महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से एक बेहद विचलित करने वाली घटना सामने आई है, जिसने समाज में फैली रूढ़ियों और मान्यताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक दिन के नवजात शिशु की मौत के बाद उसके अपने परिजनों ने ही अंतिम संस्कार करने से किनारा कर लिया। हैरानी की बात यह है कि परिवार ने नवरात्रि के दौरान अपनी कुछ खास धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का हवाला दिया, जिसके चलते उन्होंने बच्चे के शव को छूने तक से मना कर दिया। इस पूरी घटना के दौरान श्मशान घाट के कर्मचारियों ने मानवता की मिसाल पेश करते हुए आगे बढ़कर अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी निभाई, जबकि बच्चे का पिता कुछ ही दूरी पर खड़े होकर यह सब तमाशा देखता रहा।
अस्पताल में जन्म के कुछ घंटों बाद ही थम गई सांसें
यह पूरी घटना छत्रपति संभाजीनगर में गजानन महाराज मंदिर के पास स्थित एक निजी अस्पताल की है। जलगांव जिले का रहने वाला यह दंपती काम के सिलसिले में पिछले करीब एक साल से छत्रपति संभाजीनगर में ही रह रहा था। महिला ने सोमवार रात को अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया था, लेकिन प्रसव के दौरान कुछ जटिलताएं बढ़ गईं और अगली सुबह होते-होते नवजात की मौत हो गई। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब बच्चे के शव के अंतिम संस्कार की बात आई, तो परिवार ने आगे आने से साफ मना कर दिया। उनका तर्क था कि नवरात्रि के इन दिनों में उनके समाज और परिवार की परंपरा के अनुसार नवजात शिशु या प्रसूता को छूना वर्जित है और ऐसी स्थिति में वे अंतिम संस्कार जैसे अनुष्ठान नहीं कर सकते हैं।
पिता ने खुद फोन कर श्मशान घाट के कर्मचारियों को बुलाया
जब परिवार ने बच्चे के शव को हाथ लगाने से भी इंकार कर दिया, तब लाचार पिता ने सेंट्रल नाका श्मशान घाट के कर्मचारियों से संपर्क किया और उनसे बच्चे के शव को ले जाने की विनती की। पिता के बुलावे पर देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले नाम के कर्मचारी अस्पताल पहुंचे। इस दौरान अस्पताल और मौके पर परिवार के पांच से छह रिश्तेदार भी मौजूद थे, लेकिन किसी भी शख्स की हिम्मत नहीं हुई या किसी ने भी जिम्मेदारी नहीं समझी कि वे बच्चे के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठा सकें। अंततः सभी रिश्तेदार वहां से किनारा कर गए और शव को ले जाने का पूरा जिम्मा श्मशान घाट के उन कर्मचारियों के कंधों पर आ गया।
150 मीटर की दूरी से सब कुछ देखता रहा पिता
अंतिम संस्कार के इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक और झकझोर देने वाला पहलू यह रहा कि पिता कर्मचारियों के साथ उसी वाहन में आने के बजाय एक अलग ऑटो से श्मशान घाट पहुंचा। श्मशान घाट पहुंचने पर भी उसने बच्चे के शव के पास जाने से परहेज किया। वह श्मशान घाट की मुख्य जगह से करीब 100 से 150 मीटर की दूरी पर एक कोने में चुपचाप खड़ा रहा। कर्मचारियों ने उसे कई बार आवाज दी और पास आकर बच्चे का चेहरा देखने तथा अंतिम संस्कार की रस्मों में शामिल होने का अनुरोध किया, लेकिन उसने हर बार मना कर दिया। पिता ने कर्मचारियों से ही आग्रह किया कि वे ही सारी प्रक्रिया को पूरा कर दें। इतना ही नहीं, उसने कथित तौर पर अगले दिन बच्चे के जरूरी दस्तावेज लेने से भी इनकार कर दिया और केवल आवश्यक कागजातों पर हस्ताक्षर करके वहां से रवाना हो गया।
कर्मचारियों की आंखों में आए आंसू और कब्रिस्तान की रस्में
देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले ने पूरी संवेदना के साथ नवजात के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को पूरा किया और बच्चे को दफनाया गया। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार की तरफ से कोई भी सदस्य सक्रिय रूप से शामिल नहीं हुआ। हालांकि, जब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, तब पिता कुछ पल के लिए आगे आया और बच्चे की कब्र के ऊपर थोड़ा सा दूध अर्पित किया और वहां से चुपचाप चला गया। इस पूरी घटना को अपनी आंखों से देखने वाले श्मशान घाट के कर्मचारी अंदर तक हिल गए। वे रोजाना अपने जीवन में अंतिम संस्कार और मौत जैसे दृश्यों को देखते हैं, लेकिन एक दिन के नवजात शिशु के साथ उसके अपनों द्वारा किए गए इस बर्ताव ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया और उनकी आंखों में आंसू आ गए।


















