आने वाले महीनों में राष्ट्रीय राजधानी आने जाने वाले लाखों लोगों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं, क्योंकि सर्दियों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली की सीमाओं पर सख्त पाबंदियां लागू होने जा रही हैं। खासतौर पर उन वाहन चालकों के लिए चिंता का माहौल है जो रोजाना पड़ोसी शहरों से दिल्ली सफर करते हैं। परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार एक नवंबर 2026 से इकतीस जनवरी 2027 तक दिल्ली में बीएस-6 उत्सर्जन मानकों से नीचे के बाहरी वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। इस अवधि के दौरान केवल बीएस-6 या उससे उच्च श्रेणी की गाड़ियां ही राजधानी की सीमा के भीतर आ सकेंगी, जबकि बीएस-4 या उससे पुरानी गाड़ियों को बाहर ही रोका जाएगा।
दस लाख गाड़ियों पर लटकती तलवार और एनसीआर का हाल
परिवहन विभाग के अनुमान के मुताबिक इस नियम के दायरे में गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद के दस लाख से अधिक वाहन आने वाले हैं। अकेले गुरुग्राम और फरीदाबाद में लगभग दो लाख वाहन ऐसे हैं जो बीएस-6 मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं, जिनमें से करीब सत्तर प्रतिशत गाड़ियां बीएस-3 और बीएस-4 श्रेणी की हैं। इसके अलावा इन दोनों जिलों में लगभग पचास हजार कमर्शियल वाहन भी इसी दायरे में शामिल हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में चार लाख से अधिक वाहन इस पाबंदी से प्रभावित होंगे और इनमें आधे से ज्यादा वाहन बीएस-4 पेट्रोल कारें हैं। वहीं गाजियाबाद जिले में भी लगभग चार लाख गाड़ियां इस प्रतिबंध से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाली हैं।
बॉर्डर पर बढ़ी चौकसी और आधुनिक तकनीक का पहरा
दिल्ली की सीमाओं पर अभी से सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई है और प्रमुख प्रवेश बिंदुओं पर वाहनों की सघन जांच शुरू हो चुकी है। इन एंट्री पॉइंट्स पर स्वचालित नंबर प्लेट रिकग्निशन यानी एएनपीआर कैमरे और एआई-संचालित कैमरों को तैनात किया गया है जो हर गुजरने वाली गाड़ी पर पैनी नजर रख रहे हैं। जैसे ही कोई पुरानी नंबर प्लेट स्कैन होती है, सिस्टम तुरंत सतर्क हो जाता है। इसके अतिरिक्त परिवहन विभाग के करीब तीन सौ कर्मचारी और पुलिसकर्मी इन बॉर्डर्स पर मुस्तैद किए गए हैं जो लगातार आने-जाने वाले वाहनों की जांच में जुटे हैं। बॉर्डर पर रोके जा रहे चालकों को समझाया जा रहा है कि आने वाले समय में सिर्फ बीएस-6, सीएनजी या इलेक्ट्रिक गाड़ियों को ही प्रवेश की अनुमति मिलेगी, जिससे वाहन चालकों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
रोजाना दफ्तर जाने वालों की बढ़ी चिंता और विकल्प की तलाश
इस फैसले के सामने आने के बाद दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम के बीच रोजाना सफर करने वाले नौकरीपेशा लोगों की परेशानियां काफी बढ़ गई हैं। जो लोग नियमित रूप से अपने काम के सिलसिले में पड़ोसी शहरों से राजधानी आते हैं, वे अब आवागमन के वैकल्पिक साधनों पर विचार करने लगे हैं। कुछ लोग सार्वजनिक परिवहन यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का रुख करने की सोच रहे हैं, तो कुछ लोग नई गाड़ी खरीदने का मन बना रहे हैं। अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि सर्दियों के मौसम में वायु गुणवत्ता के खतरनाक स्तर पर पहुंचने की आशंका के मद्देनजर यह कदम उठाना बेहद जरूरी था। सीमाओं पर शारीरिक अवरोध भी बढ़ा दिए गए हैं ताकि कोई भी गैर-बीएस-6 वाहन अनजाने या जानबूझकर सीमा पार न कर सके।
कड़े उत्सर्जन मानक और पर्यावरण संरक्षण की कवायद
दिल्ली में केवल पेट्रोल और डीजल की बीएस-6 गाड़ियों को ही अनुमति दी गई है क्योंकि ये मानक देश के सबसे कड़े उत्सर्जन नियमों में गिने जाते हैं। भारत में सफर दो हजार में इंडिया-2000 से शुरू हुआ था और फिर बीएस-2, बीएस-3, बीएस-4 से होते हुए आज बीएस-6 तक पहुंचा है। राहत की बात यह है कि इलेक्ट्रिक और सीएनजी वाहनों को इस प्रतिबंध से पूरी तरह छूट दी गई है। हालांकि यह नीति दिल्ली की हवा को साफ और प्रदूषण मुक्त रखने के उद्देश्य से बनाई गई है, लेकिन इससे हजारों परिवारों की दिनचर्या और कामकाज पर सीधा असर पड़ रहा है। जहां एक तरफ कुछ लोग इसे पर्यावरण के लिहाज से आवश्यक कदम मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिकों को रोजमर्रा की व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आने वाले महीनों में दिल्ली की सीमाएं इन सख्त नियमों और लोगों की मजबूरियों दोनों की गवाह बनने वाली हैं।















