तीन दशकों तक फर्जी पहचान के सहारे समाज में रसूख बनाए रखने और चिकित्सा क्षेत्र के नाम पर भारी भरकम वित्तीय साम्राज्य खड़ा करने का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक व्यक्ति ने करीब 30 वर्षों तक खुद को चिकित्सक बताकर लोगों और कॉरपोरेट जगत की आंखों में धूल झोंकी। इस पूरे मामले का पर्दाफाश तब हुआ जब प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने उसकी संदिग्ध गतिविधियों को अपने रडार पर लिया। वित्तीय जांच एजेंसी की पड़ताल में सामने आया कि जिस शख्स ने खुद को बड़ा डॉक्टर बताकर अरबों का तंत्र तैयार कर लिया, उसके पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से मेडिकल डिग्री तो दूर, 12वीं कक्षा के बाद की नियमित पढ़ाई का भी कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है। इसी फर्जीवाड़े और बातों के जाल में लोगों को उलझाकर उसने करीब 200 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लिया था।
चैरिटेबल ट्रस्ट और सीएसआर फंड के नाम पर बना जाल
इस पूरे घोटाले की नींव पूरी तरह से एक झूठी साख पर टिकी हुई थी। धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह नाम के इस शख्स ने खुद को ‘डॉक्टर’ के रूप में समाज में स्थापित किया और लोगों के बीच ऐसा प्रभाव बनाया कि सभी उस पर बिना किसी जांच-परख के भरोसा करने लगे। इस कथित साख का बेजा फायदा उठाते हुए उसने कई धर्मार्थ ट्रस्ट और गैर सरकारी संस्थाएं बना लीं। संस्थाओं के गठन के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी पीएसयू और कई प्रतिष्ठित निजी कंपनियों से संपर्क साधा गया। इन बड़ी कंपनियों के सामने स्वास्थ्य सुधार और जनहित से जुड़े बेहद आकर्षक सीएसआर यानी कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व प्रोजेक्ट्स पेश किए जाते थे, ताकि वहां से भारी मात्रा में अनुदान हासिल किया जा सके।
फर्जी बिलिंग और नकद वापसी का सुनियोजित खेल
कंपनियों से वेलफेयर प्रोजेक्ट्स के नाम पर करोड़ों का सीएसआर फंड आवंटित होने के बाद असली धांधली शुरू होती थी। आवंटित रकम मिलने के बाद स्वास्थ्य परियोजनाओं को या तो बीच में ही अधूरा छोड़ दिया जाता था या फिर केवल कागजों पर ही उन्हें पूरी तरह संचालित दिखा दिया जाता था। इसके बाद कागजी स्तर पर काम दिखाने के लिए शेल और बोगस कंपनियों का सहारा लेकर बढ़ा-चढ़ाकर फर्जी बिल तैयार किए जाते थे और फंड से रकम बाहर निकाल ली जाती थी। इस सिंडिकेट का सबसे खतरनाक पहलू यह था कि कंपनियों से आए सीएसआर अनुदान का एक बड़ा हिस्सा वापस नकद के रूप में लौटा दिया जाता था। आरोपी इस पूरी प्रक्रिया के एवज में अपना तय कमीशन काटकर अपने पास रख लेता था, जबकि बाकी बची भारी रकम संबंधित कंपनियों को अवैध तरीके से कैश में वापस दे दी जाती थी।
चार राज्यों के आठ ठिकानों पर एजेंसी की ताबड़तोड़ कार्रवाई
जांच एजेंसी को अंदेशा है कि इस पूरे सिंडिकेट के जरिए कंपनियों के वैध यानी अकाउंटेड पैसे को अवैध नकदी में बदलने का संगठित खेल चलाया जा रहा था। मामले की शुरुआत मुंबई के जुहू पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक शुरुआती प्राथमिकी से हुई थी। उसी एफआईआर के आधार पर आगे बढ़ते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के तहत मामला दर्ज कर जांच अपने हाथ में ले ली। मामले की तह तक पहुंचने के लिए एजेंसी ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में एक साथ आठ विभिन्न ठिकानों पर व्यापक तलाशी अभियान चलाया है। फिलहाल टीम जब्त दस्तावेजों, वित्तीय लेनदेन के बहीखातों और डिजिटल रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि 200 करोड़ रुपये के इस नेटवर्क के पीछे कौन से कॉरपोरेट घराने, बिचौलिए और प्रभावशाली चेहरे सक्रिय थे।



















