अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सक्रिय और स्थायी उपस्थिति की मांग को ब्रिक्स के मंच से नया बल मिला है। ब्रिक्स नेताओं के नई दिल्ली घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दो प्रमुख वीटो धारक देशों, रूस और चीन ने सुरक्षा परिषद में भारत तथा ब्राजील की भूमिका को विस्तार देने की आकांक्षाओं के प्रति अपने समर्थन को फिर से रेखांकित किया है। यह समर्थन ऐसे समय में सामने आया है जब विश्व के बड़े मंचों पर विकासशील देशों की आवाज को नजरअंदाज किए जाने को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है।
घोषणापत्र के कूटनीतिक शब्दों के मायने
घोषणापत्र में प्रयुक्त भाषा का कूटनीतिक विश्लेषण बताता है कि इसमें सीधे तौर पर स्थायी सीट देने की स्पष्ट घोषणा के बजाय भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका निभाने की चाहत का समर्थन दोहराया गया है। रूस और चीन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल हैं जिनके पास वीटो की ताकत है, इसलिए दोनों का एक साझा घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करना बेहद अहम माना जा रहा है। साझा दस्तावेज में यह भी याद दिलाया गया कि ऐसा समर्थन वर्ष 2022 के बीजिंग घोषणापत्र और वर्ष 2023 के जोहान्सबर्ग दो लीडर्स डिक्लेरेशन में भी दर्ज किया जा चुका है।
ब्रिक्स शेरपा सुधाकर दलेला ने इस चर्चा को लेकर स्पष्ट किया कि पूरे सत्र के दौरान संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों को लेकर सदस्य देशों के बीच एक मजबूत सहमति देखी गई। उन्होंने रेखांकित किया कि सभी सदस्य देशों ने अपनी बात खुलकर रखी और इस बात पर पूरा जोर दिया गया कि वैश्विक मंचों पर ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज को पहले से कहीं अधिक बुलंद किया जाना जरूरी है।
विशेषाधिकार के पिरामिड को खत्म करने का आह्वान
शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए दुनिया के निर्णय लेने के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को वैश्विक स्तर पर तय होने वाले फैसलों में ज्यादा प्रभाव और बड़ी हिस्सेदारी दी जानी चाहिए। वैश्विक व्यवस्था की वर्तमान बनावट की तुलना उन्होंने एक पिरामिड से की, जिसमें शक्तिशाली देश शीर्ष पर बैठे हैं और उनके द्वारा लिए गए फैसलों का बोझ नीचे खड़े देशों को उठाना पड़ता है, जबकि उनके पास अपनी बात मनवाने का कोई अधिकार नहीं होता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को बदलने की वकालत करते हुए कहा कि हमें विशेषाधिकार के इस पिरामिड को साझेदारी के एक खुले मंच में बदलना होगा। उनका कहना था कि दुनिया के विकासशील और पिछड़े देशों को केवल दूसरों के बनाए नियमों पर चलने वाला बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अब उन्हें नियम तय करने वाली मेज पर मुख्य भागीदार की तरह बैठना होगा।
आठ दशक पुरानी व्यवस्था पर खड़े होते सवाल
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का मौजूदा ढांचा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1945 में तैयार किया गया था। इस व्यवस्था के तहत चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका को स्थायी सदस्यता के साथ वीटो शक्ति प्रदान की गई थी। उस दौर के बाद से अब तक करीब आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन स्थायी सदस्यों की इस सूची में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। दूसरी ओर, इस समयावधि में दुनिया की अर्थव्यवस्था, जनसांख्यिकी और सामरिक शक्ति के संतुलन में भारी बदलाव आ चुका है।
भारत लगातार यह तर्क देता रहा है कि विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल होने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगातार बढ़ती ताकत के बावजूद उसे परिषद से बाहर रखना आज की जमीनी सच्चाइयों के विपरीत है। सुरक्षा परिषद की वर्तमान व्यवस्था समकालीन दुनिया का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती, जिससे इसकी प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं।
ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों की व्यापक भागीदारी
नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स नेताओं ने केवल सुरक्षा परिषद तक ही सुधारों को सीमित नहीं रखा, बल्कि संपूर्ण संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक, पारदर्शी, प्रभावी और जिम्मेदार बनाने की बात कही। दस्तावेज में मांग की गई कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विकासशील देशों और अल्पविकसित राष्ट्रों को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के भीतर सार्थक स्थान दिया जाए।
विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के देशों को अंतरराष्ट्रीय नीतियों और आर्थिक फैसलों में निर्णय लेने की शक्ति मिलनी चाहिए। घोषणापत्र के अनुसार, जब तक विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व परिषद में नहीं बढ़ेगा, तब तक यह संस्था वर्तमान समय के गंभीर वैश्विक संकटों और चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सकेगी।



















