देश में स्कूली शिक्षा की नीतियां तैयार करने और परीक्षाओं का संचालन करने वाली दो सबसे प्रमुख संस्थाओं में कर्मचारियों का भारी अकाल बना हुआ है। संसदीय समिति की नई रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) तथा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) में हजारों पद खाली पड़े हैं। इन रिक्तियों के कारण न केवल प्रशासनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है, बल्कि 10वीं और 12वीं की राष्ट्रीय बोर्ड परीक्षाओं की सुरक्षा और मूल्यांकन प्रक्रिया की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
एनसीईआरटी में स्वीकृत क्षमता के आधे से ज्यादा पद रिक्त
संसदीय अनुमान समिति (2026-27) ने देश में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नीतिगत पहलुओं पर सौंपी अपनी 10वीं रिपोर्ट में एनसीईआरटी की स्थिति को अत्यंत चिंताजनक बताया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू करने और स्कूली पाठ्यक्रम को नया रूप देने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले इस संस्थान में आधे से अधिक पद खाली हैं। अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, एनसीईआरटी में कुल स्वीकृत 2,844 पदों के मुकाबले केवल 1,248 कर्मचारी ही कार्यरत थे, जिससे 1,596 पद रिक्त बने हुए हैं।
खाली पड़े इन 1,596 पदों का ब्योरा बेहद चौंकाने वाला है। इसमें 145 पद शैक्षणिक कैडर के हैं, जबकि 131 पद स्कूली शिक्षण से जुड़े हैं। इसके अलावा 916 प्रशासनिक पद और 404 सहायक स्टाफ के पद लंबे समय से खाली चल रहे हैं। समिति का स्पष्ट मानना है कि इतने महत्वपूर्ण शैक्षणिक निकाय में पदों का खाली रहना चिंता का विषय है और शिक्षा मंत्रालय को तत्काल कदम उठाकर इन रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
सीबीएसई में 44 प्रतिशत रिक्तियां और संविदा कर्मचारियों पर निर्भरता
दूसरी तरफ, देश के सबसे बड़े स्कूली परीक्षा बोर्ड सीबीएसई में भी स्थिति बेहतर नहीं है। बोर्ड में स्वीकृत 2,117 पदों में से 933 पद (लगभग 44 प्रतिशत) खाली पड़े हैं। इन रिक्तियों में सबसे बड़ा हिस्सा ग्रुप सी श्रेणी के सहायक कर्मचारियों का है, जिनके 595 पद खाली हैं। कर्मचारियों की इस कमी को पूरा करने के लिए सीबीएसई वर्तमान में अपने रोजमर्रा के प्रशासनिक व गोपनीय कार्यों के लिए संविदा और अस्थायी कर्मचारियों पर निर्भर है।
संसदीय समिति ने संवेदनशील परीक्षा कार्यों के लिए ठेके पर रखे गए अस्थायी कर्मचारियों के इस्तेमाल पर कड़ा ऐतराज जताया है। समिति ने सिफारिश की है कि बोर्ड परीक्षाओं की गोपनीयता, सुरक्षा और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सीबीएसई को संविदा कर्मचारियों पर निर्भरता तुरंत बंद करनी चाहिए। बोर्ड को परामर्श दिया गया है कि वह एक पारदर्शी और समयबद्ध भर्ती अभियान चलाकर सभी 933 रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्तियां करे।
छात्रों की बढ़ती संख्या और बढ़ता कार्यभार
रिपोर्ट में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि सीबीएसई का आकार और जिम्मेदारी साल-दर-साल तेजी से बढ़ी है। 8 अक्टूबर 2025 तक दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों की संख्या 1992-93 में महज 3,787 थी, जो 2024-25 में बढ़कर 31,234 तक पहुंच गई है। इतने विशाल तंत्र को संभालने के लिए बोर्ड वर्तमान में 25 क्षेत्रीय कार्यालयों और 5 उप-क्षेत्रीय कार्यालयों के माध्यम से अपना परिचालन कर रहा है।
परीक्षार्थियों की संख्या के मोर्चे पर भी भारी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2025 तक कक्षा 12वीं में परीक्षार्थियों की संख्या 17 लाख से अधिक तथा कक्षा 10वीं में 23 लाख से अधिक हो चुकी है। इतने बड़े पैमाने पर 40 लाख से अधिक छात्रों की बोर्ड परीक्षाएं आयोजित करने वाले निकाय का स्व-वित्तपोषित होना और बिना किसी सरकारी अनुदान के चलना सराहनीय है, लेकिन स्थायी कर्मचारियों की कमी से पूरी प्रणाली के चरमराने का जोखिम पैदा हो गया है।



















