पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से निकलकर महिला क्रिकेट के राष्ट्रीय पटल पर पहचान बनाना कभी बेहद मुश्किल माना जाता था। उस दौर में जब बेटियों के घर की दहलीज लांघने पर भी सामाजिक बंदिशें हुआ करती थीं, भावना तोमर ने हाथ में बल्ला थामकर एक नई इबारत लिखी। वह न केवल सहारनपुर का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला क्रिकेटर बनीं, बल्कि उन्होंने लगातार बारह वर्षों तक रणजी ट्रॉफी और भारत की प्रतिष्ठित इंडिया A टीम में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। आज वही भावना तोमर क्रिकेट की मुख्य राष्ट्रीय टीम में न खेल पाने की कसक को भुलाकर अगली पीढ़ी की बालिकाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का मंच दिलाने के लिए जी-जान से जुटी हुई हैं।
जब बुनियादी सुविधाओं के बिना शुरू हुआ संघर्ष भरा सफर
भावना तोमर की खेल यात्रा साल 2006 में शुरू हुई थी। उस जमाने में लड़कियों के लिए पेशेवर खेल की राह आसान नहीं थी और समाज में लड़कियों के बाहर जाने को लेकर तरह-तरह की पाबंदियां थीं। ऐसे दौर में भावना के परिवार ने पारंपरिक सोच को दरकिनार करते हुए अपनी बेटी के सपनों को पंख दिए। उनके पिता ने कभी उनके कदमों को बांधने की कोशिश नहीं की, बल्कि हर मोड़ पर हौसला बढ़ाया। सहारनपुर में उस समय क्रिकेट की पेशेवर सुविधाएं और आधुनिक अकादमियां नहीं थीं। शहर में केवल एक अंबेडकर स्टेडियम मौजूद था, जहां लड़कियों के अभ्यास के लिए बुनियादी संसाधन तक उपलब्ध नहीं थे। लड़कों को मैदान पर खेलते देखकर भावना ने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं और अपनी लगन के दम पर आगे बढ़ती रहीं।
उत्तर प्रदेश की कप्तानी से लेकर रणजी ट्रॉफी की खिताबी जीत
कड़े अभ्यास का फल बहुत जल्द सामने आया, जब साल 2007 में भावना तोमर को उत्तर प्रदेश की अंडर-19 टीम में जगह मिली। उनके शानदार खेल कौशल को देखते हुए चयनकर्ताओं ने उन्हें टीम की कप्तानी सौंपी। अंडर-19 स्तर पर लगातार उम्दा प्रदर्शन के बाद उन्हें सीनियर रणजी ट्रॉफी टीम में चुन लिया गया। इसके साथ ही भावना सहारनपुर की पहली ऐसी महिला खिलाड़ी बनीं जिन्होंने अंडर-19 और सीनियर दोनों स्तरों पर जिले का नाम सबसे पहले रोशन किया। उन्होंने करीब दस से बारह वर्षों तक लगातार रणजी ट्रॉफी में हिस्सा लिया। साल 2012 और 2013 के दौरान जब उनकी टीम विजेता बनी, तब भावना उस ऐतिहासिक खिताबी सफर का अहम हिस्सा थीं।
इंडिया A में उत्कृष्ट प्रदर्शन और सीनियर राष्ट्रीय टीम की कसक
घरेलू क्रिकेट में लगातार निरंतरता बनाए रखने के चलते भावना तोमर को इंडिया A टीम में शामिल किया गया। उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ द्विपक्षीय मुकाबले में इंडिया A की जर्सी पहनकर बेहतरीन खेल दिखाया और कई व्यक्तिगत रिकॉर्ड भी अपने नाम किए। इस शानदार लय के बावजूद वह भारत की मुख्य राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर सकीं। साल 2013 में एक वक्त ऐसा भी आया जब लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद भी अपेक्षित मुकाम न मिलने पर उनका दिल टूट गया था और मन में खेल छोड़ने तक का ख्याल आया। दीप्ति शर्मा जैसी कई खिलाड़ी, जो कभी घरेलू स्तर पर उनके साथ खेली थीं और जूनियर थीं, बाद में राष्ट्रीय टीम का नियमित चेहरा बनीं। हालांकि भावना ने इस निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया और खेल के प्रति अपना समर्पण जारी रखा।
मार्गदर्शन की भूमिका और सहारनपुर गौरव सम्मान
भावना तोमर अपनी सफलता की यात्रा में परिवार के साथ-साथ एक विशेष व्यक्ति का योगदान बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। उनका मानना है कि पारिवारिक सहयोग के अलावा किसी निस्वार्थ मार्गदर्शक की भूमिका जीवन बदल देती है। सहारनपुर के मोहम्मद अकरम ने कभी अपना नाम चमकाने की परवाह किए बिना भावना को तराशने में निस्वार्थ मदद की। खेल के क्षेत्र में जिले का नाम रोशन करने और नई बालिकाओं के लिए मिसाल बनने पर भावना को 'सहारनपुर गौरव सम्मान' से भी नवाजा जा चुका है।
साल 2021 में संन्यास के बाद मुख्य कोच की जिम्मेदारी
साल 2021 में भावना तोमर ने एक सक्रिय खिलाड़ी के रूप में प्रतिस्पर्धी क्रिकेट को अलविदा कह दिया। खेल को छोड़ने के बजाय उन्होंने अपने अनुभव को साझा करने का फैसला किया। क्रिकेट प्रशासन ने उनकी खेल समझ को देखते हुए उन्हें रणजी ट्रॉफी टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया। वर्तमान में वह रणजी ट्रॉफी टीम की हेड कोच की जिम्मेदारी संभाल रही हैं और इसके साथ ही अंडर-23 टीम के प्रशिक्षण की कमान भी उन्हीं के हाथों में है। रिश्तेदार और परिवार के लोग अक्सर उनसे शादी करने की बात कहते रहे, लेकिन भावना का पूरा ध्यान केवल खेल पर केंद्रित रहा। अब उनका एकमात्र लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि उनके मार्गदर्शन में पसीना बहा रही युवा लड़कियों में से कम से कम एक खिलाड़ी भारतीय टीम की जर्सी पहनकर मैदान पर उतरे।



















