स्मार्टफोन और डिजिटल स्क्रीन्स पर घंटों बिताने की बच्चों की आदत आज अधिकांश परिवारों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। इसी चुनौती से निपटने के लिए गुजरात के राजकोट में शिक्षा से जुड़ा एक बेहद अनूठा प्रयोग सामने आया है। राजकोट के वर्धमाननगर स्थित आरबी स्कूल ने छात्रों का ध्यान डिजिटल दुनिया से हटाकर साहित्य और ज्ञान की ओर मोड़ने के लिए एक विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रम लागू किया है। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को किताबें पढ़ने के एवज में बाकायदा नकद प्रोत्साहन दिया जा रहा है। योजना का सीधा सिद्धांत यह है कि बच्चा जितना समय पुस्तक के पन्नों के साथ बिताएगा, उसे उसी अनुपात में आर्थिक पारितोषिक हासिल होगा।
प्रति घंटे पांच रुपये की प्रोत्साहन व्यवस्था
इस व्यवस्था के तहत तय किया गया है कि यदि कोई विद्यार्थी एकाग्र होकर एक घंटे तक पुस्तक पढ़ता है, तो उसे 5 रुपये दिए जाएंगे। यदि वह दो घंटे तक अध्ययन करता है, तो यह राशि बढ़कर 10 रुपये हो जाती है। समय में जितनी बढ़ोतरी होगी, उसी दर से प्रोत्साहन राशि का पैमाना भी आगे बढ़ता जाएगा। यह पूरी योजना कक्षा 3 से लेकर कक्षा 10 तक के लगभग 150 छात्र-छात्राओं के लिए लागू की गई है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को बिना किसी मानसिक दबाव के पुस्तकों की दुनिया से जोड़ना और टेलीविजन तथा स्मार्टफोन के अत्यधिक स्क्रीन टाइम पर अंकुश लगाना है।
मनपसंद विषयों के चयन की पूरी आजादी
इस अभिनव योजना में छात्रों पर किसी खास विषय अथवा पाठ्यक्रम की किताब पढ़ने की बाध्यता नहीं रखी गई है। बच्चे अपनी निजी रुचि और पसंद के अनुसार कोई भी ज्ञानवर्धक, साहित्यिक या रोचक पुस्तक चुन सकते हैं। इसके अतिरिक्त पढ़ाई के समय को लेकर भी स्कूल की ओर से कोई कड़ा बंधन नहीं है। छात्र दिन के किसी भी हिस्से में अपनी सुविधा और रुचि के मुताबिक अध्ययन कर सकते हैं। अपनी पसंद की सामग्री चुनने की इस स्वतंत्रता के चलते बच्चों में पुस्तकों के प्रति स्वाभाविक आकर्षण पनप रहा है।
फर्जी दावे रोकने के लिए सख्त निगरानी तंत्र
स्कूल प्रबंधन ने इस बात का भी विशेष ध्यान रखा है कि प्रोत्साहन पाने के चक्कर में कोई विद्यार्थी केवल दिखावा न करे। केवल यह कह देने से राशि नहीं मिलती कि अमुक समय तक पढ़ाई की गई है। इसके लिए स्कूल ने एक व्यवस्थित रिकॉर्ड प्रक्रिया तैयार की है। प्रत्येक विद्यार्थी को एक चार्ट मेंटेन करना होता है, जिसमें पढ़ी गई पुस्तक का शीर्षक, कुल अध्ययन के घंटे और पढ़े गए पन्नों की संख्या दर्ज करनी होती है। इस दैनिक विवरण पर घर में माता-पिता के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं, ताकि घर पर बिताए गए समय की पुष्टि हो सके। इसके बाद यह चार्ट विद्यालय में क्लास टीचर के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है।
शिक्षक लेते हैं समझ और विषयवस्तु की परीक्षा
निगरानी की यह प्रक्रिया केवल कागजी दस्तखत तक सीमित नहीं रहती। जब छात्र अपना भरा हुआ रिकॉर्ड चार्ट जमा करता है, तब उसे संबंधित पुस्तक भी शिक्षक के सामने लानी होती है। शिक्षक पुस्तक के भीतर से विद्यार्थी से सवाल पूछते हैं ताकि यह परखा जा सके कि उसने वास्तव में पन्नों को समझा है या केवल पन्ने पलटे हैं। जब छात्र पूछे गए सवालों के संतोषजनक उत्तर दे देता है, तभी शिक्षक उस चार्ट को प्रमाणित कर अपने हस्ताक्षर करते हैं। पूरे माह के प्रमाणित रिकॉर्ड का संकलन कर महीने के अंत में कुल घंटों के हिसाब से प्रोत्साहन राशि का भुगतान किया जाता है।
छात्रों के अनुभव और बदलती आदतें
इस योजना में हिस्सा ले रहे विद्यार्थियों का अनुभव बताता है कि शुरुआत में उन्हें पुस्तकों के साथ बैठना नीरस और उबाऊ लगता था। हालांकि, नकद इनाम की प्रेरणा ने उन्हें शुरुआत में किताबें हाथ में लेने को विवश किया। धीरे-धीरे जब उन्होंने पन्नों को पढ़ना शुरू किया, तो उनकी स्वाभाविक रुचि जागृत होने लगी। अब कई छात्रों का कहना है कि उन्हें मोबाइल गेम्स अथवा सोशल मीडिया की तुलना में किताबों की दुनिया अधिक ज्ञानवर्धक और मनोरंजक लगने लगी है।
भविष्य में स्वाभाविक स्वाध्याय की उम्मीद
विद्यालय प्रशासन का मानना है कि नकद प्रोत्साहन केवल एक आरंभिक माध्यम है, जिसके जरिए बच्चों की झिझक तोड़ी जा रही है। इसका अंतिम लक्ष्य किसी वित्तीय लाभ का वितरण करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर स्वाध्याय की एक दीर्घकालिक आदत स्थापित करना है। स्कूल का मानना है कि यदि बालपन में अध्ययन की यह आदत जड़ जमा ले, तो आगे चलकर ये बच्चे किसी भी इनाम या प्रोत्साहन के बिना भी ज्ञानार्जन के लिए स्वतः किताबें पढ़ना जारी रखेंगे। नियमित अध्ययन का यह सकारात्मक असर उनके शैक्षणिक प्रदर्शन और बौद्धिक विकास पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।
संभावित बजट और आर्थिक विश्लेषण
यदि इस योजना के वित्तीय पक्ष को देखा जाए, तो नामांकित सभी 150 विद्यार्थी अगर औसतन रोजाना 2 घंटे अध्ययन करते हैं, तो एक महीने में कुल प्रोत्साहन राशि लगभग 45 हजार रुपये तक पहुंच सकती है। वहीं, अगर बच्चे अपनी अध्ययन अवधि को बढ़ाकर रोजाना 3 घंटे कर देते हैं, तो यह मासिक खर्च बढ़कर लगभग 67 हजार रुपये हो जाएगा। विद्यालय प्रबंधन के लिए यह राशि कोई व्यय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को डिजिटल भटकाव से बचाकर पुस्तकों की दुनिया में वापस लाने के लिए किया गया एक सार्थक निवेश है।



















