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अत्याधुनिक हथियारों के बावजूद क्या युद्ध के मैदान में टिक पाएगी चीनी सेनाचीन
9 अक्तू॰ 2026, 6:11 pm (40 मिनट पहले)· 1

अत्याधुनिक हथियारों के बावजूद क्या युद्ध के मैदान में टिक पाएगी चीनी सेना

पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों और विशाल नौसेना के बाद भी पीएलए वास्तविक युद्ध के व्यावहारिक अनुभव की भारी कमी और अवास्तविक प्रशिक्षण संस्कृति जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।

सैन्य हथियारों के आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में बीजिंग ने बीते कुछ दशकों के दौरान अपनी ताकत में अभूतपूर्व इजाफा किया है। आज चीनी सेना के पास पांचवीं पीढ़ी के उन्नत लड़ाकू विमान, लंबी दूरी तक मार करने वाली घातक मिसाइलें, विशाल युद्धपोतों का बेड़ा और अंतरिक्ष से लेकर साइबर वॉरफेयर तक के अत्याधुनिक संसाधन मौजूद हैं। एशियाई महाद्वीप में अपना दबदबा कायम करने के साथ-साथ बीजिंग वैश्विक स्तर पर सैन्य महाशक्ति बनने की खुली महत्वाकांक्षा पाले हुए है। हथियारों के विशाल जखीरे पर अरबों डॉलर पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ और रणनीतिकार एक बिल्कुल अलग बुनियादी पहलू की पड़ताल कर रहे हैं। सबसे बड़ा और जटिल सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन अति-आधुनिक हथियारों को संभालने वाले सैन्य अधिकारी, पायलट और लड़ाके वास्तविक रणभूमि के अनपेक्षित दबाव, अफरातफरी और भय के माहौल में उसी दक्षता से काम कर पाएंगे।

शांति की बीमारी और युद्ध के व्यावहारिक अनुभव का अभाव

हथियारों की संख्या और तकनीकी क्षमताओं के पीछे छिपी इंसानी कमजोरियों पर सवाल केवल बाहरी आलोचकों ने ही नहीं उठाया, बल्कि खुद चीनी सैन्य प्रतिष्ठान के भीतर से भी ऐसी आवाजें मुखर हुई हैं। चीनी सैन्य हलकों में इस संस्थागत कमजोरी और जड़ मानसिकता को रेखांकित करने के लिए पीस डिजीज यानी शांति की बीमारी जैसा मुहावरा इस्तेमाल किया जाता है। यह कोई जैविक या चिकित्सीय रोग नहीं है, बल्कि दशकों तक किसी वास्तविक युद्ध से पूरी तरह कटे रहने के कारण सैन्य तंत्र में घर कर जाने वाली शिथिलता का नाम है। इस स्थिति में गलतियों और खामियों पर पर्दा डालने वाली प्रशिक्षण संस्कृति पनपती है, और युद्धक्षेत्र की वास्तविक अनिश्चितताओं तथा जटिल जोखिमों से बचने की आदत बन जाती है।

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पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए की सबसे कमजोर कड़ी तकनीक या साजो-सामान नहीं, बल्कि जमीनी मुकाबले का अनुभवहीन होना है। बीजिंग ने आखिरी बार बड़े पैमाने पर खुला सैन्य टकराव 1979 में वियतनाम के खिलाफ लड़ा था। उस ऐतिहासिक संघर्ष के बाद दशकों का समय बीत चुका है। इस दौरान सीमाओं पर तनाव, झड़पें और सुनियोजित युद्धाभ्यास तो नियमित रूप से होते रहे, मगर आधुनिक दौर के किसी पूर्ण या भीषण युद्ध का प्रत्यक्ष सामना सैनिकों को नहीं करना पड़ा। इसका सीधा अर्थ यह है कि आज चीनी थलसेना, वायु सेना और नौसेना में सेवा दे रहे लड़ाके, तकनीकी कर्मी और शीर्ष स्तर के कमांडर ऐसे हैं जिन्होंने अपने समूचे सेवाकाल में कभी असली युद्ध के बारूद की गंध महसूस नहीं की है। उन्होंने युद्ध लड़ने के तरीके केवल किताबों के पन्नों, कंप्यूटर सिमुलेटरों और नियंत्रित अभ्यासों में सीखे हैं, जबकि युद्ध की वास्तविक विभीषिका, धुंध, मनोवैज्ञानिक दबाव और पल-पल बदलती परिस्थितियों का प्रत्यक्ष सामना करने का कोई व्यक्तिगत अनुभव उनके पास नहीं है।

कागजी युद्धाभ्यास और नियंत्रित प्रशिक्षण का दोहरा संकट

युद्ध केवल अत्याधुनिक मिसाइलों को बटन दबाकर दागने की कोई यांत्रिक प्रक्रिया भर नहीं होता। रणभूमि असल में इंसान के त्वरित फैसलों, मनोबल, अनुशासन और मानसिक दृढ़ता की सबसे कठोर परीक्षा लेती है। साजो-सामान, ईंधन की सतत आपूर्ति, सुरक्षित संचार लाइन और विपरीत परिस्थितियों में घिरे सैनिकों के मानसिक हौसले का इम्तिहान एक साथ होता है। 2015 में प्रकाशित एक चर्चित रिपोर्ट में पीएलए के आंतरिक आकलन के हवाले से कई सनसनीखेज खुलासे किए गए थे। उस दस्तावेज में सेना के अपने अधिकारियों की यह स्वीकारोक्ति दर्ज थी कि सैन्य बलों के कई अहम अंगों में प्रशिक्षण कार्यक्रम अवास्तविक, ढीले और जरूरत से ज्यादा आसान बना दिए गए थे। नानजिंग मिलिट्री रीजन एयर फोर्स के तत्कालीन उप प्रमुख नी वेनशिन ने औपचारिक रूप से इसी समस्या को शांति की बीमारी करार दिया था।

यह तथ्य इस मायने में बेहद महत्वपूर्ण था कि कमियों की यह पहचान किसी विरोधी शक्ति ने नहीं की थी, बल्कि यह स्वीकारोक्ति चीनी सेना की आंतरिक समीक्षा से निकली थी। सबसे बड़ी चिंता यह थी कि सैन्य बलों के कई बड़े युद्धाभ्यास पहले से लिखी गई पटकथा की तरह संचालित किए जाते थे। अभ्यास शुरू होने से पहले ही उसका नतीजा लगभग तय रहता था, और मैदान में तैनात सैनिकों से लेकर कमान संभाल रहे अफसरों तक को यह भलीभांति मालूम होता था कि अगले चरण में क्या घटनाक्रम होना है। सैन्य विफलताओं या अप्रिय हादसों से बचने के लिए अभ्यासों में जोखिम का स्तर जानबूझकर बेहद सीमित रखा जाता था। ऐसा वातावरण तैयार किया जाता था जिसमें किसी भी टुकड़ी के असफल होने की गुंजाइश न के बराबर रहे। लेकिन वास्तविक युद्ध किसी पूर्व निर्धारित स्क्रिप्ट के मुताबिक नहीं चलता। रणक्षेत्र में दुश्मन आपकी योजना के अनुसार नहीं चलता, बल्कि वह आपके हर अनुमान को ध्वस्त कर ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियां खड़ी करता है जिनका कोई रेडीमेड जवाब पहले से तैयार नहीं होता।

निर्णय लेने की क्षमता पर असर और लंबी लड़ाई की तैयारी

किसी भी सैन्य युद्धाभ्यास का बुनियादी मकसद अपनी टुकड़ियों की कामयाबी का दिखावा करना नहीं होता, बल्कि उनकी छिपी हुई कमजोरियों और परिचालन खामियों को बेनकाब करना होता है। यदि शांति काल के कड़े अभ्यासों के दौरान जवान गलतियां नहीं करेंगे, तो उन्हें सुधारने और वास्तविक संकट के लिए तैयार होने का अवसर कभी नहीं मिल सकेगा। आंतरिक समीक्षाओं में वायु सेना के कई प्रशिक्षण प्रारूपों में इसी तरह के गंभीर सुरक्षात्मक रुझान रेखांकित किए गए थे। क्लोज एयर कॉम्बैट यानी नजदीकी हवाई भिड़ंत के अभ्यास पूरी तरह से यथार्थवादी नहीं पाए गए, क्योंकि विमानों की सुरक्षा को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्कता बरतने के कारण चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों वाले अभ्यासों से बचने की प्रवृत्ति देखी गई। प्रशिक्षण जितना नियंत्रित और सुरक्षित होता चला गया, वह युद्ध की खुरदरी सच्चाइयों से उतना ही दूर होता गया।

हवाई मुकाबले में किसी भी फाइटर पायलट को यह कतई मालूम नहीं होता कि विरोधी लड़ाकू विमान अगले ही पल किस कोण पर गोता लगाएगा या क्या पैंतरा अपनाएगा। वहां जिंदगी और मौत का फैसला सेकंड के चंद हिस्सों में सूझबूझ और सहज प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। यदि किसी पायलट को केवल पूर्व निर्धारित परिस्थितियों में ही उड़ने का अभ्यास कराया गया हो, तो वास्तविक रणभूमि के आकस्मिक हमलों के सामने उसकी त्वरित निर्णय लेने की क्षमता लड़खड़ा सकती है। शांति की बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू हथियारों की कमी होना नहीं है, बल्कि अप्रत्याशित संकट के क्षणों में इंसानी निर्णय क्षमता को कुंद कर देना है।

इसके अलावा आधुनिक दौर के युद्ध कुछ घंटों के सांकेतिक हमलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे कई दिनों, हफ्तों या महीनों तक लगातार खिंच सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में लड़ाकू विमानों को दिन-रात लगातार उड़ानें भरनी पड़ती हैं, कमान केंद्र चौबीसों घंटे सक्रिय रहते हैं, और सैनिकों को भारी तनाव, शारीरिक थकान तथा सूचनाओं के अत्यधिक दबाव के बीच काम करना पड़ता है। समीक्षा में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया गया था कि पीएलए एयर फोर्स और नेवल एयर फोर्स के लिए लंबे समय तक निरंतर उड़ान संचालन करना एक बिल्कुल नया अनुभव था। उदाहरण के तौर पर, नानजिंग मिलिट्री रीजन एयर फोर्स ने मार्च 2013 में जाकर पहली बार 24 घंटे के निरंतर फ्लाइट ऑपरेशन का अभ्यास आयोजित किया था, जो इस बात का स्पष्ट संकेत था कि सेना वास्तविक युद्ध की लंबी और थका देने वाली निरंतरता के लिए अपनी परिचालन क्षमताएं विकसित करने के शुरुआती चरणों में ही थी।

सवाल-जवाब

चीनी सेना के संदर्भ में पीस डिजीज क्या है?
यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि दशकों तक युद्ध से दूर रहने के कारण पैदा हुई वह मानसिकता है जिसमें सेना अवास्तविक और नियंत्रित अभ्यासों के जरिए वास्तविक जोखिमों से बचती है।
चीन ने आखिरी बार बड़े पैमाने पर युद्ध कब लड़ा था?
चीन ने अंतिम बार 1979 में वियतनाम के खिलाफ बड़े पैमाने पर युद्ध लड़ा था।
पीएलए के प्रशिक्षण को लेकर क्या प्रमुख कमियां सामने आईं?
सैन्य समीक्षा में पाया गया कि प्रशिक्षण कार्यक्रम जरूरत से ज्यादा आसान, ढीले और पहले से तय पटकथा पर आधारित थे, जिनमें वास्तविक मुकाबले जैसी अनिश्चितता नहीं थी।
चीनी वायु सेना ने पहली बार 24 घंटे का निरंतर उड़ान अभ्यास कब किया था?
नानजिंग मिलिट्री रीजन एयर फोर्स ने मार्च 2013 में पहली बार 24 घंटे के निरंतर उड़ान संचालन का अभ्यास आयोजित किया था।
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