बस्तर क्षेत्र में कृषि के क्षेत्र में एक नया प्रयोग देखने को मिल रहा है, जहां एक किसान पारंपरिक सब्जियों की बजाय करेले के बीज का उत्पादन कर रहा है। समलू कश्यप नामक इस किसान ने सरकारी सब्सिडी की मदद से शेड नेट की स्थापना की है और इसके भीतर करेले के बीज उगाने का काम शुरू किया है। इस विशेष प्रकार की खेती से उन्हें भारी मुनाफा होने की पूरी उम्मीद है। आमतौर पर किसान करेले की फसल को सब्जी के रूप में बाजार में बेचकर आय अर्जित करते हैं, लेकिन समलू कश्यप ने बीज उत्पादन को अपनी व्यावसायिक प्राथमिकता बनाया है। इस तरह की कृषि में उचित तकनीक अपनाने, फसल की निरंतर देखभाल करने और उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने पर विशेष जोर देना पड़ता है।
खेती की तैयारी और उर्वरक प्रबंधन
खेती की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए समलू कश्यप ने साझा किया कि वे लगभग आधा एकड़ भूमि पर यह फसल ले रहे हैं। जमीन तैयार करने के लिए खेत की चार से पांच बार जुताई की जाती है और उसके बाद रोटावेटर चलाकर क्यारियां या बेड तैयार किए जाते हैं। इन बेड के बीच की दूरी 5 फीट रखी जाती है, जबकि एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच 4 फीट का अंतराल रखा जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने के लिए इसमें गोबर की सड़ी हुई खाद के साथ डीएपी और सुपर फॉस्फेट का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, फसल के बेहतर विकास के लिए ऊपर से 12:61, 19:19 और 13:0:45 उर्वरकों का भी छिड़काव किया जाता है।
उत्पादन चक्र और बाजार मूल्य का गणित
यह पूरी फसल मात्र तीन महीने की अवधि में तैयार हो जाती है। संबंधित कंपनी के मानकों के अनुसार, इस विधि से लगभग तीन क्विंटल तक का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। किसान के अनुसार, आधा एकड़ भूमि पर खेती करने पर उन्हें तीन क्विंटल तक बीज उत्पादन की पूरी संभावना नजर आ रही है। वर्तमान में बाजार में इस बीज का भाव 2100 से 2200 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास चल रहा है। इस हिसाब से एक क्विंटल बीज की कीमत 2 लाख 10 हजार रुपये बैठती है। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले साल इसी आधा एकड़ जमीन से दो क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ था।
लागत, मुनाफा और खरीदार की सुविधा
इस पूरी कृषि प्रक्रिया में लगभग 60 से 70 हजार रुपये तक की लागत आती है। यदि आधा एकड़ में न्यूनतम डेढ़ क्विंटल उत्पादन भी हासिल होता है, तो भी किसान को तीन लाख रुपये तक की शानदार कमाई हो सकती है। इस खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उत्पादक किसानों को खरीदार खोजने के लिए मंडियों के चक्कर नहीं काटने पड़ते हैं। बीज तैयार होने के बाद संबंधित कंपनी स्वयं खेत तक आती है और सारा उत्पाद खरीदकर अपने साथ ले जाती है। इस प्रकार यह अभिनव कृषि मॉडल बस्तर के किसानों के लिए आर्थिक रूप से बेहद लाभदायक साबित हो रहा है।



















