वाशिंगटन में होने वाली उच्चस्तरीय कूटनीतिक चर्चाओं से ठीक पहले व्यापारिक मोर्चे पर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका में 'लिंड्से ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' आधिकारिक तौर पर कानून बन चुका है। शुक्रवार, 18 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संसद यानी कांग्रेस द्वारा पारित इस विधेयक पर हस्ताक्षर कर अपनी अंतिम स्वीकृति दे दी। यह नया कानून मास्को और तेहरान पर प्रतिबंधों का शिकंजा कसने के साथ-साथ उन सभी तीसरे देशों के खिलाफ भी सख्त आर्थिक कार्रवाई का कानूनी रास्ता तैयार करता है, जो बड़े पैमाने पर रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद करते हैं।
शी जिनपिंग की यात्रा और कूटनीतिक दबाव की रणनीति
इस कानून को ऐसे समय में अमलीजामा पहनाया गया है जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 24 सितंबर को अमेरिका पहुंचने वाले हैं, जहां उनकी डोनाल्ड ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बैठक निर्धारित है। दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच होने वाली इस वार्ता में कई जटिल और संवेदनशील मुद्दे शामिल रहने की संभावना है। इनमें आपसी व्यापारिक रिश्ते, टैरिफ नीतियां, ताइवान का विवादित मुद्दा, ईरान युद्ध और दोनों आर्थिक महाशक्तियों के बीच पहले से चल रही व्यापारिक सहमति की समीक्षा जैसे विषय प्रमुख माने जा रहे हैं।
चीन वैश्विक स्तर पर रूसी ऊर्जा संसाधनों का एक प्रमुख खरीदार रहा है, जिसके चलते इस नए कानून से बीजिंग पर सीधा आर्थिक असर पड़ सकता है। इसी के साथ भारत भी रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता है, जिससे नई दिल्ली के व्यापारिक हित भी इस नीतिगत दायरे के अंतर्गत आ जाते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बैठक से ठीक कुछ दिन पूर्व इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करके एक ठोस रणनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की गई है, ताकि आगामी वार्ता में अमेरिकी पक्ष को मजबूत मोलभाव की स्थिति मिल सके।
आयात शुल्क के त्वरित क्रियान्वयन पर स्थिति
इस कानून के बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या विदेशी वस्तुओं पर 100% की भारी दर से शुल्क तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को केवल यह वैधानिक अधिकार सौंपता है कि वे रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों के सामान पर 100% तक का टैरिफ लगा सकें, लेकिन यह व्यवस्था स्वतः संचालित नहीं होती। इसके वास्तविक क्रियान्वयन के लिए विशेष प्रशासनिक प्रक्रियाओं और औपचारिक राष्ट्रपति आदेश की अनिवार्यता रहेगी।
कानून से जुड़े विभिन्न तकनीकी प्रावधान औपचारिक हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर चरणबद्ध तरीके से प्रभावी होने हैं। इस समयावधि के पूरा होने के बाद भी यह फैसला पूरी तरह राष्ट्रपति के स्वविवेक पर निर्भर करेगा कि वह किस राष्ट्र को लक्षित करना चाहते हैं, आयात शुल्क की दर कितनी रखी जाए और इसे किस तारीख से जमीन पर उतारा जाए। व्यावहारिक तौर पर अमेरिका ने अपने कानूनी शस्त्रागार में एक बेहद कड़ा आर्थिक उपाय जोड़ लिया है, जिसका प्रयोग कब और किस पर करना है, इसका पूर्ण नियंत्रण अमेरिकी प्रशासन के हाथ में सुरक्षित है।



















