सड़क हादसों का शिकार होकर गंभीर रूप से घायल होने वाले बेजुबान मवेशियों के लिए जीवन बेहद कठिन हो जाता है। इंसान अपनी तकलीफ और दर्द बोलकर साझा कर सकते हैं, लेकिन बोल न पाने वाले जीव अपनी पीड़ा किसी से कह भी नहीं पाते। इसी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए उदयपुर स्थित नारायण सेवा संस्थान ने एक घायल गाय को नया जीवन देने की अनोखी पहल की है। राजस्थान के राजसमंद जिले के घोड़ाघाटी इलाके में एक सड़क दुर्घटना में अपना अगला बायां पैर गंवा चुकी गोमाता को संस्थान के विशेषज्ञों ने विशेष रूप से तैयार किया गया मॉड्यूलर कृत्रिम पैर लगाया है, जिसकी बदौलत वह अब अपने पैरों पर खड़ी होकर दोबारा चलने लगी है।
हादसे के बाद चलने-फिरने से लाचार हो गई थी गाय
राजसमंद के घोड़ाघाटी क्षेत्र में कुछ समय पहले यह गाय एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गई थी। इस दर्दनाक हादसे में उसका अगला बायां पैर बुरी तरह कट गया, जिसके कारण वह न तो ठीक से खड़ी हो पा रही थी और न ही चल-फिर पा रही थी। एक पैर के अभाव में गाय को दैनिक गतिविधियों में भारी तकलीफ उठानी पड़ रही थी। जब इस घायल गोमाता की दयनीय स्थिति की जानकारी नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल तक पहुंची, तो उन्होंने बिना किसी देरी के इस बेजुबान की मदद करने का फैसला किया। उन्होंने संस्थान के प्रोस्थेटिक्स एंड ऑर्थोटिक्स (पीएंडओ) विभाग के विशेषज्ञों को तुरंत मौके पर पहुंचकर वस्तुस्थिति का जायजा लेने के निर्देश दिए।
विशेषज्ञों ने लिया शारीरिक माप और तैयार किया कृत्रिम अंग
संस्थान से विशेषज्ञों का दल घोड़ाघाटी पहुंचा और गाय के प्रभावित हिस्से की बारीकी से जांच की। चिकित्सकों ने गोमाता की शारीरिक बनावट, उसके वजन, प्रभावित पैर की स्थिति और कृत्रिम अंग लगाने की व्यवहार्यता का गहन अध्ययन किया। इसके बाद सटीक फिटिंग सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी शारीरिक नाप लिए गए। संस्थान के पीएंडओ विभाग की प्रमुख डॉ. मानस रंजन साहू ने इस पूरे प्रोजेक्ट की तकनीकी जिम्मेदारी संभाली। उनकी देखरेख में संस्थान की प्रयोगशाला में विशेष सामग्री और उन्नत प्रोस्थेटिक तकनीक का उपयोग करके एक अनुकूलित मॉड्यूलर कृत्रिम पैर तैयार किया गया। यह कृत्रिम पैर इस तरह डिजाइन किया गया ताकि वह गाय के भारी शरीर के संतुलन को आसानी से संभाल सके और उसे किसी प्रकार का दर्द या असहजता न हो।
कृत्रिम पैर लगाकर कराया गया अभ्यास
मॉड्यूलर कृत्रिम पैर पूरी तरह तैयार होने के बाद विशेषज्ञों की टीम दोबारा घोड़ाघाटी पहुंची। वहां गाय के कटे हुए पैर पर सावधानीपूर्वक इस कृत्रिम अंग को फिट किया गया। शुरुआत में विशेषज्ञों ने गोमाता को संतुलन बनाने और खड़े होने में सहायता की। थोड़े ही अभ्यास के बाद टीम के प्रयासों को शानदार सफलता मिली और गाय कृत्रिम पैर के सहारे अपने बल पर खड़ी हो गई और धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाने लगी। लंबे समय से बेबस पड़ी गाय को अपने पैरों पर फिर से चलते देख वहां मौजूद स्थानीय लोग और ग्रामीण बेहद भावुक हो गए और उनके चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई।
तकनीक और मानवीय सेवा का अनूठा उदाहरण
इस मानवीय कार्य पर अपने विचार व्यक्त करते हुए संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि शारीरिक रूप से अक्षम इंसान तो अपनी बात बोलकर कह सकते हैं, लेकिन बेजुबानों के मूक दर्द को महसूस करने के लिए गहरी संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। गाय अपनी लाचारी नहीं बता सकती थी, लेकिन उसकी पीड़ा को समझना और उसका समाधान करना संस्थान ने अपना मानवीय कर्तव्य समझा। उन्होंने संतोष जताया कि संस्थान की तकनीकी महारत और सेवा भाव के मेल से एक बेजुबान जीव को दोबारा चलने में कामयाबी मिली। नारायण सेवा संस्थान लंबे अरसे से दिव्यांग मनुष्यों को कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण मुहैया कराकर आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चला रहा है, लेकिन अब जानवरों के प्रति दिखाई गई इस निष्ठा ने यह साबित किया है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीक का उपयोग मूक प्राणियों के कष्ट दूर करने के लिए भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।



















