भारत में भूगर्भीय गतिविधियों की लगातार ट्रैकिंग और आपदा प्रबंधन तंत्र को उन्नत बनाने के मकसद से बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा तैयार किया जा रहा है। इसी सिलसिले में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने समूचे देश के भीतर 100 नए भूकंप निगरानी केंद्र स्थापित करने का फैसला लिया है। इन प्रस्तावित केंद्रों में जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख के संवेदनशील क्षेत्रों को विशेष प्राथमिकता दी गई है, जहां चार चार नई वेधशालाएं बनाई जाएंगी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य देश के किसी भी हिस्से में आने वाले 2.5 तीव्रता जैसे अति सूक्ष्म भूकंपीय झटकों को भी आधुनिक डिजिटल उपकरणों की मदद से तत्काल रिकॉर्ड करना है।
किश्तवाड़ में 183वें केंद्र के शुभारंभ पर नई योजना की घोषणा
राष्ट्रीय भूकंप निगरानी नेटवर्क को नई ताकत देने के लिए जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में देश की 183वीं भूकंप वेधशाला शुरू की गई है। इस नई वेधशाला का औपचारिक उद्घाटन केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने किया। इसी अवसर पर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव श्रीनिवास कुमार तुम्माला ने विस्तार योजना की रूपरेखा सामने रखी। उन्होंने बताया कि मंत्रालय राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी जाल को सघन करने के लिए लगातार कार्यरत है, ताकि हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर तटीय और प्रायद्वीपीय इलाकों तक किसी भी झटके की सूचना फौरन दर्ज हो सके।
किश्तवाड़ में स्थापित यह नया निगरानी केंद्र चिनाब घाटी और आसपास के समूचे हिमालयी क्षेत्र के लिए बेहद अहम साबित होगा। सचिव के अनुसार, इस नए केंद्र में उन्नत डिजिटल रिकॉर्डिंग तकनीक का उपयोग किया गया है। यह व्यवस्था पारंपरिक एनालॉग प्रणाली की जगह लेगी, जिससे भूकंप से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े ज्यादा सटीक, तेज और प्रभावी तरीके से संग्रहित किए जा सकेंगे।
दशकभर में दोगुने से अधिक बढ़े निगरानी स्टेशन
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के नेटवर्क ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी कवरेज क्षमता में बड़ा बदलाव देखा है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में देश भर के अंदर केवल 84 भूकंप निगरानी स्टेशन सक्रिय थे। हाल के वर्षों में किए गए चरणबद्ध विस्तार के बाद अब यह संख्या बढ़कर 183 तक पहुंच चुकी है। इस प्रकार नेटवर्क में लगे सेंसरों और चौबीसों घंटे काम करने वाले केंद्रों की तादाद दोगुनी से भी अधिक हो गई है। यह संपूर्ण तंत्र देश के दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों और अत्यधिक संवेदनशील हिमालयी पट्टियों में बिना रुके हर पल की निगरानी सुनिश्चित करता है।
स्टेशनों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ ही झटकों को पकड़ने की तकनीकी संवेदनशीलता में भी सुधार हुआ है। वर्ष 2014 के दौर में यह नेटवर्क मुख्य रूप से 4 या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों को ही प्रभावी ढंग से पकड़ पाता था। आधुनिक सेंसर लगने के बाद इसकी क्षमता बढ़कर 3 या उससे अधिक तीव्रता के झटकों को पकड़ने की हो गई। अब जब 100 नए केंद्र चालू हो जाएंगे, तब नेटवर्क की सीमा और घटकर 2.5 तीव्रता पर आ जाएगी, जिससे बेहद कमजोर भूमिगत हलचलें भी वैज्ञानिकों के रिकॉर्ड में दर्ज हो सकेंगी।
माइक्रोजोनेशन अध्ययन और आम नागरिकों तक रियल टाइम अलर्ट
आपदा से निपटने की पूर्व तैयारियों को पुख्ता करने के उद्देश्य से मंत्रालय विभिन्न महत्वपूर्ण शहरी क्षेत्रों में भूकंपीय माइक्रोजोनेशन अध्ययन भी संचालित कर रहा है। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र पहले ही पांच शहरों में यह व्यापक अध्ययन संपन्न कर चुका है, जिनमें जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर भी शामिल है। इसके अलावा आठ अन्य प्रमुख शहरों की विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट जल्द ही पूरी कर जारी की जाएगी, जिससे स्थानीय निर्माण और टाउन प्लानिंग में मदद मिलेगी।
वैज्ञानिक विश्लेषण के साथ ही भूगर्भीय हलचलों की तत्काल सूचना आम जनता तक पहुंचाने के लिए आधुनिक डिजिटल माध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र अपनी आधिकारिक वेबसाइट और 'भूकंप' मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से वास्तविक समय में नागरिकों को जानकारी उपलब्ध करा रहा है। इसके साथ ही आपातकालीन सूचनाएं एसएमएस, ईमेल और सोशल मीडिया संदेशों के जरिए भी प्रसारित की जा रही हैं। सचिव तुम्माला ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन के साथ साथ वायुमंडलीय परिस्थितियों पर नजर रखने के लिए मौसम अवलोकन नेटवर्क, रडार सिस्टम और स्वचालित मौसम केंद्रों का भी समानांतर विस्तार किया जा रहा है, जिससे समग्र पूर्वानुमान व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।


















