छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व इलाके में सड़क हादसों का शिकार होने वाले वन्यजीवों की जान बचाने की दिशा में एक অভিনव पहल की गई है। रायपुर-जबलपुर नेशनल हाईवे-30 के एक खास हिस्से पर सड़क की सतह पर लाल रंग की खुरदरी परत तैयार की गई है, जो देखने में एक लाल कालीन की तरह महसूस होती है। इस अनोखी तकनीक को टेबल-टॉप रेड मार्किंग का नाम दिया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य वाहनों की रफ्तार पर लगाम लगाना और ड्राइवरों का ध्यान खींचना है ताकि जंगल के बेजुबान जीव सुरक्षित रह सकें।
नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की पहल और विस्तार
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने इस नई तकनीक को शुरुआती चरण के तहत कबीरधाम जिले के चिल्फी से लगभग 12 किलोमीटर आगे कान्हा टाइगर रिजर्व के दायरे में स्थापित किया है। इस विशेष क्षेत्र में हाईवे के चार किलोमीटर लंबे हिस्से पर लाल रंग की इस खास परत को बिछाया गया है। इस प्रयोग की सफलता को देखते हुए प्रशासन आगे चलकर भोरमदेव अभयारण्य से गुजरने वाले हाईवे के हिस्सों में भी इसी तरह की मार्किंग लागू करने की पूरी योजना बना रहा है।
सड़क पर कंपन और आवाज से चालकों को मिलेगा संकेत
यह टेबल-टॉप रेड मार्किंग आम डामर या कंक्रीट की सड़क से काफी अलग और विशिष्ट नजर आती है। इस विशेष सतह की ऊंचाई सामान्य सड़क तल से लगभग पांच मिलीमीटर अधिक होती है और यह छूने में काफी खुरदरी होती है। जब भी कोई तेज रफ्तार वाहन इस हिस्से के ऊपर से गुजरता है, तो टायर और सड़क के घर्षण से वाहन के भीतर कंपन पैदा होती है। इस झटके और कंपन से ड्राइवर को तुरंत इस बात का संकेत मिल जाता है कि वह किसी संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र के भीतर प्रवेश कर चुका है, जिसके बाद वह स्वतः अपनी गाड़ी की गति धीमी कर लेता है।
इसके अलावा, इस परत के ऊपर से गुजरने वाले वाहनों के टायरों से एक खास प्रकार की तेज आवाज भी पैदा होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आवाज के गूंजने से सड़क के आसपास घूम रहे वन्यजीव भी समय रहते सतर्क हो जाएंगे। यदि कोई जानवर अचानक सड़क पार करने की कोशिश करता है, तो इस अतिरिक्त चेतावनी तंत्र के कारण भीषण सड़क दुर्घटनाओं के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मध्य प्रदेश के अन्य रिजर्व में पहले भी हुआ है परीक्षण
इस प्रकार की टेबल-टॉप रेड मार्किंग का विचार पूरी तरह से नया नहीं है, क्योंकि इसका पूर्व में भी मध्य प्रदेश के भीतर सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। इससे पहले इस तकनीक का सबसे पहला प्रयोग मध्य प्रदेश के ही वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में आजमाया गया था। वहां नेशनल हाईवे-45 के दो किलोमीटर लंबे हिस्से पर इसी तरह की लाल रंग की परत बिछाई गई थी, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद अब कान्हा टाइगर रिजर्व के इस रूट पर इसे अपनाया गया है।
वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारों और उनकी आवाजाही वाले मार्गों पर तेज रफ्तार वाहन हमेशा से एक गंभीर चुनौती और चिंता का विषय रहे हैं। ऐसे में सड़क पर की गई यह लाल रंग की मार्किंग ड्राइवरों को पहले से ही सचेत करने का एक मजबूत माध्यम बन सकती है। यदि वाहन चालक समय रहते अपनी गाड़ियों की स्पीड कम कर लेते हैं, तो इससे न केवल जंगल के वन्यजीवों की बल्कि सफर कर रहे यात्रियों की भी सुरक्षा पुख्ता हो सकेगी।
























