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छपवा के केला प्लांट संचालक ने बताया एसी और केमिकल से पके केले में अंतर, इस तरह करें असली पहचानजीवनशैली
19 सित॰ 2026, 11:20 pm (23 मिनट पहले)· 1

छपवा के केला प्लांट संचालक ने बताया एसी और केमिकल से पके केले में अंतर, इस तरह करें असली पहचान

पूर्वी चंपारण के छपवा में केला प्लांट चलाने वाले मोहम्मद नईम ने बताया कि एसी में तापमान नियंत्रित कर पकाया गया केला सेहत के लिए पूरी तरह सुरक्षित है, जबकि रसायनों से पके फल नुकसानदेह हो सकते हैं।

बाजार में बिकने वाले फलों की शुद्धता और उन्हें पकाने के तौर-तरीकों को लेकर अक्सर लोगों के मन में संशय बना रहता है। केला हर मौसम में आसानी से मिलने वाला और पोषण से भरपूर फल है, लेकिन मंडियों में इसकी भारी मांग के चलते कई बार इसे कृत्रिम रसायनों से पकाने की शिकायतें आती रहती हैं। आम उपभोक्ता के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा केला प्राकृतिक तरीके से तैयार हुआ है और किसे रसायनों की मदद से जबरन पकाया गया है। इस विषय पर सटीक और व्यावहारिक समझ होना इसलिए जरूरी है क्योंकि फलों को पकाने में इस्तेमाल होने वाले विषैले तत्व सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

पूर्वी चंपारण के प्लांट में कैसे होता है काम

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के छपवा इलाके में कच्चे केलों को पकाने के लिए एक बड़ा संयंत्र काम कर रहा है। इस इकाई के संचालक मोहम्मद नईम पिछले 7 वर्षों से इस व्यवसाय में सक्रिय हैं और बताते हैं कि एसी चेंबर में तापमान को नियंत्रित करके पकाया गया फल प्राकृतिक फल की तरह ही खाने योग्य और सुरक्षित रहता है। उनके इस संयंत्र में कच्चे फलों की आवक चार प्रमुख राज्यों से होती है, जिनमें आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और खुद बिहार शामिल हैं। यहां तैयार होने वाले केलों की आपूर्ति चंपारण क्षेत्र के लगभग हर स्थानीय फल बाजार में की जाती है।

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एसी में पकने और रसायनों के इस्तेमाल में बड़ा अंतर

मोहम्मद नईम के अनुसार, रसायनों से तैयार किए गए केले की पहचान उसके छिलके और बनावट से तुरंत की जा सकती है। जब फल को रसायनों के जरिए पकाया जाता है, तो उसका छिलका ऊपर से हरा ही दिखता है लेकिन अंदर से गूदा कई जगहों से अत्यधिक गल जाता है। दूसरी तरफ, एसी तकनीक से तैयार केला पकने के बाद प्राकृतिक रूप से हल्का पीला रंग ले लेता है। इसमें किसी तरह की अस्वाभाविक सड़न या अत्यधिक गलन देखने को नहीं मिलती, जिससे इसकी गुणवत्ता बरकरार रहती है। उनका स्पष्ट सुझाव है कि लोगों को केवल सामान्य रूप से या एसी विधि से तैयार फल ही खरीदने चाहिए और केमिकल से तैयार फलों से दूर रहना चाहिए।

72 घंटे की नियंत्रित प्रक्रिया का पूरा गणित

नियंत्रित वातावरण में केला तैयार करने की वैज्ञानिक विधि समझाते हुए संचालक बताते हैं कि इसमें किसी बाहरी जहरीले रसायन की जरूरत नहीं पड़ती। सबसे पहले बाहर से आए कच्चे केलों को विशेष एसी चेंबर में लगभग 20 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर पूरे 24 घंटे के लिए रखा जाता है। इस चरण के बाद फल को अगले 12 घंटे तक हल्की गर्मी दी जाती है। इस पूरी अवधि के दौरान केला खुद प्राकृतिक तौर पर एथिलीन छोड़ता है, जो फलों के स्वाभाविक विकास और पकने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। तापमान और वातावरण के इसी तालमेल के साथ कुल 72 घंटे का चक्र पूरा होने के बाद कच्चा केला पूरी तरह पककर बाजार में बिक्री और खाने के लिए तैयार हो जाता है।

सवाल-जवाब

एसी में पका केला स्वास्थ्य के लिए कैसा होता है?
प्लांट संचालक मोहम्मद नईम के अनुसार, एसी में तापमान नियंत्रित कर पकाया गया केला प्राकृतिक तरीके से पके केले जितना ही सुरक्षित होता है।
केमिकल से पके केले की क्या पहचान है?
केमिकल से पका केला पकने के बावजूद बाहर से हरा रहता है और अंदर से कई स्थानों पर अत्यधिक गल जाता है।
एसी चेंबर में केला पकाने में कुल कितना समय लगता है?
इस पूरी प्रक्रिया में कुल 72 घंटे का समय लगता है, जिसमें 24 घंटे 20 डिग्री सेल्सियस पर रखने के बाद 12 घंटे गर्मी दी जाती है।
छपवा स्थित केला प्लांट में फल कहां से मंगवाए जाते हैं?
इस संयंत्र में कच्चे केले चार राज्यों आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश से मंगाए जाते हैं।
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