क्रिकेट के खेल में अनिश्चितताओं का दौर कभी भी मैच का रुख पलट सकता है, लेकिन कुछ मुकाबले ऐसे होते हैं जो खेल की परिभाषा ही हमेशा के लिए बदल देते हैं। लंदन के द ओवल मैदान पर साल 1946 में खेला गया एक प्रथम श्रेणी मुकाबला कुछ ऐसे ही अनोखे इतिहास का गवाह बना था। सरे के खिलाफ खेल रही भारतीय टीम एक समय गहरे संकट में फंसी थी और उसकी हार तय मानी जा रही थी, लेकिन अंतिम जोड़ी ने पिच पर उतरकर ऐसा करिश्मा कर दिखाया जिसकी मिसाल आठ दशकों तक पूरे विश्व क्रिकेट में नहीं मिली।
जब 205 रनों पर सिमटने की कगार पर था भारत
इस ऐतिहासिक मुकाबले में सरे के गेंदबाजों के सामने भारतीय बल्लेबाजी क्रम पूरी तरह लड़खड़ा चुका था। महज 205 रनों के स्कोर पर भारत के 9 प्रमुख बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे। मैदान पर मौजूद दर्शकों के साथ-साथ विपक्षी टीम भी इसे केवल एक औपचारिकता मान रही थी और ऐसा लग रहा था कि भारतीय पारी अगले कुछ ही मिनटों में ढेर हो जाएगी। किसी को भी यह गुंजाइश नजर नहीं आ रही थी कि पुछल्ले बल्लेबाज टीम को इस भंवर से निकाल पाएंगे।
दो पुछल्ले गेंदबाजों की बेखौफ जवाबी पारी
ऐसी विकट स्थिति में मैदान पर दो विशुद्ध गेंदबाजों का आगमन हुआ। 10वें नंबर पर लेग स्पिनर चंदू सरवटे बल्लेबाजी करने उतरे, जबकि 11वें नंबर पर उनका साथ देने मीडियम पेसर शूट बनर्जी पहुंचे। टीम प्रबंधन की तरफ से उन्हें सिर्फ क्रीज पर टिके रहने और कुछ अतिरिक्त ओवर निकालने की सामान्य जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, पिच पर कदम रखते ही दोनों खिलाड़ियों ने रक्षात्मक रवैया अपनाने के बजाय सरे के आक्रमण पर आक्रामक प्रहार शुरू कर दिए।
249 रनों की रिकॉर्ड तोड़ साझेदारी और दोहरे शतक
दोनों खिलाड़ियों ने विपक्षी गेंदबाजों के हर दांव को नाकाम करते हुए शानदार शॉट्स लगाए। चंदू सरवटे ने बेहतरीन तकनीक और धैर्य का परिचय देते हुए 124 रन बनाए। वहीं दूसरे छोर से शूट बनर्जी ने भी तूफानी अंदाज में बल्लेबाजी करते हुए 121 रनों की जबरदस्त पारी खेली। इन दोनों ने मिलकर 10वें विकेट के लिए 249 रनों की अटूट साझेदारी खड़ी कर दी। प्रथम श्रेणी क्रिकेट के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी पारी में 10वें और 11वें नंबर के दोनों बल्लेबाजों ने शतक जड़े हों। इस अभूतपूर्व प्रदर्शन के दम पर भारत ने मैच में शानदार वापसी की और अंततः इस मुकाबले को 9 विकेट से जीत लिया।
आठ दशक बाद रणजी ट्रॉफी में हुई इस रिकॉर्ड की बराबरी
यह विश्व रिकॉर्ड इतना दुर्लभ माना जाता था कि इसके आसपास पहुंचना भी लगभग नामुमकिन दिखता था। करीब 80 सालों तक यह रिकॉर्ड अटूट रहा। आखिरकार साल 2025 में भारतीय घरेलू क्रिकेट के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट रणजी ट्रॉफी के दौरान मुंबई के दो खिलाड़ियों तनुश कोटियन और तुषार देशपांडे की जोड़ी ने इस जादुई आंकड़े की बराबरी की। आधुनिक युग में कई कीर्तिमान बनते और मिटते हैं, लेकिन 1946 में शूट बनर्जी और चंदू सरवटे की लिखी यह अमर गाथा आज भी खेल भावना और कभी हार न मानने के जज्बे का सबसे बड़ा प्रतीक है।
















