देश भर के मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के शिक्षा के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई है। शीर्ष अदालत ने इस विषय से जुड़ी एक नई जनहित याचिका को पूर्व में लंबित उस मामले के साथ टैग करने का निर्देश दिया है, जिसे पहले ही एक विस्तृत संविधान पीठ या बड़ी बेंच के समक्ष भेजने की बात कही जा चुकी है। इस सुनवाई के बाद अब यह तय होगा कि क्या धार्मिक शिक्षण संस्थानों को राइट टू एजुकेशन यानी RTE Act 2009 के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जा सकता है या नहीं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ का आदेश
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ के सामने पेश हुआ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू शामिल थे। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष पुरजोर दलील दी कि धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों को RTE कानून के दायरे से पूरी तरह अलग रखना बच्चों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। अदालत ने दलीलों को सुनने के बाद स्पष्ट किया कि चूंकि अल्पसंख्यक और धार्मिक संस्थानों पर इस कानून की प्रयोज्यता से जुड़ा व्यापक सवाल पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, इसलिए इस नई याचिका की सुनवाई भी उसी लंबित मामले के साथ मिलाकर की जाएगी।
RTE Act 2009 की धारा 1(5) की संवैधानिकता पर सवाल
महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे जिया खान की ओर से दायर इस जनहित याचिका में मुख्य रूप से RTE Act की धारा 1(5) को चुनौती दी गई है। कानून का यह विशेष प्रावधान मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और प्राथमिक रूप से धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले अन्य संस्थानों को RTE कानून के लागू होने से छूट देता है। याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क रखा कि बच्चा किसी भी प्रकार के स्कूल या संस्थान में पढ़ाई कर रहा हो, उसके 6 से 14 वर्ष की आयु के दौरान मिलने वाली अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। सभी बच्चों को समान स्तर की गुणवत्तायुक्त बुनियादी शिक्षा पाने का अधिकार है।
शिक्षक पात्रता परीक्षा और न्यूनतम योग्यता पर दलीलें
याचिका में केवल छात्रों के प्रवेश और सुविधाओं की बात ही नहीं उठाई गई है, बल्कि शिक्षकों की गुणवत्ता और टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट यानी TET की अनिवार्यता पर भी जोर दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अल्पसंख्यक और धार्मिक संस्थानों के शिक्षकों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और TET जैसी शर्तें लागू करने से संविधान द्वारा दिए गए प्रबंधन के अधिकारों पर कोई आघात नहीं पहुंचता। ऐसे संस्थान योग्य और परीक्षा उत्तीर्ण उम्मीदवारों में से अपनी पसंद के शिक्षकों का चयन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहते हैं। इससे संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हुए बिना शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार संभव है।
साल 2014 के पारामति ट्रस्ट फैसले की पृष्ठभूमि
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें साल 2014 के पारामति एजुकेशनल एंड Cultural ट्रस्ट मामले में आए सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले से जुड़ी हैं। उस समय शीर्ष अदालत ने निर्णय दिया था कि RTE Act अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं हो सकता, क्योंकि इससे संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और चलाने के मिले मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। इसी फैसले के आधार पर धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE के नियमों से छूट मिलती आ रही है।
सितंबर 2025 का ऐतिहासिक मोड़ और अनुच्छेदों में संतुलन
हालाँकि, सितंबर 2025 में अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के पुराने फैसले पर गंभीर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने उस समय टिप्पणी की थी कि संविधान का अनुच्छेद 21A, जो 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, और संविधान का अनुच्छेद 30, जो अल्पसंख्यकों को अधिकार प्रदान करता है, दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने माना था कि इन दोनों संवैधानिक अधिकारों के बीच एक न्यायसंगत संतुलन बनाना आवश्यक है। अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE कानून से पूरी तरह बाहर कर देने की व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता जताई गई थी और मामले को बड़ी बेंच को संदर्भित करने का मार्ग प्रशस्त किया गया था।
बड़ी बेंच के समक्ष विचारणीय प्रमुख प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाओं को एक साथ जोड़े जाने के बाद अब बड़ी बेंच के सामने कुछ अति महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न होंगे। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या मदरसों और वैदिक पाठशालाओं को RTE Act से शत-प्रतिशत छूट देना न्यायसंगत है? इसके अतिरिक्त, क्या शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता, TET परीक्षा पास करने की अनिवार्यता और मानक शैक्षणिक दिशानिर्देश इन धार्मिक संस्थानों पर लागू किए जा सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से देश भर के लाखों छात्रों और हजारों शिक्षण संस्थानों का भविष्य तय होगा।


















