भारतीय सिनेमा के बिल्कुल शुरुआती दौर में जब मूक फिल्मों के बाद किरदारों की आवाज पर्दे से गूंजने लगी थी, तब एक ऐसी संगीतमय दास्तान सामने आई जिसने संगीत का एक अविश्वसनीय पैमाना तय कर दिया। साल 1931 में देश की पहली सवाक फिल्म आलम आरा के आगमन के ठीक एक वर्ष बाद, 1932 में बड़े पर्दे पर इंद्रसभा पेश की गई। यह वह वक्त था जब सिनेमाघर सिर्फ दृश्य देखने का माध्यम नहीं थे, बल्कि थिएटर्स में दर्शक संवादों और संगीत की गूंज सुनकर पूरी तरह सम्मोहित हो जाते थे। करीब पौने चार घंटे की इस विशाल प्रस्तुति ने सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अनूठा कीर्तिमान कायम किया, जिसे आज तक कोई दूसरी फिल्म चुनौती नहीं दे पाई है।
मदन थिएटर्स और लखनऊ के ऐतिहासिक नाटक की विरासत
इस ऐतिहासिक पेशकश को रूपहले पर्दे पर साकार करने का श्रेय कोलकाता की मशहूर नाट्य व फिल्म निर्माण कंपनी मदन थिएटर्स को जाता है। यह प्रस्तुति दरअसल पारसी रंगमंच और सिनेमाई कला का एक बेजोड़ संगम थी। इस कहानी की जड़ें उन्नीसवीं सदी के लखनऊ से जुड़ी हैं, जहां मशहूर शायर आगा हसन अमानत ने साल 1853 में इसे एक प्रसिद्ध उर्दू नाटक के तौर पर रचा था। उस कालखंड में यह नाटक नवाब वाजिद अली शाह के शाही दरबार की सबसे बड़ी रौनक हुआ करता था। पारसी थिएटर मंडलियों ने इस संगीतमय ड्रामे को हिंदुस्तान के कोने-कोने तक पहुंचाकर घर-घर में लोकप्रिय बना दिया था। जब फिल्मों में ध्वनि और गानों की तकनीक आई, तो मदन थिएटर्स ने इस पूरे रंगमंचीय वैभव को सिनेमाई स्वरूप में ढालने का साहसिक फैसला किया।
देवलोक की सभा और जमीनी इश्क का दिलचस्प ताना-बाना
फिल्म का ताना-बाना देवराज इंद्र के भव्य स्वर्गीय दरबार से शुरू होता है, जहां चारों तरफ संगीत की सुरीली तान, परियों का उल्लास और अप्सराओं का मनमोहक नृत्य चलता रहता है। कहानी में असल मोड़ और टकराव तब पैदा होता है, जब देवलोक की एक बेहद हसीन परी को धरती के एक नश्वर राजकुमार से बेपनाह मोहब्बत हो जाती है। चूंकि स्वर्ग के सख्त कायदे-कानून किसी परी को इंसानी राजकुमार से इश्क लड़ाने की इजाजत नहीं देते, इसलिए इस प्रेम संबंध से देवताओं का भारी आक्रोश भड़क उठता है। इसके बाद परियों की रहस्यमयी दुनिया, सख्त इम्तिहान और प्यार की रक्षा के लिए एक भावुक व नाटकीय संघर्ष पर्दे पर उभरता है।
गिनीज बुक में दर्ज 72 गानों का जादुई संसार
मौजूदा दौर के सिनेमा में यदि किसी फिल्म के भीतर पांच या छह गाने भी शामिल हों, तो उसे भारी भरकम संगीत वाली फिल्म मान लिया जाता है। इसके विपरीत, साल 1932 की इस ब्लैक एंड व्हाइट संगीतमय रचना में कुल 72 गाने रखे गए थे। संगीत की इस बेमिसाल विविधता के कारण फिल्म का नाम बाकायदा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। इन 72 गीतों के भीतर शास्त्रीय और लोक परंपराओं का अद्भुत सम्मिश्रण था, जिसमें 31 गजलें, 9 ठुमरियां और 4 होली गीत शामिल थे। लगभग 3 घंटे 51 मिनट लंबी इस फिल्म की अवधि के दौरान इतने सारे गीतों को बेहद खूबसूरती के साथ पिरोया गया था, जिसने इसे भारतीय सिनेमा के आरंभिक दौर की सबसे विलक्षण प्रस्तुति बना दिया।
मास्टर निसार और जहानारा कज्जन की कालजयी जोड़ी
इस महाकाव्यात्मक संगीतमय फिल्म के किरदारों को उस जमाने के दो सबसे दिग्गज कलाकारों ने जीवंत किया था। फिल्म के मुख्य किरदारों में मास्टर निसार और मशहूर गायिका-अभिनेत्री जहानारा कज्जन नजर आए थे। जहानारा कज्जन उस काल में अपनी बेहतरीन गायकी और अभिनय के चलते दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय थीं। मास्टर निसार और जहानारा कज्जन की इस सुपरहिट जोड़ी ने शुरुआती बोलती फिल्मों के संगीत को आम दर्शकों के दिलों तक पहुंचाने और सिनेमा को लोकप्रिय बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया था। यही वजह है कि नौ दशकों से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद यह फिल्म आज भी भारतीय कला जगत की सबसे यादगार रचनाओं में शुमार की जाती है।



















