भारत में डिजिटल संपत्तियों और क्रिप्टोकरेंसी की तरफ निवेशकों का आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी वित्तीय नीतियों और जोखिम प्रबंधन को लेकर स्थिति साफ की है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शनिवार को स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक क्रिप्टोकरेंसी को लेकर बेहद सचेत और सतर्क दृष्टिकोण अपनाए हुए है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि केंद्रीय बैंक उन बुनियादी तकनीकों का स्वागत करता है जो क्रिप्टो संपत्तियों की बुनियाद हैं, जैसे डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी और टोकन व्यवस्था। भारत नवाचार के पक्ष में खड़ा है, परंतु राष्ट्रीय संप्रभुता, मौद्रिक नीतियों के संचालन और सीमाओं के पार पूंजी के अनियंत्रित प्रवाह से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बुनियादी तकनीक का स्वागत पर निजी डिजिटल कॉइन पर सावधानी
केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि तकनीक का विरोध करने के बजाय उसके सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया जा रहा है। डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी एक विकेंद्रीकृत डिजिटल प्रणाली है, जहां किसी भी वित्तीय लेन-देन या सूचना का रिकॉर्ड किसी एक केंद्रीय सर्वर पर रखने के बजाय नेटवर्क के कई कंप्यूटरों में साझा रूप से दर्ज किया जाता है। दूसरी तरफ, टोकन व्यवस्था एक ऐसी सुरक्षा प्रक्रिया है जिसके जरिए किसी वास्तविक संपत्ति या डेबिट और क्रेडिट कार्ड जैसी बेहद संवेदनशील जानकारियों को एक विशिष्ट डिजिटल कोड में बदल दिया जाता है। संजय मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक का दृष्टिकोण इन अंतर्निहित प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने का रहा है, और इनमें से कुछ का इस्तेमाल केंद्रीय बैंक के भीतर तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत बाहरी स्तर पर भी किया जा रहा है।
मौद्रिक नीति और पूंजी नियंत्रण से जुड़े गंभीर खतरे
क्रिप्टोकरेंसी को सीधे तौर पर अपनाने में आने वाली अड़चनों को समझाते हुए गवर्नर ने बताया कि सबसे बड़ा सवाल पैसे के एक समान मूल्य यानी मुद्रा की एकरूपता का है। अगर अनियंत्रित निजी डिजिटल मुद्राएं बड़े पैमाने पर चलन में आ जाती हैं, तो केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति को लागू करने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। यह स्थिति उन उभरते हुए देशों के लिए और भी ज्यादा संवेदनशील बन जाती है जहां अर्थव्यवस्था की स्थिरता बनाए रखने के लिए पूंजी प्रवाह पर नियम और पाबंदियां लागू की गई हैं। जब पूंजी बिना किसी औपचारिक बैंकिंग माध्यम के देश से बाहर जाने लगेगी, तो घरेलू वित्तीय तंत्र पर इसका प्रतिकूल असर पड़ना तय है।
घरेलू भुगतान तेज, सीमा पार लेन-देन के लिए सीबीडीसी पर नजर
डिजिटल पेमेंट के मोर्चे पर गवर्नर ने साफ किया कि देश के भीतर लेन-देन की व्यवस्था पहले से ही काफी सुगम और सस्ती हो चुकी है। भारत समेत कई प्रमुख देशों में घरेलू भुगतान प्रणालियां बेहद तेज गति से काम कर रही हैं, इसलिए घरेलू स्तर पर किसी समानांतर करेंसी की आवश्यकता नहीं है। असली चुनौती सीमा पार भुगतान की है, जहां अभी भी समय और लागत दोनों अधिक लगते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा यानी सीबीडीसी तथा अन्य तकनीकी माध्यमों पर विचार किया जा सकता है, जो कानूनी दायरे में रहकर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन को सरल बना सकते हैं।
वैश्विक ऋण का दबाव, बॉण्ड प्रतिफल और महंगाई का संतुलन
वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक ऋण के बढ़ते आकार और बॉण्ड यील्ड में आ रहे उछाल पर चर्चा करते हुए आरबीआई गवर्नर ने स्पष्ट किया कि प्रतिफल में फेरबदल पूरी तरह मांग और आपूर्ति के गणित पर टिका है। सरकारों और निजी कंपनियों के खर्च में भारी इजाफा हुआ है, जिसमें एआई जैसी आधुनिक तकनीकों के विस्तार पर होने वाला बड़ा निवेश भी शामिल है। सीमित पूंजी के बीच खर्च बढ़ने के कारण सरकारों के साथ-साथ निजी कॉर्पोरेट्स ने भी बाजार से बड़े पैमाने पर उधारी लेनी शुरू कर दी है, जिससे ऋण बढ़ रहा है और बॉण्ड यील्ड में तेजी आ रही है। घरेलू स्तर पर रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति मुख्य रूप से आर्थिक विकास और महंगाई को नियंत्रित रखने पर केंद्रित है, लेकिन वैश्विक ब्याज दरों का असर भारत की वास्तविक ब्याज दरों पर भी पड़ता है। महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरों पर दबाव आता है और इसका सीधा असर कर्ज की लागत पर पड़ता है, जिससे संतुलन साधना एक निरंतर चुनौती बना रहता है।



















