सिनेमाघरों में बिना किसी भारी प्रचार या व्यापक अभियान के रिलीज होने के बावजूद फिल्म हनुमान अंश ने दर्शकों के दिलों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। इस आध्यात्मिक चलचित्र का केंद्र बिंदु नीब करौरी बाबा का पावन जीवन है, जिसकी वजह से उनसे जुड़े तमाम ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थलों पर एकाएक लोगों की आवाजाही तेज हो गई है। इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में स्थित एक बेहद सीधा-सादा मकान लोगों के आकर्षण का नया केंद्र बन चुका है। चर्च लेन इलाके में स्थित मकान नंबर 18/4 बाहर से देखने में किसी सामान्य पारिवारिक घर की तरह दिखता है, जहां न तो कोई विशाल मंदिर का ढांचा खड़ा है, न ही कोई स्थापित मूर्ति और न ही दिन-रात होने वाले कर्मकांड। इसके बावजूद प्रतिदिन ढलती शाम के साथ लोग इस पते पर श्रद्धापूर्वक अपना शीश झुकाने पहुंच रहे हैं।
साधारण चारदीवारी में संजोई गई आध्यात्मिक यादें
प्रयागराज की चर्च लेन की एक शांत और शांतमयी गली में स्थित यह आवासीय परिसर किसी भी तरह से अपने पड़ोस के घरों से अलग दिखाई नहीं देता। इसके बावजूद भक्तों के लिए यह किसी तीर्थ स्थल से कम पवित्र नहीं माना जाता। लोग यहां घंटों समय बिताने नहीं, बल्कि उस पावन स्मृति के आगे नतमस्तक होने आते हैं, जो इस परिसर से जुड़ी है। दरअसल, ख्यातिप्राप्त आध्यात्मिक विभूति नीम करौली बाबा अपने जीवनकाल के दौरान समय-समय पर इसी घर में आकर रुका करते थे। यह आवास इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रतिष्ठित शिक्षक रहे प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी का निजी निवास था। बाबा साल भर में एक या दो बार प्रोफेसर मुखर्जी से मिलने विशेष रूप से प्रयागराज स्थित इस पते पर पधारते थे।
फिल्म चर्चा और दर्शनार्थियों के लिए तय व्यवस्था
यद्यपि फिल्म हनुमान अंश की वास्तविक शूटिंग इस विशेष मकान के भीतर संपन्न नहीं हुई थी, लेकिन पटकथा में बाबा के जीवन प्रसंगों और उनकी उपस्थिति का उल्लेख आते ही आम जनमानस में उनकी स्मृतियों को लेकर एक नया कौतूहल जागृत हो गया। इसी आध्यात्मिक उत्कंठा के चलते बड़ी संख्या में लोग इस आवास की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। व्यवस्था बनाए रखने के लिए घर के द्वार प्रतिदिन शाम 5 बजे से लेकर रात 8 बजे तक आम आगंतुकों के लिए खोले जाते हैं। यहां किसी भी प्रकार का आर्थिक दान, नकदी या पारंपरिक चढ़ावा स्वीकार करने की सख्त मनाही है। आने वाले व्यक्तियों को केवल शांतिपूर्वक भीतर जाकर दर्शन करने की अनुमति दी जाती है। दर्शन प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात वर्तमान में घर की पूरी देखरेख संभालने वाली सत्या पांडे और उनके पति इंद्रेश प्रसाद सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप लड्डू भेंट करते हैं।
कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर से शुरू हुआ शताब्दी पुराना नाता
नीम करौली बाबा और प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी के मध्य का आत्मीय संबंध लगभग 100 वर्ष पुराना बताया जाता है। इन दोनों का पहला ऐतिहासिक परिचय वर्ष 1935 में कोलकाता के सुप्रसिद्ध दक्षिणेश्वर मंदिर के पावन परिसर में हुआ था। उस पहली भेंट के दौरान ही बाबा ने प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी को एक विशेष मंत्र की दीक्षा प्रदान की थी। इसके उपरांत दोनों का लंबा संपर्क कुछ समय तक अप्रत्यक्ष रहा, परंतु वर्ष 1950 में इलाहाबाद (जिसे अब प्रयागराज कहा जाता है) की पावन धरा पर दोनों का पुनर्मिलन संभव हुआ। उस कालखंड में सुधीर मुखर्जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के पद पर अपनी शैक्षणिक सेवाएं प्रारंभ कर दी थीं। बाबा के सान्निध्य और उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व से अत्यधिक गहरे प्रभावित होकर उन्होंने वर्ष 1956 में चर्च लेन में अपनी इस निजी रिहाइश का निर्माण कराया था।
पवित्र कक्ष, तख्त और सात्विक दिनचर्या
मकान की बनावट के भीतर आज भी बाबा नीम करौली के लिए नियत किए गए उस ऐतिहासिक कक्ष को पूरी तरह सुरक्षित और अक्षुण्ण रूप में रखा गया है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार बाबा जब भी प्रयागराज आते थे, तो इसी शांत कमरे में अपना समय प्रार्थना और विश्राम में व्यतीत किया करते थे। वर्तमान में भी उस कक्ष में रखे बाबा के लकड़ी के तख्त और उनके तकिए की नियमित रूप से अर्चना की जाती है और उन पर ताजे पुष्प अर्पित किए जाते हैं। कक्ष की पवित्रता बनाए रखने के लिए हर मंगलवार को तख्त पर बिछाई जाने वाली चादर को पारंपरिक रूप से बदला जाता है। बाबा के खान-पान की रुचियों को लेकर भी पुरानी परंपराएं जीवित रखी गई हैं। उन्हें लौकी की सादी सब्जी, मूंग की दाल और शुद्ध बेसन की बनी रोटी विशेष प्रिय थीं, जिसके चलते आज भी प्रतिदिन इन्हीं सात्विक व्यंजनों का भोग तैयार करके बाबा को समर्पित किया जाता है।
भक्ति का स्वरूप और पारिवारिक विरासत
सत्या के अनुसार, बाबा नीम करौली को पवनपुत्र हनुमान जी के अनन्य उपासक और स्वयं उनके साक्षात अंश अथवा अवतार के रूप में श्रद्धा प्राप्त थी। उनके विवरण के अनुसार बाबा ने प्रोफेसर मुखर्जी को एक बार स्वयं हनुमान के दिव्य रूप में साक्षात दर्शन दिए थे। बाबा का स्पष्ट दृष्टिकोण था कि वे कभी किसी अलौकिक चमत्कार का प्रचार या प्रदर्शन नहीं करते थे, बल्कि उनका निरंतर यही कहना होता था कि सारी घटनाएं ईश्वरीय विधान के तहत स्वतः घटित होती हैं। समय बीतने के साथ सत्या प्रोफेसर मुखर्जी के परिवार का अभिन्न अंग बन गईं। प्रोफेसर दंपति की अपनी कोई जैविक संतान नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने सत्या को अत्यंत स्नेहपूर्वक अपनी मानस पुत्री की तरह स्वीकार किया और पाला। वर्ष 1997 में प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी का देहावसान हो गया और उनके गुजरने के कुछ वर्षों के बाद उनकी धर्मपत्नी कमला ने भी इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया। परिवार के संस्मरण बताते हैं कि बाबा ने एक बार प्रोफेसर मुखर्जी को आश्वस्त किया था कि यह घर स्वयं उनका अपना है और उनकी चेतना सदैव यहां विद्यमान रहेगी। यही कारण है कि आज भी इस घर की चौखट पर पैर रखते ही परिजनों और श्रद्धालुओं को एक अलौकिक उपस्थिति का जीवंत अहसास होता है।


















