रेगिस्तानी इलाकों में सदियों से परिवहन और आजीविका की रीढ़ रहे ऊंटों के अस्तित्व पर मंडराते संकट को दूर करने के लिए अब आधुनिक विज्ञान का सहारा लिया जा रहा है। राजस्थान के इस राज्य पशु की गिरती आबादी को थामने के साथ ग्रामीण चरवाहों की माली हालत सुधारने के मकसद से कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र, बीकानेर के बीच एक नया औपचारिक करार हुआ है। इस समझौते के जरिए दोनों संस्थान मिलकर ऊंटों की सेहत, नस्ल संवर्धन और पशुपालन से जुड़े व्यावहारिक शोध को जमीनी स्तर पर आगे बढ़ाएंगे।
थार की संस्कृति और आजीविका से जुड़ा गहरा ताना-बाना
पश्चिमी राजस्थान के शुष्क परिवेश में ऊंट केवल बोझ ढोने वाला पशु नहीं है, बल्कि यह मरुस्थलीय जीवनशैली, लोक संस्कृति और देहाती अर्थतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है। बीते कुछ दशकों में विभिन्न सामाजिक और पर्यावरणीय कारणों से इस पशु की संख्या में आई भारी गिरावट ने न केवल पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को चोट पहुंचाई है, बल्कि समूचे रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र के सामने भी एक नाजुक चुनौती खड़ी कर दी है। पारंपरिक तौर पर पशुपालन से जुड़े परिवारों को सहारा देने और इस बेजुबान विरासत को महफूज रखने के लिए संस्थागत और वैज्ञानिक साझेदारी को समय की सबसे बड़ी जरूरत माना जा रहा है।
डेयरी उत्पाद और बाजार से आमदनी की नई राहें
इस नई साझा योजना का सबसे अहम केंद्र बिंदु ऊंटनी के दूध का व्यावसायिक विस्तार करना है। राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. ए.के. पूनिया ने इस दूध की असाधारण औषधीय विशेषताओं को रेखांकित करते हुए इसे "चलती-फिरती फार्मेसी" करार दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस दूध के स्वास्थ्य लाभों को ध्यान में रखते हुए इसके व्यापक व्यावसायिक उपयोग और सुव्यवस्थित विपणन को नई गति देने की सख्त आवश्यकता है।
मौजूदा समय में थार के पशुपालक ऊंटनी का दूध निकालने के बाद उसे सुरक्षित रखने, आधुनिक तरीकों से प्रसंस्कृत करने और बड़े शहरों के उपभोक्ताओं तक पहुंचाने में बुनियादी दिक्कतों का सामना करते हैं। यदि इस दूध से नए मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार किए जाएं और उन्हें संगठित खुदरा बाजारों से जोड़ा जाए, तो इससे देहाती परिवारों के लिए नियमित कमाई के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। दोनों वैज्ञानिक संस्थान ऐसी तकनीकों के विकास पर काम करेंगे, जिससे स्थानीय पालकों को प्रसंस्करण और सीधी बिक्री में मदद मिल सके।
शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पशुपालकों को तकनीकी संबल
इस संयुक्त पहल के तहत अकादमिक ज्ञान को सीधे खेत-खलिहान और रेतीले धोरों तक पहुंचाने की रूपरेखा खींची गई है। कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलगुरु प्रो. वीरेंद्र सिंह जैतावत ने गिरती संख्या पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इस पशु के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक स्तर पर ठोस प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मरुस्थलीय पर्यावरण में खेती और मवेशी एक-दूसरे के पूरक हैं।
इस साझेदारी से कृषि और पशु विज्ञान के विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं को ऊंटों की प्रजनन क्षमता, रोग नियंत्रण, पौष्टिक चारे और बेहतर रख-रखाव पर सीधे फील्ड में शोध करने का अवसर मिलेगा। आधुनिक प्रयोगशालाओं से निकलने वाले वैज्ञानिक निष्कर्षों को जब सीधे पशुपालकों के पारंपरिक अनुभवों से जोड़ा जाएगा, तो पशुधन प्रबंधन में बड़ा बदलाव आ सकता है।
संरक्षण मुहिम को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने का संकल्प
करार के औपचारिक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर के निदेशक डॉ. एच.एस. जाट ने सभी संबंधित पक्षों को एक मंच पर आकर ‘ऊंट बचाओ अभियान’ को धार देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संरक्षण के इस प्रयास को व्यापक जन-आंदोलन का रूप देना होगा ताकि रेगिस्तान की यह पहचान हमेशा सलामत रहे।
समारोह में प्रो. वीरेंद्र सिंह जैतावत और डॉ. ए.के. पूनिया ने समझौते के दस्तावेजों का परस्पर आदान-प्रदान कर आधिकारिक शुरुआत की। इस दौरान वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप पगारिया ने साझा कार्ययोजना के तकनीकी लक्ष्यों का खाका प्रस्तुत किया, जबकि प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन ने बीकानेर केंद्र में विकसित हो रही आधुनिक तकनीकों और अनुसंधान की ताजा प्रगति से सभी को परिचित कराया।























