कक्षा में परीक्षा परिणाम आने के बाद कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को अलग बैठाने, पूरी कक्षा के सामने डांटने अथवा उपहास उड़ाने की परिपाटी पर अब कानूनी तौर पर रोक लग गई है। स्कूली जीवन में शिक्षा, परीक्षाओं की प्रतिस्पर्द्धा, परिवार की ऊंची उम्मीदों और करियर की अनिश्चितता से उपजे भारी तनाव को देखते हुए गुजरात प्रशासन ने माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के शैक्षणिक संस्थानों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नए दिशा-निर्देशों का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय उनके भावनात्मक संतुलन और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को औपचारिक शिक्षा प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाना है।
शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए गुजरात सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी एजुकेशन रेगुलेशंस, 1974 के कानूनी ढांचे में नए प्रावधान जोड़े गए हैं। ये संशोधित नियम गुजरात माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (GSHSEB) से संबद्धता रखने वाले सभी सरकारी, अनुदान प्राप्त और निजी स्कूलों पर प्रभावी होंगे। यह संपूर्ण व्यवस्था विशेष तौर पर कक्षा 9 से लेकर कक्षा 12 तक के किशोर विद्यार्थियों पर केंद्रित रहेगी, जहां बोर्ड परीक्षाओं और करियर चयन के कारण मानसिक दबाव का स्तर सबसे अधिक देखा जाता है।
स्कूल वेलनेस टीम का गठन और जिम्मेदारियां
नियमों के तहत प्रत्येक पात्र स्कूल को प्रत्येक नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही एक समर्पित स्कूल वेलनेस टीम स्थापित करनी होगी। इस टीम की कार्यप्रणाली, प्रभावशीलता और प्रदर्शन की समीक्षा प्रत्येक वर्ष अनिवार्य रूप से की जाएगी। टीम की संरचना बहुआयामी रखी गई है ताकि संस्थान का प्रत्येक अंग इसमें भागीदार बन सके। इस समिति में स्कूल के प्रिंसिपल अध्यक्ष होंगे, उनके साथ एक पेशेवर काउंसलर या इस कार्य के लिए विशेष जिम्मेदारी दिए गए शिक्षक को शामिल किया जाएगा। इसके अतिरिक्त माध्यमिक विभाग से एक शिक्षक, उच्च माध्यमिक विभाग से एक शिक्षक, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी का एक प्रतिनिधि सदस्य, एक गैर-शिक्षण कर्मचारी तथा विद्यार्थियों में से चुने गए दो छात्र-छात्राएं शामिल रहेंगे।
इस समिति का केंद्रीय दायित्व कक्षा परिसरों और खेल के मैदानों में विद्यार्थियों के सामाजिक व्यवहार तथा मनोवैज्ञानिक स्थिति की निरंतर निगरानी करना होगा। यदि कोई विद्यार्थी नियमित रूप से गुमसुम रहता है, साथियों से कटकर एकांत तलाशने लगा है, पढ़ाई को लेकर अत्यधिक भयभीत दिखता है अथवा उसके सामान्य बर्ताव में अप्रत्याशित चिड़चिड़ापन या बदलाव दर्ज होता है, तो टीम तत्काल हस्तक्षेप करेगी। समस्या की गंभीरता को परखते हुए उस विद्यार्थी को बिना किसी सार्वजनिक प्रचार के प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ की पेशेवर सहायता से जोड़ा जाएगा।
काउंसलर नियुक्ति के लिए छात्र संख्या का पैमाना
काउंसलिंग व्यवस्था को व्यावहारिक और अनिवार्य बनाने के लिए सरकार ने इसे स्कूल में पंजीकृत विद्यार्थियों की संख्या के साथ सीधा जोड़ दिया है। जिन विद्यालयों में विद्यार्थियों की कुल संख्या 100 या उससे अधिक है, वहां कम से कम एक पूर्णकालिक योग्य काउंसलर, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक अथवा सामाजिक कार्यकर्ता की नियुक्ति करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। इस पद पर नियुक्त पेशेवर को बाल एवं किशोर मनोविज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त होना चाहिए।
दूसरी ओर, जिन विद्यालयों में छात्र संख्या 100 से कम दर्ज है, उन्हें अपने परिसर के बाहर मौजूद पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों अथवा निजी क्लीनिकों के साथ विधिवत अनुबंध और संपर्क तंत्र स्थापित करना होगा। संकटकालीन स्थितियों में ये छोटे विद्यालय नजदीकी प्राथमिक या सामुदायिक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र की सेवाएं ले सकेंगे। इसके अतिरिक्त संपूर्ण राज्य में कार्यरत जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और भारत सरकार की राष्ट्रीय टेली-मानस सेवा के हेल्पलाइन तंत्र को भी इन स्कूलों के आपातकालीन नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।
सहपाठियों की मदद के लिए मनो-मित्र पहल
अक्सर देखा जाता है कि किशोर विद्यार्थी अपनी निजी भावनाएं, परीक्षा की घबराहट या मानसिक उलझनें माता-पिता अथवा शिक्षकों के सामने खुलकर साझा करने में हिचकिचाते हैं। वे अपनी बात हमउम्र मित्रों से साझा करने में अधिक सहज महसूस करते हैं। इसी मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति को सकारात्मक दिशा देने के उद्देश्य से मनो-मित्र पहल की शुरुआत की गई है। इसके अंतर्गत स्कूल वेलनेस टीम में शामिल किए जाने वाले दो विद्यार्थियों को मनो-मित्र की भूमिका सौंपी जाएगी।
ये मनो-मित्र अपने सहपाठियों के दैनिक व्यवहार, उनकी परेशानियों और अनकही उलझनों को सहानुभूतिपूर्वक सुनेंगे और उन्हें प्राथमिक स्तर पर भावनात्मक संबल प्रदान करेंगे। यदि किसी सहपाठी में गहरे अवसाद, असामान्य बेचैनी अथवा आत्मघाती विचारों के संकेत मिलते हैं, तो मनो-मित्र उसे बिना डराए स्कूल के पेशेवर काउंसलर या विशेषज्ञ से परामर्श लेने के लिए प्रेरित करेंगे। हालांकि नियमों में स्पष्ट किया गया है कि मनो-मित्र की भूमिका केवल प्राथमिक सहयोग और सूचना सेतु तक सीमित है, वे किसी भी स्थिति में पेशेवर मानसिक रोग विशेषज्ञ या मुख्य काउंसलर का विकल्प नहीं होंगे।
परीक्षा तनाव और कक्षा परिवर्तन पर विशेष निगरानी
बोर्ड परीक्षाओं के आयोजन और उनके परिणाम जारी होने का समय किशोरों के लिए सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है। इसी तरह जब विद्यार्थी कक्षा 8 उत्तीर्ण कर माध्यमिक स्तर की कक्षा 9 में पदार्पण करते हैं, अथवा कक्षा 10 की परीक्षा देकर उच्च माध्यमिक वर्ग यानी कक्षा 11 में विषय चयन करते हैं, तब पाठ्यक्रम के अचानक बढ़े बोझ से तनाव उत्पन्न होता है। इन चार प्रमुख संक्रमण चरणों को सरकार ने विशेष निगरानी अवधि घोषित किया है।
इन महत्वपूर्ण मोड़ों पर विद्यालयों को नियमित पढ़ाई के अलावा विशेष तनाव-मुक्ति सत्रों, समूह परामर्श और व्यक्तिगत मार्गदर्शन शिविरों का आयोजन करना होगा। इसका मकसद विद्यार्थियों को असफलता के भय, विषय चयन के असमंजस और साथियों के साथ अंधी तुलना की दौड़ से सुरक्षित बाहर निकालना है।
कम अंक पर भेदभाव और सार्वजनिक अपमान पर पूर्ण प्रतिबंध
नए नियमों का सबसे सख्त पहलू शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर बच्चों के साथ होने वाले व्यवहार से जुड़ा है। विद्यालयों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे अर्धवार्षिक या वार्षिक परीक्षाओं में प्राप्त अंकों के आधार पर विद्यार्थियों को होनहार और कमजोर जैसे अलग-अलग वर्गों या कमरों में नहीं बांट सकते। किसी बच्चे के अंक कम आने पर उसे पूरी कक्षा के सामने खड़ा कर फटकार लगाना, व्यंग्य कसना, उसका उपहास उड़ाना अथवा अन्य श्रेष्ठ अंक पाने वाले सहपाठियों से उसकी सार्वजनिक तुलना करना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।
प्रशासन ने रेखांकित किया है कि प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति और क्षमता भिन्न होती है, इसलिए किसी को कम अंक पाने के आधार पर हीन दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। विद्यालयों का वातावरण भयमुक्त, सहयोगात्मक और सम्मानजनक होना चाहिए ताकि विद्यार्थी बिना किसी झिझक के अपनी शैक्षणिक कमजोरियों को सुधारने में शिक्षकों का सहयोग मांग सकें।
पाठ्येतर गतिविधियां और गोपनीय शिकायत पेटियां
मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए पाठ्यपुस्तकों के दबाव से इतर अन्य गतिविधियों को भी दैनिक दिनचर्या में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं। विद्यालयों को योग, ध्यान, नियमित खेलकूद, संगीत, पारंपरिक नृत्य, चित्रकला और बागवानी जैसे रचनात्मक कार्यों को अनिवार्य रूप से समय सारिणी में स्थान देने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। ये गतिविधियां विद्यार्थियों के अवचेतन तनाव को घटाने और उनकी आंतरिक प्रतिभा को निखारने में सहायक मानी गई हैं।
इसके साथ ही, परिसर के भीतर प्रत्येक विद्यार्थी की पहुंच वाले सार्वजनिक स्थानों पर गोपनीय शिकायत एवं सुझाव पेटियां स्थापित की जाएंगी। किसी भी प्रकार के उत्पीड़न या संकट की स्थिति में त्वरित सहायता के लिए राष्ट्रीय चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर तथा स्कूल वेलनेस टीम के प्रभारियों के आपातकालीन दूरभाष नंबर प्रमुख सूचना पट्टों पर बड़े अक्षरों में प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा।
शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए साल में दो बार अनिवार्य प्रशिक्षण
विद्यार्थियों के मानसिक संकट को भांपने की जिम्मेदारी केवल एक अकेले काउंसलर तक सीमित नहीं रखी जा सकती। इसके लिए विद्यालय के प्रत्येक शिक्षक और गैर-शिक्षण सहायक कर्मचारियों को भी प्रशिक्षित किया जाएगा। नए नियमों के अनुसार सभी शैक्षणिक व गैर-शैक्षणिक कर्मियों को वर्ष में कम से कम दो बार बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञों द्वारा संचालित गहन कार्यशालाओं में भाग लेना होगा।
इस प्रशिक्षण में कर्मचारियों को यह सिखाया जाएगा कि एकाकीपन, आक्रामकता अथवा पढ़ाई में अचानक आई गिरावट के पीछे छिपे मानसिक तनाव को कैसे समय रहते पहचाना जाए। इसमें आत्मघाती प्रवृत्तियों और खुद को चोट पहुंचाने के पूर्व-संकेतों की पहचान करने तथा संकट के क्षणों में प्राथमिक मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने की व्यावहारिक जानकारी दी जाएगी। नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई विद्यार्थी आत्मघाती कदम उठाने या खुद को नुकसान पहुंचाने के गंभीर जोखिम में पाया जाता है, तो उसे किसी भी परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ा जाएगा और संस्थान तुरंत आपातकालीन चिकित्सीय सहायता बुलाने के लिए बाध्य होगा।
परामर्श की गोपनीयता और स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही
परामर्श प्रक्रिया में संकोच समाप्त करने के लिए विद्यार्थियों के व्यक्तिगत डेटा और काउंसलिंग रिकॉर्ड की पूर्ण गोपनीयता सुनिश्चित की गई है। किसी भी छात्र अथवा छात्रा के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी रिपोर्ट को किसी अनाधिकृत व्यक्ति, सामान्य शिक्षकों अथवा सहपाठियों के साथ साझा नहीं किया जा सकेगा। यह जानकारी केवल अधिकृत चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक अथवा बच्चे की सुरक्षा और उपचार से जुड़े अधिकृत परिजनों तक ही सीमित रहेगी।
इसके साथ ही स्कूल परिसरों में होने वाली धौंसबाजी, शारीरिक मारपीट, बुलिंग, इंटरनेट के जरिए मानसिक उत्पीड़न (साइबर बुलिंग), रैगिंग, यौन उत्पीड़न तथा किसी भी किस्म के सामाजिक भेदभाव की शिकायतों पर कठोर व गोपनीय कार्रवाई के नियम तय किए गए हैं। जाति, संप्रदाय, भाषा, लिंग, पारिवारिक आर्थिक पृष्ठभूमि या किसी शारीरिक अक्षमता के आधार पर विद्यार्थियों के साथ होने वाले किसी भी पूर्वाग्रह पर त्वरित कानूनी कदम उठाए जाएंगे। यदि किसी विद्यालय प्रबंधन को किसी विद्यार्थी के गंभीर संकट अथवा आत्महत्या के खतरे की पूर्व सूचना थी और उसने लापरवाही बरतते हुए समय पर कदम नहीं उठाया, तो बच्चे को नुकसान पहुंचने की स्थिति में प्रबंधन के विरुद्ध आपराधिक व अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में निगरानी और करियर मार्गदर्शन
नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन और औचक निरीक्षण के लिए प्रत्येक जिले में एक उच्च स्तरीय निगरानी समिति गठित की जाएगी, जिसके अध्यक्ष संबंधित जिला कलेक्टर होंगे। यह समिति विद्यालयों में काउंसलर व्यवस्था, वेलनेस टीमों के गठन और गोपनीय पेटियों के रखरखाव की समय-समय पर समीक्षा करेगी। किसी अप्रिय घटना या नियमों के उल्लंघन की शिकायत मिलने पर कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति सीधे जांच के आदेश दे सकेगी और लापरवाह स्कूलों के विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा करेगी।
इसके साथ ही, उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी घबराहट दूर करने के लिए करियर मार्गदर्शन को अनिवार्य बनाया गया है। इसमें पारंपरिक कॉलेज डिग्रियों के अलावा आधुनिक कौशल विकास, तकनीकी प्रशिक्षण, व्यावसायिक पाठ्यक्रम और स्वरोजगार के व्यावहारिक विकल्पों की विस्तृत जानकारी देकर विद्यार्थियों के मानसिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ किया जाएगा।























