देश की राजधानी के लुटियंस क्षेत्र में पेड़ों की छांव तले बसा 23 अकबर रोड केवल ईंट और गारे से निर्मित एक विशाल सरकारी आवास नहीं है। यह ऐतिहासिक परिसर भारतीय वायुसेना के गौरव, रणनीतिक निर्णयों और देश के आसमानी पहरेदारों के संघर्ष का जीवंत साक्षी रहा है। सैन्य गलियारों में सम्मानपूर्वक एयर हाउस के नाम से पुकारा जाने वाला यह बंगला आरंभिक दौर से ही वायुसेना के सर्वोच्च कमांडरों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। वर्तमान में वायुसेना प्रमुख अमर प्रीत सिंह इस प्रतिष्ठित बंगले में रहकर अपने सहयोगियों संग देश के सामरिक पहलुओं और वायु सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हैं।
औपनिवेशिक दौर से गणतंत्र की स्थापना तक की यात्रा
इस बंगले का नाता नई दिल्ली की स्थापना के शुरुआती दिनों से जुड़ा है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व यहां रॉयल इंडियन एयर फोर्स से संबद्ध एयर वाइस मार्शल मेरिडिथ थॉमस निवास करते थे। उस जमाने में इस पदवी पर तैनात अधिकारी ब्रिटेन की साउथ ईस्ट एशिया कमांड के अधीन जिम्मेदारियां संभालते थे। वर्ष 1950 में जब देश पूर्ण गणतंत्र बना, तो सैन्य बल के नाम से औपनिवेशिक प्रतीक 'रॉयल' शब्द हमेशा के लिए विदा हो गया। इसी महत्वपूर्ण बदलाव के बाद यह प्रतिष्ठित परिसर स्वतंत्र भारत की वायुसेना के मुखिया का आधिकारिक आवास बन गया।
हर वर्ष 8 अक्टूबर का दिन इस आवास के लिए बेहद खास होता है। वायुसेना दिवस के इस महत्वपूर्ण अवसर पर एयर हाउस में विशेष औपचारिक आयोजन रखा जाता है। इस वार्षिक समागम में भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित देश का समूचा शीर्ष नेतृत्व एकत्र होता है, जहां वायु सेना के जांबाजों के पराक्रम और सेवा का सम्मान किया जाता है।
सुब्रतो मुखर्जी: नींव रखने वाले पहले भारतीय वायुसेना अध्यक्ष
स्वतंत्र भारत में इस परिसर के प्रथम भारतीय निवासी बनने का गौरव एयर चीफ मार्शल सुब्रतो मुखर्जी को प्राप्त हुआ। देश उन्हें 'फादर ऑफ द इंडियन एयर फोर्स' के रूप में सादर स्मरण करता है। एक आईसीएस अधिकारी सतीश चंद्र मुखर्जी के परिवार में जन्मे सुब्रतो मुखर्जी ने 1932 में सैन्य सेवा में प्रवेश किया था। वे अत्यंत कुशल फाइटर पायलट थे, जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध की कठिन परिस्थितियों में अपने शौर्य का प्रदर्शन किया और बाद में आजाद भारत की वायुसेना के पुनर्गठन तथा आधुनिक रूपरेखा तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
अप्रैल 1954 में उन्हें भारतीय वायुसेना के प्रथम भारतीय कमांडर-इन-चीफ का दायित्व सौंपा गया, जिसे वर्ष 1955 में चीफ ऑफ एयर स्टाफ का नया नाम मिला। उनके जीवनकाल में ही 1955 में राजधानी में एयर फोर्स स्कूल की आधारशिला रखी गई, जिसका उद्घाटन उन्होंने स्वयं किया था। इस पहल का सीधा ध्येय वायुसैनिकों के बच्चों को आवासीय क्षेत्र के नजदीक स्तरीय शिक्षा सुलभ कराना था।
वर्ष 1960 में 8 नवंबर के दिन टोक्यो स्थित एक भोजनालय में भोजन का एक अंश श्वास नली में फंस जाने के कारण उनका असमय देहावसान हो गया। पार्थिव शरीर जब राजधानी लाया गया, तो पालम हवाई अड्डे से उनकी अंतिम यात्रा इसी 23 अकबर रोड पर पहुंची और वहां से पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनके अविस्मरणीय योगदान की स्मृति में दिल्ली में सुब्रतो पार्क की स्थापना की गई, जो आज वायुसेना के महत्वपूर्ण कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और रिहाइशी परिसरों का प्रमुख केंद्र है।
ऐतिहासिक अभियानों को दिशा देने वाले जांबाज कमांडर
समय के साथ एयर हाउस ने कई महान योद्धाओं के कदमों की आहट सुनी है। अर्जन सिंह, पी.सी. लाल, इदरीस हसन लतीफ और एन.ए.के. ब्राउन जैसे दिग्गजों ने यहां रहकर राष्ट्र की रक्षा नीति को नई धार दी। इनमें से अधिकांश अधिकारी अनुभवी फाइटर पायलट रहे थे, जिन्होंने वास्तविक युद्धक्षेत्रों में दुश्मन की सेनाओं से सीधा लोहा लिया था।
मार्शल ऑफ द इंडियन एयर फोर्स अर्जन सिंह का इस बंगले से जुड़ाव पुराना था। उन्होंने स्मरण किया था कि जनवरी 1945 में वे पहली बार यहां आए थे, जब वे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बर्मा के मोर्चे से वापस लौटकर एयर वाइस मार्शल मेरिडिथ थॉमस से भेंट करने पहुंचे थे। इसके बाद 1964 से 1969 तक उन्होंने वायुसेना प्रमुख के तौर पर इसी आवास में पांच वर्ष बिताए। उनके विशिष्ट सैन्य नेतृत्व को देखते हुए भारत सरकार ने बाद में उन्हें मार्शल ऑफ द इंडियन एयर फोर्स की दुर्लभ एवं सर्वोच्च पदवी से विभूषित किया।
वर्ष 1971 के मुक्ति संग्राम में निर्णायक भूमिका निभाने वाले एयर चीफ मार्शल पी.सी. लाल का कार्यकाल भी इसी बंगले में बीता। द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर 1971 तक के विभिन्न संघर्षों के साक्षी रहे पी.सी. लाल ने 1969 में कमान संभालते ही पूरी सेना को भविष्य के संभावित टकरावों के लिए अत्यंत सुदृढ़ बनाने पर पूरा ध्यान केंद्रित किया। इस कठोर तैयारी का ही परिणाम था कि 1971 के युद्ध में भारतीय वायु शक्ति ने विरोधी पक्ष को संभलने का कोई अवसर नहीं दिया। उनके इस असाधारण योगदान को देश ने पद्म भूषण और पद्म विभूषण सम्मान प्रदान कर सराहा।
इदरीस हसन लतीफ: गणतंत्र के पहले फ्लाईपास्ट से आधुनिकीकरण तक
एयर हाउस में रहने वाले प्रमुखों में इदरीस हसन लतीफ का व्यक्तित्व भी अत्यंत विशिष्ट रहा। 1971 के युद्धकाल में वे एयर वाइस मार्शल के पद पर कार्यरत थे और शिलांग स्थित पूर्वी सेक्टर के मुख्यालय से संपूर्ण वायु अभियानों का संचालन संभाल रहे थे। लड़ाकू विमानों की उड़ानों, अभियान की पल-पल की प्रगति और अग्रिम चौकियों की जरूरतों पर वे निरंतर पैनी दृष्टि बनाए हुए थे। जब दुश्मन के सैनिकों ने हथियार डाले, उस ऐतिहासिक क्षण वे पूर्वी मोर्चे पर सक्रिय थे। लतीफ बाद में 1978 से 1981 तक वायुसेना के शीर्ष पद पर रहे और वे इस पद पर आसीन होने वाले पहले मुस्लिम चीफ बने। उनकी स्मृति में दिल्ली कैंट की एक सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया है। सेवा से मुक्त होने के उपरांत उन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल और फ्रांस में भारतीय राजदूत के अहम दायित्वों का भी निर्वहन किया।
इदरीस हसन लतीफ का नाम देश के पहले गणतंत्र दिवस से भी अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। 26 जनवरी 1950 को जब राजधानी के आकाश में पहली बार फ्लाईपास्ट का प्रदर्शन हुआ, तब स्क्वाड्रन लीडर के तौर पर उसका नेतृत्व लतीफ ही कर रहे थे। नंबर 4 स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में वे हॉकर टेम्पेस्ट उड़ा रहे थे। ये विमान अंबाला एयरबेस से रवाना हुए थे और पूरे देश ने राजपथ के ऊपर लड़ाकू विमानों के हैरतअंगेज करतबों का दीदार किया था। 1948 और 1965 के युद्धों में भी अपनी बहादुरी दिखाने वाले लतीफ ने वायुसेना प्रमुख के पद पर रहते हुए जगुआर लड़ाकू विमानों के सौदे के लिए सरकार को सहमत कराकर बेड़े के आधुनिकीकरण को नई गति दी थी।
कॉफी-टेबल बुक, भव्य परिसर और वायु सेना भवन से नाता
इस बंगले के समृद्ध इतिहास और स्मृतियों को संजोने के उद्देश्य से 2011 में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पी.वी. नाइक की प्रेरणा से 'एयर हाउस… डाउन द इयर्स' नाम से एक कॉफी-टेबल बुक प्रकाशित की गई। 19 जुलाई 2011 को 23 अकबर रोड पर ही आयोजित एक समारोह में मार्शल अर्जन सिंह ने इस अनूठी पुस्तक का विमोचन किया था। इस संग्रह में भवन की वास्तुकला के साथ-साथ यहां रहने वाले सैन्य परिवारों के अनमोल संस्मरणों को सहेजा गया है।
एयर हाउस से कुछ ही फासले पर रफी मार्ग स्थित वायु सेना भवन खड़ा है, जो भारतीय वायुसेना का प्रमुख प्रशासनिक मुख्यालय है। वर्ष 1964 में तैयार हुए इस भवन के मुख्य द्वार पर लगे लड़ाकू विमानों के मॉडल दूर से ही इसकी सामरिक पहचान को उजागर करते हैं। वायु सेना भवन जहां दैनिक सामरिक योजनाओं और रक्षा फैसलों का आधिकारिक दफ्तर है, वहीं एयर हाउस वह निजी एवं रणनीतिक केंद्र है जहां वायुसेना प्रमुख अपने सहयोगियों के साथ गहन मंथन करते हैं।
लुटियंस जोन का टाइप-8 श्रेणी का यह सरकारी आवास अपनी सघन हरियाली, विशाल लॉन, सुरक्षा पहरे और स्टाफ क्वार्टर के लिए जाना जाता है। यहां चौबीसों घंटे सुरक्षा निगरानी, निर्बाध बिजली-पानी की व्यवस्था, बागवानी और रख-रखाव की पुख्ता व्यवस्था मौजूद रहती है, जिससे यह बंगला न केवल एक आवास बल्कि सैन्य कूटनीति और औपचारिक मुलाकातों का एक सशक्त मंच बना रहता है।
























