरिक अनाज उगाने पर काफी कम हो गई है। इसके साथ ही रासायनिक खादों पर निर्भर आधुनिक कृषि तकनीकों और अधिक पैदावार का दावा करने वाले संकर बीजों की तरफ किसानों का आकर्षण बढ़ा। इस दोहरे दबाव ने मड़िया जैसी कठोर और पौष्टिक फसलों को हाशिए पर धकेल दिया, जिससे कभी गांवों की पहचान रही यह खेती बहुत सीमित दायरे में सिमट गई।
20 डिसमिल जमीन पर लहलहा रही मड़िया की फसल
अधिकांश किसानों द्वारा पारंपरिक अनाजों से दूरी बना लेने के बावजूद ललित मांझी ने उम्मीद नहीं छोड़ी और अपनी 20 डिसमिल भूमि पर मड़िया की बुवाई की। उन्होंने पूरे पारंपरिक तरीके से खेत की जुताई और तैयारी करने के बाद बीजों का रोपण किया। पौधों के अंकुरण और उनकी बढ़वार के दौरान खेत में जरूरी निराई-गुड़ाई तथा अन्य कृषि कार्य किए गए। अब पौधों में बालियां निकल आई हैं और बालियों के भीतर दाने भरने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। फसल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसान को पूरी उम्मीद है कि जल्द ही कटाई के बाद उन्हें भरपूर अनाज प्राप्त होगा, जिसका प्राथमिक उपयोग वे अपने परिवार के दैनिक भोजन में करेंगे।
रोटी से लेकर पारंपरिक पेय हड़िया तक बहुआयामी उपयोग
मड़िया के दानों की बनावट सामान्य अनाजों की तुलना में थोड़ी मोटी होती है। जब इन दानों को चक्की में पीसा जाता है, तो उससे पौष्टिक आटा तैयार होता है, जिससे पारंपरिक रोटियां पकाई जाती हैं। ललित मांझी के अनुसार, भले ही आज की पीढ़ी को इसका स्वाद गेहूं या चावल जितना परिचित न लगे, लेकिन उनके बुजुर्ग इसे शरीर को ताकत और मजबूती देने वाला उत्तम आहार मानते थे। किसान का यह भी मानना है कि इस मोटे अनाज के नियमित खानपान से सेहत दुरुस्त रहती है और बीमारियां दूर रहती हैं, यद्यपि इस तरह के स्वास्थ्य लाभों और बीमारी के इलाज संबंधी दावों के सत्यापन के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं। भोजन के अलावा, आदिवासी समुदाय में सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर तैयार किए जाने वाले पारंपरिक पेय हड़िया को बनाने में भी मड़िया का इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता है। इस प्रकार यह अनाज आदिवासी समाज के रीति-रिवाजों और पारंपरिक पेय संस्कृति का भी अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।
कम लागत में बेहतर उत्पादन और जागरूकता की आवश्यकता
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मड़िया की खेती में लागत बहुत सीमित आती है, क्योंकि इसे महंगे रासायनिक उर्वरकों या अत्यधिक कीटनाशकों की दरकार नहीं होती। हालांकि, ललित मांझी यह भी स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक खेती का खर्च और मिलने वाला मुनाफा अलग-अलग जमीन की बनावट, बीज की गुणवत्ता, स्थानीय श्रम और अपनाए जाने वाले कृषि तरीकों पर निर्भर करता है। वे मानते हैं कि अगर किसानों को पारंपरिक मोटे अनाजों के बेहतर उत्पादन तरीकों, बाजार की मांग और उचित मूल्य निर्धारण के बारे में सही जानकारी दी जाए, तो अन्य काश्तकार भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। जब तक स्थानीय बाजारों में ऐसे अनाजों की मांग नहीं बढ़ेगी और किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिलेगा, तब तक इसका दायरा व्यापक स्तर पर बढ़ाना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।
पुरखों की विरासत सहेजने का व्यक्तिगत संकल्प
ललित मांझी का यह प्रयास केवल अनाज उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और कृषि धरोहर को जीवित रखने का एक सचेत प्रयास है। उनका स्पष्ट मानना है कि जिन फसलों के सहारे हमारे पूर्वजों ने पीढ़ियों तक स्वस्थ जीवन जिया, उन्हें आधुनिकता की आंधी में पूरी तरह भुला देना समझदारी नहीं है। स्थानीय कृषि जैव विविधता को बनाए रखने और लोक परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए मड़िया जैसी फसलों का संरक्षण बेहद जरूरी है। इसके लिए आवश्यक है कि शासन और समाज के स्तर पर ऐसे किसानों को उचित प्रोत्साहन मिले, ताकि आने वाली युवा पीढ़ी भी अपने पुरखों के पारंपरिक अनाजों की महत्ता और उनके उपयोग के प्रति जागरूक हो सके।






















