देश की राजधानी दिल्ली में जब भी मानसून की जोरदार बारिश होती है, तो सड़कों का नजारा किसी डरावने सपने जैसा बन जाता है। महज कुछ घंटों की बरसात में प्रमुख रास्ते लबालब पानी से भर जाते हैं, वाहन रेंगने पर मजबूर हो जाते हैं और मिनटों में पूरा होने वाला सफर घंटों के भारी ट्रैफिक जाम में बदल जाता है। हालांकि, यह सिर्फ तात्कालिक जलभराव या आवागमन की समस्या भर नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़े प्राकृतिक और बुनियादी ढांचे से जुड़े संकट की घंटी है। पर्यावरण और जल क्षेत्र में काम करने वाली संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर द्वारा तैयार किए गए एक विस्तृत अध्ययन में यह बात सामने आई है कि दिल्ली में बदलता बारिश का मिजाज शहर को किसी भी समय भयंकर शहरी बाढ़ के मुहाने पर लाकर खड़ा कर सकता है।
दस वर्षों के आंकड़ों में बारिश के पैटर्न का बड़ा बदलाव
मौसम विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं द्वारा पिछले 10 साल के वर्षा आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली में बारिश का पूरा चक्र अब पूरी तरह से अनिश्चित हो चुका है। अब यहां सामान्य और संतुलित बारिश होने के बजाय दो तरह की चरम स्थितियां देखने को मिल रही हैं। या तो लंबे समय तक सूखा और बेहद कम बारिश दर्ज की जाती है, या फिर अचानक कुछ ही घंटों के भीतर मूसलाधार बारिश गिर जाती है। जब बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी बरसता है, तो शहर का पुराना ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह ठप्प हो जाता है और देखते ही देखते सड़कें और निचले इलाके जलमग्न हो जाते हैं।
देशभर में बढ़ रही है मॉनसूनी अनिश्चितता
संस्था में कार्यरत फेलो डॉ. विश्वास चितले ने इस पूरी स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में देखने को मिल रही अतिवृष्टि की घटनाएं मानसून के व्यापक अनिश्चित व्यवहार का हिस्सा हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की ओर से हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली के लिए जारी की जाने वाली चेतावनियां और उनके बाद पैदा होने वाले हालात इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। डॉ. चितले का कहना है कि लंबे समय के मानसून आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि बारिश का यह बदलाव सिर्फ कम या ज्यादा पानी बरसने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके आगमन का समय, भौगोलिक फैलाव और इसकी तीव्रता भी बेहद अनियमित होती जा रही है।
64 फीसदी तहसीलों में बढ़ी अतिवृष्टि की घटनाएं
अगर पूरे देश के परिदृश्य की तुलना 1982 से 2011 के ऐतिहासिक आधार वर्ष से की जाए, तो पिछले एक दशक में भारत की लगभग 64 फीसदी तहसीलों में अत्यधिक बारिश वाले दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही नई दिल्ली समेत देश के 23 प्रतिशत जिलों में एक नया और चिंताजनक रुझान देखा गया है, जहां ऐतिहासिक रूप से बेहद कम बारिश वाले साल और अत्यधिक बारिश वाले साल दोनों की संख्या काफी बढ़ गई है। यानी मौसम का संतुलन पूरी तरह गड़बड़ा गया है।
कंक्रीट के निर्माण से घटा जमीन का जल अवशोषण
दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक शहरीकृत और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इस तरह की तेज बारिश का असर बेहद विनाशकारी साबित हो सकता है। शहर में सड़कों, इमारतों और फुटपाथों के रूप में कंक्रीट का जाल बिछ जाने के कारण जमीन की प्राकृतिक रूप से पानी सोखने की क्षमता काफी घट गई है। जब कुछ ही समय में मूसलाधार पानी गिरता है, तो नालियां और ड्रेनेज नेटवर्क दबाव सहन नहीं कर पाते। इसके परिणामस्वरूप जलभराव होता है, दैनिक परिवहन बाधित होता है, बिजली व अन्य आवश्यक नागरिक सेवाएं ठप्प पड़ जाती हैं और शहरी बाढ़ का जोखिम बहुगुणित हो जाता है।
भविष्य के खतरे से निपटने के ठोस उपाय
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए शहरी नियोजन की सोच में बदलाव लाने की तत्काल आवश्यकता रेखांकित की गई है। नगर निगमों और नीति निर्माताओं को केवल मौसम की कुल औसत बारिश को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाने के बजाय अतिवृष्टि की इन अचानक आने वाली घटनाओं को केंद्र में रखना होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि शहरों में जलवायु परिवर्तन को झेलने में सक्षम ड्रेनेज सिस्टम तैयार किए जाने चाहिए। इसके अलावा, पुराने शहरी जलाशयों और प्राकृतिक नालों का पुनरुद्धार करना, वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) को अनिवार्य बनाना तथा स्थानीय स्तर पर बाढ़ की सटीक पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करना बेहद जरूरी है ताकि भविष्य के खतरे को कम किया जा सके।





















