रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता और मिट्टी की गिरती सेहत के बीच देसी कृषि तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया निवासी रविकांत पांडे, जो कृषि और बागवानी के क्षेत्र में पिछले 25 वर्षों से रिसर्च एंड डेवलपमेंट का कार्य कर रहे हैं, ने गाय के गोबर से बेहद शक्तिशाली जैविक खाद तैयार करने की एक विशेष विधि साझा की है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि गाय के गोबर को सही प्रक्रिया से सड़ाकर भुरभुरा बना लिया जाए और खेतों में इस्तेमाल किया जाए, तो न केवल यूरिया जैसे रासायनिक खादों की आवश्यकता कम हो जाती है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में भी अभूतपूर्व सुधार देखने को मिलता है।
खाद बनाने की आवश्यक सामग्री और सटीक अनुपात
इस शक्तिशाली जैविक उर्वरक को तैयार करने के लिए एक निश्चित और संतुलित अनुपात का पालन करना अनिवार्य होता है। रविकांत पांडे ने इस पूरी प्रक्रिया को सरल आंकड़ों के माध्यम से स्पष्ट किया है। इस तरल खाद को बनाने के लिए सबसे पहले 15 किलोग्राम गाय का ताजा गोबर लिया जाता है। इसके साथ ही 15 लीटर गौमूत्र, 1 किलोग्राम बेसन और 1 किलोग्राम गुड़ की आवश्यकता होती है। इन सभी सामग्रियों का एक बड़े ड्रम में घोल तैयार किया जाता है। मिश्रण को सही ढंग से तैयार करने के लिए ड्रम में सभी सामग्री डालने के बाद उसमें आवश्यकता अनुसार पानी भर दिया जाता है।
सामग्रियों को ड्रम में डालने के बाद एक बड़े और मजबूत डंडे की सहायता से पूरे घोल को अच्छी तरह मिलाया जाता है ताकि सभी तत्व आपस में पूरी तरह घुल-मिल जाएं। इसके बाद मिश्रण को स्थिर होने और जमने के लिए छोड़ दिया जाता है। कुछ समय बीतने के बाद मिश्रण की ऊपरी सतह पर एक मोटी और सघन परत जम जाती है, जो इस बात का संकेत है कि खाद बनने की प्रक्रिया सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
छांव में भंडारण और सूक्ष्मजीवों की भूमिका
खाद की प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए कुछ बेहद महत्वपूर्ण सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। रविकांत पांडे के अनुसार, तैयार किए जा रहे मिश्रण के ड्रम को कभी भी सीधे सूर्य के प्रकाश या धूप में नहीं रखा जाना चाहिए। इसे हमेशा किसी शेड, शेल्टर या घने पेड़ के नीचे छांव वाली जगह पर रखना आवश्यक है। ड्रम को लगातार छांव में रखने से उसमें मित्र सूक्ष्मजीव (माइक्रो ऑर्गेनिज्म) तेजी से पनपने लगते हैं। ये सूक्ष्मजीव गोबर और अन्य सामग्रियों को अपघटित करके उसकी उर्वरता को कई गुना बढ़ा देते हैं।
यह घोल इतना अधिक सघन और प्रभावकारी होता है कि इसकी बहुत थोड़ी सी मात्रा भी यदि साधारण गोबर के ढेर पर छिड़क दी जाए, तो वह गोबर भी बहुत कम समय में उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में तब्दील हो जाता है। यह तरीका किसानों को कम लागत में भारी मात्रा में उन्नत खाद तैयार करने की सुविधा प्रदान करता है।
फसलों पर प्रभाव और पोषक तत्वों की भरमार
इस देसी जैविक खाद का उपयोग विभिन्न प्रमुख फसलों पर बेहद लाभकारी साबित होता है। मुख्य रूप से गन्ना, धान और गेहूं जैसी फसलों में इसका छिड़काव या सिंचाई के साथ प्रयोग करने पर पैदावार पहले की तुलना में दोगुनी तक बढ़ सकती है। इसके इस्तेमाल से न केवल अनाज की मात्रा बढ़ती है, बल्कि उसकी गुणवत्ता, चमक और पोषक मान में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जाती है।
इस प्राकृतिक मिश्रण में पौधों के विकास के लिए आवश्यक नाइट्रोजन के साथ-साथ सभी प्रकार के सूक्ष्म और वृहद पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद रहते हैं। जब फसलों को ये सभी आवश्यक तत्व प्राकृतिक रूप से मिलते हैं, तो पौधों की प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता यानी सर्वाइवल क्षमता मजबूत होती है। इसके परिणामस्वरूप फसलों का विकास तेज गति से होता है और किसानों को रासायनिक खादों के भारी खर्च से मुक्ति मिलती है।



















