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दरभंगा के मेले में स्कूल के बाद कचरी बेचकर मां और दादी का हाथ बंटा रही नन्हीं कल्पना कुमारीसक्सेस स्टोरी
30 सित॰ 2026, 8:46 pm (3 मिनट पहले)· 0

दरभंगा के मेले में स्कूल के बाद कचरी बेचकर मां और दादी का हाथ बंटा रही नन्हीं कल्पना कुमारी

दरभंगा के ग्रामीण मेले में नन्हीं कल्पना कुमारी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी मां और दादी की कचरी की दुकान संभालकर दिव्यांग पिता के परिवार का सहारा बन रही है।

गांवों में लगने वाले पारंपरिक मेले केवल चकाचौंध, विशाल झूले और खिलौनों की खरीदारी तक सीमित नहीं होते, बल्कि इनकी रौनक के पीछे कई ऐसे परिवारों की कड़ी मेहनत छुपी होती है जिनका पूरा साल इन्हीं आयोजनों की कमाई पर निर्भर करता है। दरभंगा के ऐसे ही एक ग्रामीण मेले में जहां चारों ओर कचरी, मूढ़ी, झिल्ली, पकौड़े और बड़ी की खुशबू फैली है, वहां एक छोटी सी दुकान पर बैठी नन्हीं कल्पना कुमारी आने-जाने वाले हर शख्स की नजरों को अपनी ओर खींच रही है। बहुत छोटी उम्र में ही यह बच्ची अपनी पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की आजीविका में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रही है।

दिव्यांग पिता और परिवार की जिम्मेदारी

कल्पना भले ही उम्र में अभी काफी छोटी है, लेकिन अपने घर की आर्थिक परिस्थितियों और जिम्मेदारियों को उसने बखूबी समझ लिया है। उसके पिता दिव्यांग हैं और इस वजह से घर को चलाने का पूरा भार उसकी मां और दादी के कंधों पर आ टिका है। परिवार की जीविका चलाने के लिए दोनों महिलाएं गांव के वार्षिक मेलों में कचरी और झिल्ली तलने का स्टॉल लगाती हैं। जैसे ही मेले का आयोजन शुरू होता है, कल्पना भी अपनी शिक्षा से समझौता किए बिना अपनी मां और दादी की मदद के लिए दुकान पर हाजिर हो जाती है।

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स्कूल के घंटों के बाद दुकान पर मोर्चा

कल्पना की रोजमर्रा की दिनचर्या आम बच्चों के खेलकूद और मौज-मस्ती से बिल्कुल जुदा है। वह दिन के समय नियमित रूप से अपने स्कूल जाती है और पढ़ाई पूरी करके लौटते ही सीधे मेले में पहुंच जाती है। दुकान पर ग्राहकों को गरमा-गरम कचरी परोसनी हो, सामान पैक करना हो या फिर दुकान के रोजमर्रा के छोटे-मोटे इंतजाम करने हों, वह हर काम पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करती है। मेले में चारों तरफ बड़े-बड़े झूले और खिलौनों की सजी दुकानें लोगों को लुभाती हैं, मगर इसके बावजूद कल्पना की छोटी सी दुकान पर भी ग्राहकों की भारी भीड़ जमा रहती है। दुकान पर मिलने वाली पारंपरिक कचरी और खास आलू बम का अनोखा स्वाद मेले में आने वाले लोगों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

मेहनत में खुशी और ग्राहकों की सराहना

अपनी इस दोहरी भूमिका पर कल्पना का कहना है कि उसे अपनी मां और दादी का हाथ बंटाने में बेहद खुशी मिलती है। वह मानती है कि पढ़ाई के साथ जब भी वक्त मिले, अपने परिवार के काम में सहयोग करना उसका कर्तव्य है। इतनी छोटी सी उम्र में काम के प्रति उसका ऐसा समर्पण और संजीदगी देखकर मेले में आने वाले खरीदार भी उसकी दिल से तारीफ करते नहीं थकते। कठिन घरेलू हालातों के बीच बिना किसी शिकायत के स्कूल की किताबों और दुकान के बीच संतुलन साधने का उसका यह जज्बा हर किसी को प्रभावित कर रहा है।

छोटे कामगारों की सालभर की उम्मीद बनते हैं ग्रामीण मेले

मेले में टहलने और वक्त बिताने आने वाले आम लोगों के लिए यह आयोजन कुछ घंटों के आमोद-प्रमोद का जरिया हो सकता है, परंतु छोटे विक्रेताओं और उनके परिजनों के लिए यह जीवनयापन की रीढ़ होता है। कचरी, झिल्ली, मूढ़ी और पकौड़े बनाकर बेचने वाले अनगिनत ग्रामीण परिवार पूरे बारह महीने इन मौकों की राह देखते हैं ताकि वे अपने परिवार के लिए जरूरी बचत जुटा सकें। मेले की चमक-दमक के पीछे इन्हीं परिवारों का पसीना और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें जुड़ी होती हैं।

सवाल-जवाब

कल्पना कुमारी कौन हैं और वह मेले में क्या करती हैं?
कल्पना कुमारी दरभंगा की एक छोटी स्कूली छात्रा हैं, जो मेले में अपनी मां और दादी की कचरी और झिल्ली की दुकान संभालने में मदद करती हैं।
कल्पना को कम उम्र में दुकान पर क्यों बैठना पड़ता है?
उनके पिता दिव्यांग हैं, जिसके कारण परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उनकी मां और दादी पर है, और कल्पना उनका हाथ बंटाती हैं।
कल्पना अपनी पढ़ाई और दुकान के काम का संतुलन कैसे बनाती हैं?
वह दिन में नियमित रूप से स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं और स्कूल के बाद शाम को मेले में दुकान के कामकाज में जुट जाती हैं।
मेले में कल्पना की दुकान पर कौन-से पकवान मिलते हैं?
उनकी दुकान पर कचरी, झिल्ली, आलू बम और अन्य पारंपरिक तले हुए पकवान बेचे जाते हैं, जिन्हें ग्राहक खूब पसंद करते हैं।
छोटे दुकानदारों के लिए गांव के मेले क्यों महत्वपूर्ण होते हैं?
गांव के मेले इन छोटे दुकानदारों के लिए साल भर की कमाई और आजीविका जुटाने का सबसे प्रमुख साधन होते हैं।
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