भारत और श्रीलंका के बीच 15 अगस्त से शुरू हो रही आगामी टेस्ट श्रृंखला से ठीक पहले, देश के दिग्गज ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने अपनी राय साझा की है। इस महत्वपूर्ण श्रृंखला का पहला मुकाबला गॉल के मैदान पर आयोजित होना तय हुआ है। पंजाब के जालंधर से ताल्लुक रखने वाले इस महान खिलाड़ी ने गॉल स्टेडियम से जुड़ी अपनी एक बेहद चुनौतीपूर्ण याद को याद करते हुए उस घटना का जिक्र किया, जिसने उनके अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट सफर की दिशा बदल दी थी। हरभजन सिंह ने भारतीय क्रिकेट टीम के लिए लंबे समय तक खेलते हुए 416 टेस्ट विकेट और 269 वनडे विकेट हासिल किए हैं।
गॉल टेस्ट की यादें और लाल गेंद क्रिकेट से दूरी का अहसास
गॉल के जिस मैदान पर भारतीय टीम अपना पहला टेस्ट मैच खेलने जा रही है, वही मैदान हरभजन सिंह के करियर के अंतिम टेस्ट मुकाबले का गवाह बना था। हालांकि पंजाब के इस स्पिनर ने आधिकारिक तौर पर दिसंबर 2021 में संन्यास की घोषणा की थी, परंतु उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट मैच वर्ष 2015 में श्रीलंका के खिलाफ इसी गॉल स्टेडियम में खेला था। उस मुकाबले के दौरान श्रीलंकाई बल्लेबाज दिनेश चांदीमल ने उनकी गेंदों पर आक्रामक बल्लेबाजी की थी और जमकर रन बटोरे थे। उस कठिन स्पेल के बाद ही हरभजन को यह महसूस होने लगा था कि अब लाल गेंद के प्रारूप को अलविदा कहने का वक्त आ गया है।
35 वर्ष से अधिक उम्र के खिलाड़ियों के सामने आने वाली शारीरिक और मानसिक चुनौतियों पर चर्चा करते हुए हरभजन ने बताया कि जब कोई एथलीट इस उम्र को पार कर लेता है, तो प्रदर्शन के स्तर को बनाए रखने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 18 या 20 वर्ष की युवा उम्र में जो ऊर्जा होती है, 35 की उम्र के बाद उसकी उम्मीद नहीं की जा सकती। जब आपके खाते में 400 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय विकेट दर्ज हों, तो प्रशंसक और विशेषज्ञ आपसे लगातार उसी उच्च स्तर के प्रदर्शन की उम्मीद रखते हैं। हरभजन ने कहा, "अगर आप में हिम्मत है तो खेलना जारी रखने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो अपने शरीर की बात सुननी चाहिए।" उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कई खिलाड़ी अपनी फॉर्म में गिरावट से उबर आते हैं, जबकि कुछ को सही समय पर रुकने का फैसला लेना पड़ता है।
रविचंद्रन अश्विन की सफलता और करियर की नई चुनौतियां
अपनी बातचीत के दौरान हरभजन सिंह ने एक और महत्वपूर्ण पहलू पर बात की, जो उस समय उनके करियर के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा था। उन्होंने स्वीकार किया कि ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन की टीम में मजबूत उपस्थिति और उनका लगातार शानदार प्रदर्शन भी उनके लिए एक बड़ा कारक था। अश्विन उस दौर में बेहतरीन लय में थे और नियमित रूप से विकेट चटका रहे थे।
हरभजन ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि खेल की इस सच्चाई को मानना बहुत आवश्यक होता है कि जब कोई दूसरा खिलाड़ी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा हो, तो प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक हो जाती है। उन्होंने विचार किया कि अगर उन्हें अश्विन से आगे निकलना होता, तो उन्हें एकदम नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ती। उन्हें उतना ही कठिन परिश्रम करना पड़ता जितना उन्होंने अपने शुरुआती 400 विकेट हासिल करने के लिए किया था। जब हरभजन ने अपनी अंतरात्मा से सवाल किया कि क्या वे दोबारा उतनी मेहनत करने के लिए तैयार हैं, तो उनकी अंतरात्मा ने स्पष्ट रूप से ना में जवाब दिया। इसी आत्ममंथन के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि अब नए खिलाड़ियों के लिए रास्ता छोड़ने का समय आ गया है।



















