फिल्मी सितारे टाइगर श्रॉफ पर हुए खतरनाक हमले के बाद से लॉरेंस बिश्नोई गैंग एक बार फिर देश भर की सुर्खियों में आ गया है। इस हालिया घटना की जिम्मेदारी इस गिरोह के करीबी अनिल पंडित ने ली है, जिसके बाद से इस संगठित अपराध सिंडिकेट के काम करने के तौर-तरीकों, वित्तीय स्रोतों और सक्रिय सदस्यों की वास्तविक संख्या पर व्यापक बहस छिड़ गई है। मौजूदा समय में सरगना लॉरेंस बिश्नोई गुजरात की साबरमती जेल के अंदर कैद है, लेकिन इसके बावजूद लगातार कई बड़ी आपराधिक वारदातों में उसका नाम खुलकर सामने आ रहा है। इन गंभीर हालातों के बीच पूर्व आईपीएस अधिकारी पीके जैन ने इस गिरोह के काले कारोबार से जुड़ी कई अंदरूनी और महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं।
साल 2010 के बाद से शुरू हुआ तेजी से विस्तार
पूर्व आईपीएस अधिकारी पीके जैन के अनुसार, इस आपराधिक गिरोह का प्रभाव और दायरा साल 2010 के बाद से काफी ज्यादा बढ़ना शुरू हुआ था। लॉरेंस बिश्नोई का जन्म साल 1993 में हुआ था और वह अपने स्कूली दिनों तथा कॉलेज के शुरुआती दौर से ही गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त होने लगा था। छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के दौरान भी उसके ऊपर मारपीट, हत्या के प्रयास और जबरन वसूली जैसे करीब सात मामले दर्ज किए जा चुके थे। आगे चलकर उसने गोल्डी बराड़ के साथ हाथ मिलाया और दोनों ने मिलकर अपने इस आपराधिक नेटवर्क को और अधिक फैलाया। उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, लॉरेंस बिश्नोई गैंग के गुर्गे महाराष्ट्र की 50 जेलों में बंद हैं।
सक्रिय सदस्यों की संख्या और अवैध कमाई के जरिए
पूर्व आईपीएस पीके जैन ने स्पष्ट किया कि इस गिरोह ने शुरुआत में कनाडा और यूएई जैसे देशों के रईस और अमीर कारोबारियों को डरा-धमकाकर रंगदारी वसूलनी शुरू की थी। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ ये लोग नशीले पदार्थों यानी ड्रग्स के अवैध कारोबार में भी पूरी तरह से कूद पड़े। गिरोह के पास कुल 70 हजार सदस्य होने का जो दावा अक्सर किया जाता है, वह पूरी तरह से गलत और असंभव प्रतीत होता है, क्योंकि इतनी विशाल संख्या को किसी एक जगह से नियंत्रित करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। उनके आकलन के अनुसार, इस पूरे सिंडिकेट में सक्रिय सदस्यों की वास्तविक संख्या केवल 600 से 800 के बीच हो सकती है। पीके जैन ने यह भी रेखांकित किया कि खुद लॉरेंस बिश्नोई और अनमोल बिश्नोई के सलाखों के पीछे होने के बावजूद यह नेटवर्क कैसे सुचारू रूप से चल रहा है, इसकी गहरी जांच होना बेहद आवश्यक है। ऐसी मजबूत आशंका जताई जाती है कि जेल के भीतर से फोन कॉल के माध्यम से या फिर मुलाकातों के दौरान आने वाले लोगों के जरिए ही अपने अगले शिकार की सटीक जानकारी और वारदातों की योजनाएं बाहर पहुंचाई जाती हैं।
नए लड़कों को शामिल करने का तरीका और मोडस ऑपरेंडी
पूर्व आईपीएस अधिकारी ने बताया कि यह गिरोह मुख्य रूप से जेलों के अंदर बंद और उत्तर प्रदेश तथा अन्य उत्तर भारतीय राज्यों के युवा लड़कों को पैसे, रुतबे और नाम कमाने का झूठा लालच देकर अपने साथ जोड़ता है। इन नौजवानों को मोहरा बनाकर उन्हें खास निर्देश दिए जाते हैं और डराने-धमकाने तथा गोलीबारी जैसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए उनका बेझिझक इस्तेमाल किया जाता है। उत्तर भारत के राज्यों में अवैध देसी कट्टों की आसानी से उपलब्धता और पाकिस्तान की सीमा पार से आधुनिक हथियार पहुंचाए जाने की आशंका कानून-व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। उन्होंने बताया कि इस गिरोह के काम करने का पुराना तरीका यानी मोडस ऑपरेंडी हमेशा से ही पहले धमकी देना, फिर सरेआम हमला करवाना, भारी एक्सटॉर्शन वसूलना और इसके दम पर अपराध जगत में अपनी दहशत तथा दौलत बढ़ाना रहा है। साल 2012 में अभिनेता सलमान खान को पहली बार खुलेआम धमकी दिए जाने के बाद से ही आपराधिक वारदातों का यह सिलसिला लगातार तेज होता चला गया। सलमान खान के आवास के बाहर ताबड़तोड़ फायरिंग करना, कपिल शर्मा के कैफे पर हमला करवाना, निर्देशक रोहित शेट्टी को धमकियां मिलना, टाइगर श्रॉफ पर जानलेवा हमला होना और राजनेता बाबा सिद्दीकी की सनसनीखेज हत्या जैसी तमाम बड़ी वारदातों में इसी खतरनाक गैंग का नाम प्रमुखता से सामने आया है।
इस खतरनाक आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कैसे कसी जाए
पीके जैन के विचार में, यदि महाराष्ट्र सरकार पूरी दृढ़ता से चाहे तो वह गुजरात की साबरमती जेल में जाकर सीधे लॉरेंस बिश्नोई से आमने-सामने पूछताछ कर सकती है। बाबा सिद्दीकी की सनसनीखेज हत्या के ठीक बाद महाराष्ट्र की स्थानीय पुलिस ने उसकी कानूनी कस्टडी हासिल करने की भरपूर कोशिश की थी, लेकिन देश के केंद्रीय कानूनों से जुड़े कुछ प्रावधानों के कारण यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस कुख्यात गिरोह की कमर तोड़ने के लिए सबसे पहले उनके आपसी संचार माध्यमों और कम्युनिकेशन नेटवर्क को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा। पिछले दौर में महाराष्ट्र राज्य के भीतर कुख्यात अंडरवर्ल्ड की ताकतों पर पूरी तरह से नकेल कसने के लिए मकोका जैसा बेहद सख्त कानून लाया गया था। इस तरह के कड़े कानूनों के खौफ की वजह से ही नए लड़कों का अपराधियों के गिरोह में शामिल होना काफी हद तक कम हो गया था, क्योंकि उन्हें यह पक्का डर रहता था कि पकड़े जाने पर उन्हें लंबी अवधि तक जेल में सड़ना पड़ेगा। आज के समय में भी बिल्कुल वैसे ही कठोर कदम उठाने की जरूरत है और देश भर के सभी राज्यों की पुलिस तथा केंद्रीय जांच एजेंसियों को आपसी तालमेल बिठाकर एक साथ मिलकर साझा कार्रवाई करनी होगी।



















