सरकारी योजनाओं के जरिए वित्तीय सहायता पाने की उम्मीद में बैठे सीधे-साधे लोगों को इन दिनों साइबर ठगों द्वारा बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जा रहा है। इस खतरनाक खेल में देश के प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के प्रतिष्ठित नामों, तस्वीरों के साथ-साथ परिष्कृत डीपफेक वीडियो का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तरह-तरह के लुभावने फर्जी विज्ञापन दिखाए जाते हैं, जिनके माध्यम से आम जनता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उन्हें किसी खास सरकारी योजना के तहत भारी भरकम रकम मिलने वाली है। जब लोग इस झांसे में आ जाते हैं, तो उनसे टैक्स, रजिस्ट्रेशन फीस और प्रोसेसिंग चार्ज के नाम पर लगातार पैसे ऐंठे जाते हैं। कई मामलों में तो ठग बेहद चालाकी से लोगों से यूपीआई पिन डलवाकर उनके बैंक खातों को मिनटों में खाली कर देते हैं।
इस तरह की बढ़ती और सुनियोजित धोखाधड़ी की वारदातों को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर की नेशनल साइबर क्राइम थ्रेट एनालिटिक्स यूनिट ने एक विस्तृत एडवाइजरी जारी की है। इस आधिकारिक चेतावनी में आम नागरिकों को विशेष रूप से आगाह किया गया है कि वे सोशल मीडिया पर दिखने वाले किसी भी तरह के सरकारी योजना संबंधी विज्ञापनों, संदिग्ध और अनजान फोन कॉल्स तथा किसी भी अनचाही ऑनलाइन पेमेंट रिक्वेस्ट को लेकर अत्यधिक सतर्कता बरतें। अपराधियों का यह नया पैंतरा लोगों की आर्थिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट बनता जा रहा है, जिसे रोकने के लिए प्रशासन लगातार जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रहा है।
फेसबुक और इंस्टाग्राम पर फर्जी विज्ञापनों का जाल
साइबर अपराधी अपने इस काले कारोबार को फैलाने के लिए मुख्य रूप से फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर प्रायोजित फर्जी विज्ञापन चलाए जाते हैं, जिनमें प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और देश के अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तस्वीरों और बयानों को मॉर्फ करके डीपफेक वीडियो तैयार किए जाते हैं। इन जाली वीडियो को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि देखने वाले को ऐसा बिल्कुल भ्रम होता है कि संबंधित संवैधानिक पद पर बैठा कोई बड़ा नेता खुद किसी कल्याणकारी सरकारी योजना की घोषणा कर रहा है।
इन विज्ञापनों में यह झूठा और लुभावना वादा किया जाता है कि समाज के जरूरतमंद तबके के लोगों को सीधे उनके बैंक खातों में बड़ी आर्थिक सहायता पहुंचाई जाएगी। जालसाज ऐसे विज्ञापनों में अक्सर संपर्क के लिए मोबाइल नंबर या व्हाट्सएप नंबर भी चस्पा कर देते हैं, या फिर पीड़ितों को एक फर्जी वेबसाइट पर रीडायरेक्ट कर देते हैं। उस बहुरूपिया पोर्टल पर लोगों से योजना का लाभ पाने के नाम पर उनके निजी दस्तावेज और बैंक संबंधी संवेदनशील जानकारियां भरने के लिए कहा जाता है। जैसे ही कोई नागरिक इस सुनियोजित झांसे में पूरी तरह फंस जाता है, ठगों की टीम उससे सीधे संपर्क साधती है और सरकारी मदद के नाम पर पैसे की मांग का सिलसिला शुरू कर देती है।
टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस के नाम पर बार-बार वसूली
ठगी की इस पूरी प्रक्रिया का अगला और सबसे बड़ा चरण लोगों की गाढ़ी कमाई को अलग-अलग बहानों से वसूलना होता है। जब एक बार कोई व्यक्ति इन ठगों के संपर्क में आ जाता है, तो साइबर अपराधी उसे यह कहकर डराते या समझाते हैं कि सरकारी सहायता की भारी-भरकम राशि उसके बैंक खाते में ट्रांसफर करने से पहले कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी। इन औपचारिकताओं में मुख्य रूप से टैक्स, प्रोसेसिंग फीस, रजिस्ट्रेशन चार्ज या फिर वेरिफिकेशन फीस के रूप में एक निश्चित राशि पहले जमा कराने की बात कही जाती है।
आम इंसान यही सोचता है कि अगर वह थोड़ी सी रकम फीस के रूप में जमा कर देगा, तो बदले में उसे सरकारी योजना के तहत बहुत बड़ा वित्तीय लाभ मिल जाएगा। इसी सुनहरी उम्मीद और लालच में आकर लोग अपनी जेब से पैसे ट्रांसफर कर देते हैं। लेकिन अपराधियों का यह चक्र यहीं नहीं रुकता है, बल्कि पैसे मिलने के बाद वे किसी नई तकनीकी समस्या या नई फीस का झूठा बहाना बनाकर दोबारा से रकम की मांग करना शुरू कर देते हैं। इस तरह एक ही बेकसूर इंसान से कई बार अलग-अलग शुल्कों के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं, जबकि असलियत में यह पूरा का पूरा सरकारी सहायता का नाटक केवल एक शातिर साइबर ठगी का हिस्सा होता है।
स्क्रैच कार्ड और स्पिन-एंड-विन का नया हथकंडा
साइबर ठगों की जालसाजी केवल सरकारी योजनाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे लोगों को ठगने के लिए नए-नेक तरीके और लुभावने प्रलोभन रोजाना ढूंढते रहते हैं। कई फर्जी विज्ञापनों में स्क्रैच कार्ड और स्पिन-एंड-विन जैसे आकर्षक ऑफर्स दिखाए जाते हैं, जिनके जरिए लोगों को मुफ्त कैशबैक या बड़े इनाम जीतने का खुला लालच दिया जाता है। पीड़ितों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उन्होंने एक लकी ड्रॉ या प्रतियोगिता जीत ली है और उस जीती हुई इनाम की रकम को तुरंत अपने खाते में प्राप्त करने के लिए उन्हें किसी पेमेंट ऐप पर जाकर कुछ आसान सी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।
इसी निर्धारित प्रक्रिया के दौरान ठग बहुत चालाकी से यूजर के पास एक यूपीआई कलेक्ट रिक्वेस्ट भेजते हैं और उसे मंजूर करवाते हैं या फिर सीधे तौर पर यूपीआई पिन दर्ज करने का निर्देश देते हैं। साधारण नागरिक यह समझता है कि वह अपने इनाम के पैसे अपने खाते में ले रहा है, लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है, वह अपने ही हाथों से अपने बैंक खाते से पैसे भेजने की अनुमति दे रहा होता है। जैसे ही पीड़ित व्यक्ति अपनी तरफ से यूपीआई पिन डालता है, उसके बैंक खाते से पैसे पलक झपकते ही कट जाते हैं और सीधे ठगों की जेब में पहुंच जाते हैं।
+92 से शुरू होने वाले नंबरों और कॉल्स से रहें बेहद सावधान
गृह मंत्रालय द्वारा जारी की गई इस महत्वपूर्ण एडवाइजरी में पाकिस्तान के कंट्री कोड यानी +92 से शुरू होने वाले फोन नंबरों से आने वाली कॉल्स और व्हाट्सएप संदेशों को लेकर विशेष रूप से गहरी सतर्कता बरतने की सख्त सलाह दी गई है। इस तरह के कई डरावने और संदिग्ध मामलों में ठग विदेश से फोन करके भोले-भाले लोगों को यह झांसा देते हैं कि उन्हें किसी विशेष सरकारी योजना के तहत वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए चुना गया है। इसके बाद उस सरकारी रकम को प्राप्त करने के एवज में तुरंत फीस जमा करने या अपनी गोपनीय निजी जानकारी साझा करने का दबाव बनाया जाता है।
हालांकि केवल +92 नंबर होने मात्र से ही किसी कॉल को सौ फीसदी ठगी का प्रमाणित मामला नहीं माना जा सकता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब भी कोई अज्ञात व्यक्ति सरकारी योजना के नाम पर पैसों की मांग करे या बैंक खातों की गुप्त जानकारी मांगे, तो हर नागरिक को अत्यधिक चौकस रहने की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय नंबरों से आने वाले ऐसे तमाम संदेशों को नजरअंदाज करना ही समझदारी है, क्योंकि अपराधी अक्सर अपनी असली पहचान छिपाने के लिए ऐसे तकनीकी तरीकों का सहारा लेते हैं।



















