क्रिकेट के गलियारों में हमेशा से ही मैदान की तीखी प्रतिद्वंद्विता और पर्दे के पीछे चलने वाली कूटनीति के बीच एक बारीक रेखा खींची जाती रही है। हाल ही में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित एशियन क्रिकेट काउंसिल यानी एसीसी की वार्षिक आम बैठक ने खेल जगत में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां इस सम्मेलन में क्षेत्रीय क्रिकेट के ढांचे को मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक कदम उठाए गए और अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड को रोटेशनल प्रेसिडेंसी फ्रेमवर्क में शामिल किया गया, वहीं दूसरी ओर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के शीर्ष पदाधिकारियों के आचरण ने फैंस को नाराज कर दिया है। बैठक के दौरान सामने आई तस्वीरों ने बोर्ड की दोहरी नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे खेल प्रेमियों में खासी नाराजगी देखने को मिल रही है।
एशियन क्रिकेट काउंसिल की बैठक के अहम प्रशासनिक फैसले
बैंकॉक में संपन्न हुई इस अहम बैठक में एशियाई देशों के कई क्रिकेट प्रतिनिधियों ने शिरकत की। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य संगठन की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक समावेशी बनाना था। इसी क्रम में खालिद अलजारूमी को सर्वसम्मति से एसीसी का नया उपाध्यक्ष चुना गया। इसके अलावा, एसोसिएट और नॉन-टेस्ट प्लेइंग फुल मेंबर्स के लिए भी एक्जीक्यूटिव बोर्ड के सदस्यों का चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। इस बैठक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड से जुड़ा रहा। अब इस बोर्ड को भी भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश की ही तरह एसीसी प्रेसिडेंसी के योग्य मान लिया गया है, जिसे क्षेत्रीय क्रिकेट के विकास की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
राजीव शुक्ला और मोहसिन नकवी की तस्वीरों पर भड़के फैंस
प्रशासनिक स्तर पर हुए इन सकारात्मक बदलावों के बीच, भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का ध्यान एक अलग ही घटनाक्रम पर केंद्रित हो गया। बैठक समाप्त होने के बाद बीसीसीआई के वरिष्ठ पदाधिकारी राजीव शुक्ला की पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख मोहसिन नकवी के साथ कुछ तस्वीरें सार्वजनिक हुईं। इन तस्वीरों में दोनों अधिकारी एक-दूसरे के बगल में बैठकर काफी सहज अंदाज में हंसते और गर्मजोशी से पोज देते नजर आए। जैसे ही ये तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल हुईं, क्रिकेट प्रशंसकों का गुस्सा फूट पड़ा। जनता और खेल विश्लेषकों का मानना है कि जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के खिलाफ कड़े रुख और औपचारिकता से दूरी की बात की जाती है, तो बंद कमरों के भीतर ऐसी आत्मीयता दिखाना फैंस की भावनाओं के साथ कुठाराघात है।
दोहरे मानदंडों को लेकर उठ रहे तीखे सवाल
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार यह बहस छिड़ी हुई है कि क्रिकेट बोर्ड्स का यह विरोधाभासी रवैया क्यों है। जनता के सामने राष्ट्रवाद और खेल के मैदान पर सख्त कूटनीति का प्रदर्शन किया जाता है, लेकिन प्रशासनिक बैठकों में जाकर वही लोग सहजता से हंसी-मजाक करते दिखते हैं। इस घटना ने एक बार फिर बीसीसीआई के दोहरे मानदंडों को उजागर कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि जब खेल कूटनीति के नाम पर कड़े संदेश देने की बात होती है, तो उसे एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जबकि अंदरखाने सब सामान्य रहता है। एसीसी की यह बैठक जहाँ अफगानिस्तान क्रिकेट के उत्थान और नए सुधारों के लिए याद की जानी चाहिए थी, वह भारतीय प्रशासन की विरोधाभासी नीतियों के कारण चर्चा का विषय बन गई है। फैंस लगातार यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक जनता की भावनाओं को इस तरह से नजरअंदाज किया जाता रहेगा।



















