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पलामू के खेतों में गूंजते हैं धान रोपनी के लोकगीत, कीचड़ के बीच अनोखी संस्कृतिकल्चर
27 जुल॰ 2026, 7:07 pm (94 दिन पहले)· 0

पलामू के खेतों में गूंजते हैं धान रोपनी के लोकगीत, कीचड़ के बीच अनोखी संस्कृति

झारखंड के पलामू जिले में धान की रोपाई के दौरान लोकगीत गाने की पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। ग्रामीण महिलाएं समूह में काम करते हुए गीत गाकर न सिर्फ थकान मिटाती हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी संभाल रही हैं।

भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां खेती केवल पेट भरने का जरिया भर नहीं है, बल्कि यह वहां की संस्कृति और परंपराओं का एक गहरा हिस्सा भी है। देश के विभिन्न अंचलों में खेती-किसानी से जुड़ी अपनी अनूठी लोक परंपराएं देखने को मिलती हैं। इसी कड़ी में झारखंड के पलामू जिले में धान की रोपाई के दौरान महिलाओं द्वारा लोकगीत गाने की सदियों पुरानी रवायत आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है। जब ग्रामीण महिलाएं पानी और कीचड़ से भरे खेतों में उतरकर धान के पौधे लगाती हैं, तो उनके कंठ से निकले लोकगीत पूरे परिवेश को जीवंत कर देते हैं। ये पारंपरिक सुर केवल खेतों में होने वाले कड़े शारीरिक श्रम को ही हल्का नहीं करते, बल्कि ग्रामीण अंचल की लोक संस्कृति, गहरी आस्था और सामाजिक ताने-बाने की खूबसूरत तस्वीर भी पेश करते हैं।

खेती के इस पारंपरिक अनुष्ठान के दौरान महिलाएं टोलियां बनाकर एक साथ मिलकर काम करती हैं और धान रोपते वक्त अनवरत लोकगीत गाती रहती हैं। इन पारंपरिक गीतों के बोलों में विविधता देखने को मिलती है। कई बार इन गीतों के माध्यम से भगवान से अच्छी और लहलहाती फसल की गुहार लगाई जाती है, तो कभी परिवार की खुशहाली और घर-परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इसके अलावा, कई लोकगीतों में पति-पत्नी के बीच का स्नेह, आपसी रिश्तों की मिठास, समाज के लिए कोई संदेश और लोक जीवन के तमाम रंग भी खूबसूरती से रचे-बसे होते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का ऐसा अटूट विश्वास है कि पूरी तल्लीनता, भक्तिभाव और सकारात्मक ऊर्जा के साथ रोपी गई फसल घर-परिवार में बरकत और खुशहाली लेकर आती है।

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पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड में आने वाले पूरबडीह गांव की उन महिलाओं से बातचीत की गई जो खेतों में धान की रोपाई में जुटी थीं। उन्होंने साझा किया कि यह अनूठी संस्कृति उन्हें अपनी मां, दादी और नानी से विरासत में मिली है। आज के आधुनिक दौर में भी नई पीढ़ी की युवतियां और महिलाएं इन पारंपरिक धुनों को आगे बढ़ा रही हैं और इस सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए हैं। इस दौरान दुखनी कुंवर ने बताया कि सामूहिक रूप से गीत गाने से खेतों में लंबे समय तक लगातार काम करने के बावजूद थकान का अहसास बहुत कम होता है और पूरा खेत का माहौल एक अलग ही उत्साह से सराबोर हो जाता है।

धान रोपने की इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत हमेशा देवी-देवताओं की स्तुति के साथ की जाती है। सबसे पहले धरती माता और ईश्वर का स्मरण किया जाता है और उनसे अच्छी बारिश, बंपर पैदावार और पूरे गांव की खुशहाली का आशीर्वाद मांगा जाता है। इसके बाद मौके और समय के हिसाब से भक्ति, मनोरंजन, प्रेम और ग्रामीण जीवन से जुड़े अलग-अलग सुरों वाले गीत गाए जाते हैं। स्थानीय जानकारों के मुताबिक यह परंपरा पीढ़ियों से अनवरत चली आ रही है और आज भी गांवों में पूरी श्रद्धा, मेलजोल और उमंग के साथ निभाई जाती है।

खेतों में काम करने वाली महिलाओं ने यह भी साझा किया कि करीब आठ महिलाओं का एक समूह मिलकर लगभग दो घंटे के भीतर एक बीघा खेत में धान की रोपाई का काम पूरा कर लेता है। इस सामूहिक श्रम के बदले उन्हें करीब तीन हजार रुपये की मजदूरी मिलती है। आज के समय में जब खेती-किसानी में आधुनिक यंत्रों और मशीनों का चलन लगातार बढ़ रहा है, तब भी पलामू के गांवों में धान रोपनी के वक्त गूंजने वाले ये लोकगीत ग्रामीण संस्कृति की अमिट पहचान बने हुए हैं। यह परंपरा महज किसानी का एक चरण नहीं है, बल्कि लोक जीवन, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है।

सवाल-जवाब

पलामू में धान की रोपाई के दौरान क्या परंपरा निभाई जाती है?
पलामू जिले में धान की रोपाई के समय महिलाएं समूह बनाकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जिससे पूरा माहौल उत्साह से भर जाता है।
इन लोकगीतों में किन विषयों का जिक्र होता है?
इन गीतों में भगवान से अच्छी फसल की प्रार्थना, परिवार की खुशहाली, पति-पत्नी का प्रेम और लोक जीवन के विभिन्न रंग शामिल होते हैं।
यह परंपरा किस गांव से जुड़ी है?
यह परंपरा पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड में स्थित पूरबडीह गांव से जुड़ी हुई है।
धान रोपाई करने वाली महिलाओं को कितनी मजदूरी मिलती है?
लगभग आठ महिलाओं का समूह दो घंटे में एक बीघा खेत में धान रोप देता है और इसके बदले उन्हें लगभग तीन हजार रुपये मजदूरी मिलती है।
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