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आधुनिक तकनीक और राष्ट्रवाद के दौर में चीनी कक्षाओं से विदेशी जुबान की विदाईचीन
19 सित॰ 2026, 2:33 pm (33 मिनट पहले)· 0

आधुनिक तकनीक और राष्ट्रवाद के दौर में चीनी कक्षाओं से विदेशी जुबान की विदाई

चीन के स्कूलों और विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी के अनिवार्य घंटों में कटौती कर उसकी जगह कोडिंग, चीनी इतिहास और दर्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है। एआई ट्रांसलेशन टूल्स के प्रसार और सांस्कृतिक गौरव की लहर ने इस भाषाई बदलाव को जन्म दिया है।

पारंपरिक शिक्षण व्यवस्था में विदेशी भाषाओं को वैश्विक तरक्की की सबसे मजबूत सीढ़ी माना जाता रहा है। दशकों तक गणित और विज्ञान की तरह अंग्रेजी को पाठ्यक्रम का अनिवार्य और प्रतिष्ठित हिस्सा बनाए रखने के बाद अब चीन की शिक्षा नीति में एक मौलिक बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। वहां के अनेक प्राथमिक स्कूलों, माध्यमिक संस्थानों और उच्च शिक्षण विश्वविद्यालयों में विदेशी जुबान के क्लासरूम घंटों में भारी कटौती की जा रही है। कंप्यूटर और स्मार्टफोन में उपलब्ध उन्नत रियल-टाइम ट्रांसलेशन सॉफ्टवेयर ने इस बहस को नई हवा दी है कि जब तकनीकी साधन एक पल में भाषा की बाधा खत्म कर सकते हैं, तो छात्रों पर विदेशी व्याकरण रटने का दबाव क्यों बनाया जाए। इसके साथ ही देश के भीतर अपनी प्राचीन विरासत और स्थानीय तकनीकी आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखने की मांग भी बेहद मुखर हो चुकी है।

कृत्रिम मेधा के दौर में बदलती उपयोगिता

स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों में उन्नत कृत्रिम मेधा यानी एआई आधारित ट्रांसलेशन टूल्स आने के बाद विदेशी जुबान सीखने के पारंपरिक मकसद पर सवाल खड़े हो गए हैं। आधुनिक ईयरबड और सॉफ्टवेयर किसी भी विदेशी वाक्य को पलक झपकते ही मातृभाषा में रूपांतरित कर देते हैं। तकनीक के जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया भर में संवाद की बाधाएं तकनीकी टूल्स के जरिए पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। ऐसी स्थिति में वर्षों तक व्याकरण के जटिल नियमों और वर्तनी को रटने के बजाय विद्यार्थियों की ऊर्जा का उपयोग कोडिंग, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग जैसे आधुनिक तकनीकी विषयों में करना कहीं अधिक उपयोगी साबित होगा। युवा पीढ़ी को उन कौशलों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिनकी वास्तविक मांग आधुनिक उद्योगों में है।

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पाठ्यक्रम में अनिवार्य घंटों की कटौती

कई चीनी शैक्षणिक परिसरों में अंग्रेजी के अनिवार्य क्रेडिट आवर्स को तेजी से घटाया जा रहा है। जिन कक्षाओं को कभी गणित और सामान्य विज्ञान के बराबर वेटेज दिया जाता था, उन्हें अब ऐच्छिक या कम महत्व वाले विषयों की श्रेणी में डाला जा रहा है। इस खाली हुए समय का उपयोग देश के स्थानीय इतिहास, प्राचीन दर्शन, नागरिक नैतिकता, कला और व्यावहारिक तकनीकी प्रशिक्षण को सिखाने में किया जा रहा है। नीति निर्माताओं का सोचना है कि विद्यार्थियों को पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव से बाहर निकालकर अपनी मिट्टी और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना समय की मांग है। पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय पहचान को मजबूती देने वाले विषयों को प्राथमिकता देकर आत्मनिर्भर प्रतिभाएं तैयार करने पर बल दिया जा रहा है।

शिक्षाविदों के बीच छिड़ी तीखी बहस

पाठ्यक्रम में आए इस बदलाव ने वहां के बौद्धिक और शैक्षणिक जगत को दो स्पष्ट विचारधाराओं में बांट दिया है। एक वर्ग का तर्क है कि यदि देश को वैश्विक व्यापार, अंतरराष्ट्रीय मंचों और अत्याधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों में अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखनी है, तो विदेशी भाषा पर मजबूत पकड़ बनाए रखना अनिवार्य है। उनका मानना है कि अंग्रेजी से दूरी बनाने पर अंतरराष्ट्रीय संवाद कमजोर हो सकता है और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में बाधा आ सकती है। इसके विपरीत, दूसरा वर्ग इसे पश्चिमी मानसिकता और औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्ति का जरिया मानता है। इस समूह का कहना है कि जब पश्चिमी मुल्क अपने घरेलू शोध अपनी ही मातृभाषा में करते हैं, तो मजबूत अर्थव्यवस्था और तकनीकी ताकत के बल पर दुनिया को अपनी स्थानीय भाषा समझने पर आकर्षित किया जा सकता है।

भारतीय मॉडल से बिल्कुल अलग राह

शिक्षा के क्षेत्र में चीन का यह रुख भारत की मौजूदा व्यवस्था से एकदम उलट दिखाई देता है। भारत में आज भी कॉरपोरेट जगत, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा को सफलता, आधुनिकता और करियर ग्रोथ का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है। इसके विपरीत, चीन ने अलीबाबा, हुआवेई और टेनसेंट जैसी अपनी विशाल घरेलू कंपनियों के माध्यम से यह साबित कर दिखाया है कि आर्थिक और तकनीकी शिखर तक पहुंचने के लिए केवल विदेशी जुबान की बैसाखी जरूरी नहीं होती। स्थानीय प्रतिभाओं और घरेलू तकनीकी मंचों को मजबूत करके भी आर्थिक प्रगति का मजबूत ढांचा खड़ा किया जा सकता है। इसी कारण यह नया शैक्षणिक प्रयोग दुनिया के कई विकासशील देशों के लिए एक अध्ययन का विषय बन गया है।

समस्या समाधान और तकनीकी दक्षता की नई परिभाषा

कक्षाओं में हो रहे इन व्यापक प्रयोगों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि भविष्य के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्षेत्र में सफलता के पैमाने बदलने वाले हैं। आने वाले कल में छात्रों की वास्तविक क्षमता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि वे कितनी विदेशी भाषाएं फर्राटे से बोल सकते हैं, बल्कि यह देखा जाएगा कि उनकी तार्किक सोच, समस्या समाधान क्षमता और तकनीकी दक्षता का स्तर क्या है। चूंकि भाषा अनुवाद का कार्य स्वचालित सॉफ्टवेयर चुटकियों में कर देंगे, इसलिए शिक्षा का मुख्य जोर मानव मस्तिष्क के सृजनात्मक और व्यावहारिक कौशल को निखारने पर रहेगा। शिक्षा प्रणाली में किया जा रहा यह बुनियादी बदलाव वैश्विक स्तर पर सीखने के पारंपरिक तौर-तरीकों को नई दिशा दे रहा है।

सवाल-जवाब

चीन के स्कूल-कॉलेजों में अंग्रेजी के क्लासरूम घंटों में कटौती क्यों की जा रही है?
एआई आधारित ट्रांसलेशन टूल्स के आने और घरेलू इतिहास, दर्शन तथा आधुनिक तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह कटौती की जा रही है।
विदेशी भाषा के स्थान पर किन विषयों को अधिक महत्व दिया जा रहा है?
पाठ्यक्रम में अब कोडिंग, डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, स्थानीय इतिहास, कला और दर्शन जैसे व्यावहारिक विषयों को प्रमुखता दी जा रही है।
इस शैक्षणिक बदलाव को लेकर शिक्षाविदों की क्या राय है?
एक वर्ग का मानना है कि वैश्विक व्यापार और शोध के लिए अंग्रेजी जरूरी है, जबकि दूसरा वर्ग इसे पश्चिमी मानसिकता से मुक्ति और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का अवसर मानता है।
क्या भारत और चीन के दृष्टिकोण में कोई अंतर है?
भारत में अंग्रेजी को आज भी करियर की सफलता का मुख्य पैमाना माना जाता है, जबकि चीन अपनी मजबूत घरेलू कंपनियों के बल पर तकनीकी कौशल को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है।
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