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सोशल मीडिया पर अधूरे ज्ञान से इतिहास समझने की प्रवृत्ति पर दिल्ली में विद्वानों का मंथन, पुस्तक का विमोचनशिक्षा
9 अक्तू॰ 2026, 4:23 pm (1 घंटे पहले)· 0

सोशल मीडिया पर अधूरे ज्ञान से इतिहास समझने की प्रवृत्ति पर दिल्ली में विद्वानों का मंथन, पुस्तक का विमोचन

दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रो. मनीषा मिश्रा अग्निहोत्री की मध्यकालीन भारत पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन हुआ, जहां वक्ताओं ने इतिहास लेखन में प्रामाणिक स्रोतों की अहमियत रेखांकित की।

आधुनिक दौर में डिजिटल मंचों और मैसेजिंग ऐप्स पर ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर व्यापक दावे किए जा रहे हैं, लेकिन प्रामाणिक इतिहास के अध्ययन के लिए गंभीर अकादमिक पद्धतियां अनिवार्य हैं। राष्ट्रीय राजधानी स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित एक शैक्षणिक विमर्श के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि वास्तविक इतिहासकार किसी भी तथ्य को स्वीकार करने से पहले विस्तृत अनुसंधान और ठोस साक्ष्यों का परीक्षण करते हैं। इस संगोष्ठी के दौरान प्रोफेसर मनीषा मिश्रा अग्निहोत्री के नवीनतम शोध कार्य पर आधारित पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण भी संपन्न हुआ।

मध्यकालीन भारत और फारसी स्रोतों पर केंद्रित शोध ग्रंथ

विमोचित पुस्तक मध्यकालीन भारत में हिंदू परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक संदर्भों की पड़ताल करती है। लेखिका ने अपने विश्लेषण में अबुल फ़ज़ल, 'मोबेद' और दारा शिकोह जैसे प्रमुख मध्यकालीन विचारकों के ऐतिहासिक दस्तावेजों को आधार बनाया है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि उस युग के फारसी विद्वान और लेखक भारतीय सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को किस दृष्टिकोण से दर्ज कर रहे थे। 16वीं और 17वीं शताब्दी के इन ग्रंथों के माध्यम से उस दौर के वैचारिक संवाद को समझने की चेष्टा की गई है।

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लेखिका ने रेखांकित किया कि मध्यकालीन फारसी ग्रंथों का अध्ययन उनके लिए एक लंबा बौद्धिक सफर रहा है। उनके अनुसार, ऐतिहासिक साक्ष्यों की पड़ताल दर्शाती है कि 'हिंदू' संज्ञा का पहचान के रूप में प्रयोग 15वीं शताब्दी के दौरान व्यापक रूप से सामने आया। इससे पूर्व के कालखंडों में व्यक्तियों द्वारा स्वयं को इस पहचान से संबोधित करने के प्रमाण नहीं मिलते। इस प्रकार के भाषाई और सामाजिक बदलावों को समझने के लिए तत्कालीन मूल पांडुलिपियों का निष्पक्ष अवलोकन जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सभ्यता और ज्ञान परंपराओं पर विमर्श

यह पुस्तक लोकार्पण दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज द्वारा संयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का हिस्सा था। 'रीविजिटिंग द कॉन्टूर्स ऑफ इंडियन सिविलाइज़ेशन: कल्चर, हेरिटेज, गांधी एंड इंडिजेनस एपिस्टेमोलॉजीज' विषयक इस सम्मेलन को हेरिटेज द हिस्ट्री एसोसिएशन, गांधी स्टडी सर्कल और हेरिटेज क्लब के सहयोग से आयोजित किया गया। इस मंच पर भारतीय ज्ञान परंपराओं और सभ्यतागत विकास के विभिन्न आयामों पर अकादमिक परिचर्चाएं आयोजित हुईं।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज की प्राचार्या प्रोफेसर स्वाति पाल ने विविधतापूर्ण दृष्टिकोणों के महत्व पर बल दिया। उन्होंने टिप्पणी की कि मध्यकालीन युग में भी भारत को समझने का कोई इकहरा नजरिया नहीं था, बल्कि अलग-अलग दृष्टिकोणों से समाज को देखा जाता था। सत्र में प्रोफेसर अमर फारूकी ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने शोधपरक विचार रखे, जबकि अनुराधा कृष्णा और प्रोफेसर प्रभु मोहापात्रा ने भी अपने विश्लेषण साझा किए।

प्रश्नोत्तर सत्र और आगामी परिचर्चा की रूपरेखा

सत्र के समापन के उपरांत एक संवादात्मक प्रश्नोत्तर दौर आयोजित हुआ, जिसमें शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने मध्यकालीन इतिहास, सांस्कृतिक समन्वय और दस्तावेजी साक्ष्यों की वैधता पर वक्ताओं से प्रश्न पूछे। उपस्थित इतिहासकारों ने श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए ऐतिहासिक स्रोतों की व्याख्या के वैज्ञानिक तरीके समझाए।

सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय समाज को गांधीवादी चिंतन, विरासत और देशज ज्ञान प्रणालियों के सम्मिलित परिप्रेक्ष्य में समझना है। इस आयोजन का दूसरा तथा अंतिम सत्र 9 अक्टूबर को निर्धारित है, जहां गांधीवादी दर्शन और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर नए शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे।

सवाल-जवाब

प्रोफेसर मनीषा मिश्रा अग्निहोत्री की पुस्तक किस विषय पर आधारित है?
यह पुस्तक मध्यकालीन भारत में हिंदू परंपराओं और फारसी विद्वानों अबुल फ़ज़ल, 'मोबेद' तथा दारा शिकोह के दृष्टिकोण पर केंद्रित है।
पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम कहां आयोजित किया गया?
यह विमोचन नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुआ।
सम्मेलन का आयोजन किस संस्थान ने किया था?
सम्मेलन का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज के संबंधित अध्ययन समूहों द्वारा किया गया था।
पुस्तक के अनुसार 'हिंदू' संज्ञा के प्रयोग को लेकर क्या तथ्य प्रस्तुत किया गया है?
पुस्तक के अनुसार 'हिंदू' संज्ञा का पहली बार प्रयोग 15वीं शताब्दी में दर्ज हुआ और इससे पहले लोगों द्वारा स्वयं को यह कहने के प्रमाण नहीं हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में किसने संबोधित किया?
उद्घाटन सत्र में प्रोफेसर अमर फारूकी ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किए।
इस दो दिवसीय सम्मेलन का अंतिम दिन कब निर्धारित है?
सम्मेलन का दूसरा और अंतिम दिन 9 अक्टूबर को निर्धारित किया गया है।
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