देश की राजधानी नई दिल्ली में 30 सितंबर को विपक्षी दलों के गठबंधन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की देखरेख में कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर में कथित धांधली का मामला था। इस पूरे सम्मेलन के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की गैरहाजिरी सियासी गलियारों में खासी चर्चा का केंद्र बनी रही। इसके बावजूद लगभग 14 छोटे और बड़े राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की सशक्त भागीदारी ने इस कार्यक्रम को काफी वजनदार बना दिया। बैठक के समापन पर आयोजित प्रेस वार्ता में जिन भी विपक्षी नेताओं ने मंच साझा किया, उन सभी ने एक सुर में मतदाता सूची में हेराफेरी, एसआईआर प्रक्रिया में अनियमितताओं और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग को प्रमुखता से सामने रखा। इस पूरे घटनाक्रम का यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो दो बुनियादी सियासी बदलाव साफ तौर पर उभरकर सामने आते हैं।
ममता बनर्जी के बदले तेवर और नेतृत्व पर सहमति
पश्चिम बंगाल की सत्ता में 15 वर्षों तक काबिज रहने और मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के दौरान ममता बनर्जी ने कभी भी राहुल गांधी को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर राजनेता के तौर पर तवज्जो नहीं दी थी। अतीत में वह कई मौकों पर उन्हें जमीनी राजनीति सीखने तक की सीख देती हुई नजर आती थीं। हालांकि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी शिकस्त और सत्ता हाथ से फिसल जाने के बाद उनके सियासी रुख में 360 डिग्री का नाटकीय बदलाव देखा जा रहा है। जिस राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर वह पहले संदेह जताती थीं, 30 सितंबर की बैठक के बाद से उन्हें उनमें दूरगामी सोच वाला परिपक्व राजनेता दिखाई देने लगा है।
बैठक के बाद साझा प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर राहुल गांधी के समर्थन में खुलकर बात रखी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने ही सबसे पहले वोट चोरी के गंभीर विषय को राष्ट्रीय पटल पर उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी ने वोट चोरी का सहारा लेकर वर्ष 2026 के चुनाव में जीत हासिल की है। इससे पहले भी मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में इसी तरह जीत दर्ज की गई, जबकि पश्चिम बंगाल के चुनावों में व्यापक स्तर पर चुनावी प्रक्रिया की लूट की गई। उन्होंने आगे बताया कि वह नागरिकों को साथ लेकर चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंची थीं, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया और हर संभव कानूनी मंच तक गईं, लेकिन अब सभी तथ्य पूरी तरह जनता के सामने आ चुके हैं। ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार ने वोट चोरी करवाई, ईवीएम मशीनों को नुकसान पहुंचाया गया, मशीनों को हाईजैक किया गया और मतगणना में भारी हेरफेर कराया गया। इन तमाम गंभीर वजहों के चलते उन्हें अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे देना चाहिए।
संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और प्रेस वार्ता का कूटनीतिक संदेश
ममता बनर्जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए जोर दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पद छोड़ने से ही देश में लोकतंत्र और नागरिकों के मताधिकार की रक्षा हो सकेगी। उनका कहना था कि मतदान करना प्रत्येक नागरिक का बुनियादी संवैधानिक अधिकार है, और यदि मतदाता को उसका अधिकार ही नहीं मिलेगा तथा मतों की खुलेआम चोरी होगी तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि इस्तीफा नहीं आता है, तो यह जनांदोलन जमीन से लेकर आसमान तक व्यापक रूप लेगा और सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाना होगा।
इस पूरे सम्मेलन का दूसरा सबसे उल्लेखनीय पहलू प्रेस ब्रीफिंग का कूटनीतिक क्रम रहा। संवाददाताओं को संबोधित करने के क्रम में सबसे पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और फिर बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सामने आईं। मंच पर सबसे अंत में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बोलने के लिए पहुंचे। गठबंधन की अब तक जितनी भी औपचारिक बैठकें हुई थीं, उनमें राहुल गांधी कभी भी मीडिया ब्रीफिंग में सीधे शामिल नहीं होते थे। संसदीय और राजनीतिक परंपराओं के मुताबिक किसी भी बड़े राष्ट्रीय मंच पर मुख्य वक्ता को सदैव सबसे अंत में अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया जाता है। राजनीतिक हलकों में इसे इस स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि राहुल गांधी अब इस पूरे विपक्षी मोर्चे के सर्वमान्य सूत्रधार की भूमिका में आ चुके हैं। इस दौरान अपनी बात रखते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सभी विपक्षी नेता मिलकर भारत के संविधान के सामूहिक संरक्षक हैं और वे देश के भीतर बुनियादी व बड़े बदलाव लाने का काम करेंगे।
गठबंधन का आंतरिक शक्ति संतुलन और पुराने गतिरोध
वर्ष 2024 के आम चुनावों से पूर्व जब इस विपक्षी मोर्चे का गठन हुआ था, तब आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी लगातार कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते रहते थे, जिससे गठबंधन की मजबूती पर बार-बार संदेह पैदा होता था। अब अरविंद केजरीवाल इस गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, जबकि ममता बनर्जी न केवल साथ खड़ी हैं बल्कि वोट चोरी के मुद्दे पर राहुल गांधी की राजनीतिक दूरदर्शिता को पूरा श्रेय भी दे रही हैं।
शुरुआती दौर में जब इस गठबंधन की रूपरेखा तैयार हुई थी, तब इसके घटक दलों के बीच पांच मजबूत सत्ता केंद्र मौजूद थे। उस वक्त ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, हेमंत सोरेन और नीतीश कुमार विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री पद पर आसीन थे। समय के साथ यह शक्ति संतुलन पूरी तरह बिखर गया। नीतीश कुमार काफी पहले गठबंधन से नाता तोड़ चुके हैं, जबकि तमिलनाडु में टीवीके की सरकार बनवाने में कांग्रेस के कथित सहयोग के चलते एमके स्टालिन भी इस मोर्चे से अलग हो गए। वहीं ममता बनर्जी विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद सत्ता और राजनीतिक प्रभाव दोनों के स्तर पर कमजोर हुई हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि पूरे गठबंधन में केवल झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ही ऐसे चेहरे बचे हैं जो इस समय किसी राज्य की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। सहयोगी दलों के अपने-अपने गृह राज्यों में कमजोर पड़ते प्रभाव के बीच कांग्रेस पार्टी इस मोर्चे का स्वाभाविक नेतृत्व करती दिख रही है, और राहुल गांधी बिना किसी औपचारिक घोषणा के इसकी कमान संभालते नजर आ रहे हैं।
संयोजक पद का विवाद और बिखराव का ऐतिहासिक सफर
इस विपक्षी गठबंधन की नींव रखने में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भूमिका सबसे अहम रही थी। उन्होंने करीब छह महीने तक देशभर में घूमकर अलग-अलग विपक्षी नेताओं से व्यक्तिगत मुलाकातें कीं और उन्हें एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया। उनके इन अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप 23 जून 2023 को बिहार की राजधानी पटना में 17 राजनीतिक दलों की पहली ऐतिहासिक बैठक संपन्न हुई थी। इस बैठक के तत्काल बाद यह प्रबल संभावना जताई जा रही थी कि नीतीश कुमार को गठबंधन का राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त किया जाएगा। इसके बाद 17 और 18 जुलाई 2023 को कर्नाटक के बेंगलुरु में विपक्षी दलों की दूसरी बड़ी बैठक आयोजित हुई, जहां इस समूह को औपचारिक तौर पर अपना नाम मिला। हालांकि इस दूसरी बैठक में भी नीतीश कुमार को संयोजक का दायित्व नहीं सौंपा गया।
बाद के दिनों में जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष ने खुलासा किया था कि ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने एक दलित चेहरे को संयोजक बनाए जाने का प्रस्ताव आगे बढ़ाकर गठबंधन के भीतर दूरियां पैदा करने का काम किया था। इस आंतरिक उपेक्षा और खींचतान के चलते मोर्चे के संस्थापक रहे नीतीश कुमार स्वयं अलग हो गए और पुनः राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के पाले में लौट गए, जहां वह आज भी बने हुए हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी सीटों के बंटवारे को लेकर भारी गतिरोध बना रहा। उस समय पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस को एक भी लोकसभा सीट छोड़ने को राजी नहीं हुई थीं। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तो चुनावी तालमेल बिठाया, लेकिन पंजाब के चुनावी रण में दोनों ही दलों के प्रत्याशी एक-दूसरे के खिलाफ पूरी ताकत से मैदान में ताल ठोकते नजर आए थे।



















