केरल के कोच्चि में बहुचर्चित अभिमन्यु हत्याकांड मामले की सुनवाई शुरू होते ही अदालत कक्ष में एक हैरान कर देने वाला दृश्य सामने आया। इस मुकदमे में नामजद सभी 16 आरोपी एक जैसे पहनावे में कोर्ट पहुंचे, जिससे वहां मौजूद लोग और अधिकारी भी कुछ देर के लिए असमंजस में पड़ गए। सभी आरोपियों ने सफेद रंग की हाफ-स्लीव कमीज, सफेद लुंगी यानी मुंडू, काले जूते पहन रखे थे और सिर पर टोपी तथा चेहरे पर मास्क लगा रखा था। उनका यह एक जैसा हुलिया इतना मेल खा रहा था कि अदालत के भीतर व्यक्तिगत तौर पर हर एक को पहचान पाना बेहद कठिन हो गया था। इस असामान्य स्थिति को देखते हुए प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के.के. बालकृष्णन ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की और सभी आरोपियों को तत्काल प्रभाव से अपने चेहरे से मास्क हटाने का सख्त निर्देश दिया।
अदालत की कड़ी चेतावनी और मुकदमे की शुरुआत
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में यह चेतावनी दी कि चेहरे को पूरी तरह ढककर न्यायिक प्रक्रिया में पेश होना अस्वीकार्य है। न्यायाधीश ने यह भी हिदायत दी कि यदि आने वाली सुनवाइयों या गवाहों से जिरह के दौरान किसी ने भी अपना हुलिया बदलकर या पहचान छिपाने का कोई अन्य प्रयास किया, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह न्यायिक कार्यवाही इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि एसएफआई नेता अभिमन्यु की हत्या के करीब आठ साल के लंबे अंतराल के बाद इस मामले में मुख्य मुकदमे की सुनवाई आखिरकार शुरू हो पाई है। वर्तमान में अदालत परिसर के भीतर चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया चल रही है और अभियोजन पक्ष आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए मजबूत सबूत पेश कर रहा है।
साल 2018 में हुई थी एसएफआई नेता की हत्या
यह पूरा मामला दो जुलाई 2018 की तड़के का है जब केरल के महाराजा कॉलेज में बीएससी केमिस्ट्री के दूसरे वर्ष के छात्र और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के सक्रिय नेता अभिमन्यु की कॉलेज परिसर के भीतर हत्या कर दी गई थी। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले दीवारों पर पोस्टर लगाने और स्लोगन लिखने को लेकर छात्रों के दो गुटों के बीच अचानक हिंसक झड़प हो गई थी। इसी विवाद के दौरान अभिमन्यु की छाती में चाकू घोंप दिया गया, जिससे उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया था। इस सनसनीखेज वारदात में कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया के कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया गया था, जिसे प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का छात्र संगठन माना जाता है। पुलिस ने घटना के तुरंत बाद अपनी चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी थी, लेकिन विभिन्न कानूनी प्रक्रियाओं और अड़चनों के कारण मुकदमे के ट्रायल शुरू होने में लगभग आठ साल का लंबा समय बीत गया।
चश्मदीद की गवाही और पहचान की प्रक्रिया
सुनवाई के पहले ही दिन अभियोजन पक्ष की ओर से मुख्य चश्मदीद गवाह सुबिन को अदालत में पेश किया गया और उससे पूछताछ की गई। सुबिन उसी कॉलेज में अभिमन्यु का सहपाठी था और घटना के वक्त वह वहीं मौजूद था। उसने अदालत को बताया कि यद्यपि सभी आरोपियों ने अपने बाल और दाढ़ी एक ही शैली में कटवा रखे थे, फिर भी उसने कई आरोपियों की सटीक पहचान कर ली। इस पहचान में मुख्य संदिग्ध और वह व्यक्ति भी शामिल था जिस पर सीधे तौर पर घातक चाकू से हमला करने का गंभीर आरोप है। गवाह ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि उसकी यह पहचान पुलिस को दिए गए उसके शुरुआती बयानों और तहसीलदार की देखरेख में हुई पहचान परेड से पूरी तरह मेल खाती है। हालांकि, वह अदालत कक्ष में मौजूद तीन अन्य आरोपियों को पहचानने में असमर्थ रहा। कानूनी रूप से गवाह की यह पहचान स्वतः किसी को दोषी साबित नहीं करती, क्योंकि अंतिम निर्णय अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही करना है।
बंद कमरे में सुनवाई की मांग हुई खारिज
मुकदमे की शुरुआत से पहले आरोपियों के वकीलों ने अदालत में एक याचिका दायर कर यह अनुरोध किया था कि पूरे मुकदमे की कार्यवाही को बंद कमरे में यानी इन-कैमरा ट्रायल के रूप में चलाया जाए। उनका तर्क था कि खुली अदालत में सुनवाई होने और मीडिया में व्यापक कवरेज मिलने से आरोपियों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और गवाहों की निष्पक्षता भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, एर्नाकुलम की प्रधान जिला एवं सत्र अदालत ने 22 सितंबर को इस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत का मत था कि आरोपियों द्वारा जताई गई आशंकाएं खुली अदालत की कार्यवाही को प्रतिबंधित करने के लिए पर्याप्त और वैध आधार नहीं हैं। इस फैसले के बाद मुकदमे की नियमित कार्यवाही को सार्वजनिक रूप से जारी रखने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।
गवाहों की जिरह को लेकर कानूनी बहस
अदालत की कार्यवाही के दौरान बचाव पक्ष ने एक और अहम मांग रखते हुए यह आग्रह किया कि सभी सात चश्मदीद गवाहों की मुख्य गवाही पूरी होने के बाद ही उनसे एक साथ जिरह की जाए। बचाव पक्ष का तर्क था कि यदि एक गवाह की जिरह दूसरे गवाह के मुख्य बयान से पहले कर ली गई, तो बाद में गवाही देने वाले लोग पहले पूछे गए सवालों और उत्तरों से प्रभावित हो सकते हैं। इसके विपरीत, अभियोजन पक्ष और मृतक अभिमन्यु के परिवार की पैरवी कर रहे वकीलों ने इस मांग का पुरजोर विरोध किया। उनका कहना था कि जिरह की प्रक्रिया को टालने से पूरी न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है और इससे आरोपियों को अपना हुलिया बदलने या गवाहों को प्रभावित करने का अनुचित अवसर मिल सकता है। अदालत ने इन तमाम दलीलों को सुनने के बाद अभियोजन पक्ष को इस याचिका पर अपनी लिखित आपत्ति दाखिल करने का निर्देश दिया और गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को 12 नवंबर तक जारी रखने का कार्यक्रम तय किया। इससे पहले केरल हाईकोर्ट ने भी यह निर्देश दिया था कि इस पूरे मुकदमे को चार महीने की तय अवधि के भीतर पूरा किया जाए।



















