राजधानी दिल्ली में बुधवार को विपक्षी दलों के गठबंधन की एक उच्चस्तरीय बैठक संपन्न हुई, जिसका मुख्य एजेंडा चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े मुद्दों पर साझा रणनीति तैयार करना था। इस मंच पर सभी सहयोगी दलों ने एकजुटता प्रदर्शित करने का भरसक प्रयास किया। हालांकि, बैठक खत्म होते ही जैसे ही तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी बाहर निकलीं, पत्रकारों ने सीधे 2029 के आम चुनाव में विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर सवाल दाग दिया। इस सवाल पर ममता बनर्जी का रुख खासा चौंकाने वाला रहा और गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर जारी पुरानी खींचतान एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गई।
पत्रकारों ने जब उनसे साफ लहजे में यह जानना चाहा कि क्या अगले आम चुनाव में राहुल गांधी विपक्ष का नेतृत्व करेंगे या फिर वे खुद इस शीर्ष पद की दावेदार होंगी, तो तृणमूल कांग्रेस नेता ने मामले को सीधा टाल दिया। उन्होंने पहले हल्के तंजिया अंदाज में कहा कि आप उम्मीदवार होंगे, और फिर इस विषय पर आगे कुछ भी बोलने से साफ इनकार करते हुए केवल इतना जोड़ा कि कल होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही स्थिति स्पष्ट की जाएगी। उनके इस टालमटोल भरे जवाब से साफ संकेत मिलता है कि गठबंधन के घटक दलों के बीच भावी नेतृत्व को लेकर किसी भी तरह की एकराय नहीं बन पाई है।
गठबंधन के भीतर नेतृत्व पर बनी पुरानी असहजता
विपक्षी मोर्चे के गठन के शुरुआती दौर से ही भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के मुकाबले किसी एक सर्वमान्य चेहरे को तय करने की बहस सबसे बड़ी चुनौती बनी रही है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी को स्वाभाविक रूप से पूरे विपक्ष का मुख्य चेहरा और प्रमुख आवाज मानकर पेश करता आया है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे मजबूत क्षेत्रीय दल चुनाव से पहले किसी एक नाम पर मुहर लगाने के पक्ष में कभी नहीं दिखे।
ममता बनर्जी पहले भी कई बार सार्वजनिक रूप से यह राय रख चुकी हैं कि किसी व्यक्ति विशेष को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने के बजाय सभी दलों को मिलकर सामूहिक रूप से चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। एक दौर ऐसा भी रहा जब ममता बनर्जी, राहुल गांधी को विपक्ष के मुख्य नेता के तौर पर स्वीकार करने को सहजता से तैयार नहीं दिखती थीं। अब जबकि कांग्रेस अधिक आक्रामक मुद्रा में है और राहुल गांधी की सियासी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, तब भी क्षेत्रीय दलों का यह सतर्क अंदाज दर्शाता है कि वे कांग्रेस के पूर्ण प्रभुत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
विपक्ष की असहजता पर भारतीय जनता पार्टी का पलटवार
इस पूरे घटनाक्रम के तुरंत बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने विपक्षी खेमे पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस स्थिति पर तंज कसते हुए कहा कि विपक्षी गठबंधन के घटक दल खुद ही राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता मानने से पीछे हट रहे हैं। उनका कहना था कि जब गठबंधन के सबसे करीबी सहयोगी ही राहुल गांधी के नेतृत्व पर खुला समर्थन देने से हिचक रहे हैं और कैमरे के सामने सवाल पूछे जाने पर चुप्पी साध रहे हैं, तो देश की जनता उन पर किस आधार पर विश्वास करेगी। भारतीय जनता पार्टी ने जोर देकर कहा कि यह मोर्चा बिना किसी स्पष्ट नीति और बिना किसी निश्चित नेता के एक बिखरा हुआ गठबंधन मात्र है।
संयुक्त आंदोलन की घोषणा के बीच अंदरूनी खींचतान की चुनौती
इस बैठक के दौरान विपक्षी दलों ने कुछ ठोस रणनीतिक कदमों पर सहमति जरूर बनाई है। इनमें आगामी 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के दफ्तर तक विरोध मार्च निकालने और पूरे देश में साझा आंदोलन शुरू करने की योजना प्रमुख है। इसके बावजूद विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन की असली परीक्षा साझा मुद्दों से ज्यादा नेतृत्व के चयन पर ही निर्भर करेगी। राज्यों में सक्रिय क्षेत्रीय दलों का मानना है कि राज्यों के स्तर पर उनका मजबूत जनाधार ही भाजपा को सीधी चुनावी चुनौती देने में सक्षम है। ऐसे में किसी केंद्रीय पार्टी के एकतरफा नेतृत्व को स्वीकार करना उनके अपने क्षेत्रीय राजनीतिक वजूद के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ममता बनर्जी का हालिया रुख यह दिखाता है कि 2029 की चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने से पहले गठबंधन को अपने अंदरूनी मतभेदों और शीर्ष पद की महत्वाकांक्षाओं से निपटना होगा।


















