हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में आनंद बख्शी ने अपनी सहज और दिल को छू लेने वाली लेखनी से अनगिनत अमर नग्मे रचे। 'मेरे नैना सावन भादों', 'चिट्ठी आई है' और 'चांद सी महबूबा हो मेरी' जैसे कालजयी गीतों के जरिए उन्होंने श्रोताओं के दिलों में एक अमिट मुकाम हासिल किया। प्रेम, विरह और मानवीय संवेदनाओं को सीधे शब्दों में पिरोने वाले इस दिग्गज फनकार के जीवन में एक ऐसा मोड़ भी आया था, जब वह खुद के गाए गीतों को लेकर गहरे असमंजस और अंधविश्वास के शिकार हो गए थे। उन्हें इस बात का डर सताने लगा था कि जिस फिल्म में वह अपनी आवाज देंगे, वह बॉक्स ऑफिस पर असफल हो जाएगी। इसी मानसिक द्वंद्व के बीच साल 1976 में एक ऐसा गीत वजूद में आया, जिसने न केवल उनके इस संकोच को तोड़ा बल्कि धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की पर्दे पर मौजूदगी को भी यादगार बना दिया।
फिल्म चरस और सदाबहार नगमे की पृष्ठभूमि
सिनेमा जगत के कई पुराने गाने केवल अपनी कर्णप्रिय धुनों या बोलों के कारण ही इतिहास में दर्ज नहीं होते, बल्कि उनके निर्माण के दौर से जुड़े किस्से भी बेहद दिलचस्प होते हैं। ऐसा ही एक अविस्मरणीय वाकया साल 1976 में रिलीज हुई एक्शन और ड्रामा से भरपूर फिल्म 'चरस' के मशहूर गीत 'आ जा तेरी याद आई' के साथ जुड़ा हुआ है। यह गीत केवल एक संगीत रचना भर नहीं था, बल्कि फिल्म की मुख्य पटकथा और कहानी के भावनात्मक उतार-चढ़ाव को आगे बढ़ाने वाला एक बहुत बड़ा माध्यम साबित हुआ।
इस फिल्म का संपूर्ण लेखन, निर्माण और निर्देशन रामानंद सागर ने संभाला था। वहीं कैमरे के पीछे की बागडोर और सिनेमैटोग्राफी का पूरा दायित्व उनके पुत्र प्रेम सागर के कंधों पर था। कई दशकों बाद प्रेम सागर ने अपने पिता के जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों पर केंद्रित एक संस्मरण पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक 'एन एपिक लाइफ रामानंद सागर, फ्रॉम बरसात टू रामायण' रखा गया। इस किताब के पन्नों में उन्होंने 'चरस' की शूटिंग, संगीत निर्माण और इस विशिष्ट गीत के जन्म से जुड़े कई अनसुने प्रसंगों को विस्तार से सार्वजनिक किया।
आनंद बख्शी के मन में क्यों बैठा था नाकामी का डर
'आ जा तेरी याद आई' एक बहुआयामी युगल गीत था, जिसमें आनंद बख्शी के साथ लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसी महान गायकी की हस्तियों ने सुर मिलाए थे। इस गीत का संगीत उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया था, जबकि इसके बोल स्वयं आनंद बख्शी की कलम से निकले थे। जब रिकॉर्डिंग स्टूडियो में इस गीत के शुरुआती आलाप और पंक्तियों को आनंद बख्शी की आवाज में रिकॉर्ड करने की तैयारी चल रही थी, तब उनके भीतर एक पुरानी नाकामी का साया मंडरा रहा था।
असल में इससे कुछ समय पूर्व आनंद बख्शी ने फिल्म 'मोम की गुड़िया' में दो गीतों को अपनी आवाज दी थी। दुर्भाग्यवश वह फिल्म सिनेमाघरों में दर्शकों को आकर्षित करने में नाकाम रही और बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई। इस असफलता का आनंद बख्शी के मानस पर इतना गहरा असर पड़ा कि उन्होंने मान लिया कि उनकी आवाज फिल्मों के लिए दुर्भाग्य लेकर आती है और उनका गायन किसी भी परियोजना के लिए अनलकी साबित होता है। इसी डर के चलते 'चरस' के गाने की रिकॉर्डिंग के समय उन्होंने निर्देशक रामानंद सागर के सामने अपनी एक बड़ी चिंता जाहिर की और एक अनोखा अनुरोध रख दिया।
रामानंद सागर की सूझबूझ और परदे पर आध्यात्मिक स्पर्श
आनंद बख्शी की इस हिचकिचाहट को दूर करने के लिए रामानंद सागर ने एक बेहद रचनात्मक और संवेदनशील तरीका निकाला। बख्शी साहब ने निर्देशक से साफ कहा था कि पर्दे पर जब भी उनकी आवाज सुनाई दे, उस दौरान किसी भी नकारात्मकता को दूर करने के लिए कुछ पवित्र और धार्मिक दृश्य दिखाए जाने चाहिए। रामानंद सागर ने इस बात को गंभीरता से लिया और गीत के संपादन व फिल्मांकन में एक अनूठा प्रयोग किया।
जब दर्शक बड़े पर्दे पर 'आ जा तेरी याद आई' गीत को शुरू होते देखते हैं, तो शुरुआती पलों में जैसे ही आनंद बख्शी की गायकी का हिस्सा बजता है, कैमरे के फ्रेम में मदर मैरी और ईसा मसीह (जीसस) की पावन तस्वीरें और दृश्य उभरते हैं। निर्देशक के इस छोटे से फैसले ने न केवल गीतकार के दिल से अपशकुन का भय मिटा दिया, बल्कि गाने की शुरुआत को एक अद्भुत रूहानी और मार्मिक गरिमा भी प्रदान की। यह दृश्य संयोजन केवल किसी तकनीकी आवश्यकता का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके मूल में एक गीतकार की निजी संवेदना और भावनात्मक विश्वास गहराई से जुड़ा था।
धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की केमिस्ट्री बनी चर्चा का केंद्र
फिल्म 'चरस' की सफलता और चर्चा के पीछे मुख्य कलाकारों की निजी और ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री का भी बहुत बड़ा हाथ रहा। इस फिल्म में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी मुख्य भूमिकाओं में थे। प्रेम सागर ने अपनी किताब में उल्लेख किया है कि जब इस फिल्म की शूटिंग चल रही थी, तब इन दोनों कलाकारों का आपसी प्रेम संबंध अपने चरम पर था। निर्माताओं और प्रचारकों ने भी इस समीकरण को बखूबी पहचाना और फिल्म के प्रचार अभियानों में इस जोड़ी की वास्तविक नजदीकियों को प्रमुखता से पेश किया गया।
फिल्म के तत्कालीन विज्ञापनों और पोस्टरों में इस रोमांटिक जोड़ी को रेखांकित करने के लिए 'हॉटेस्ट रोमांस ऑफ द ईयर' जैसी पंक्तियों का इस्तेमाल किया गया था। साल 1976 में पर्दे पर आई इस फिल्म के लगभग सभी गाने बहुत बड़े हिट साबित हुए थे। एक ओर जहां दर्शक धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की इस रियल लाइफ केमिस्ट्री को देखने उमड़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर 'आ जा तेरी याद आई' जैसे संवेदनशील गीत ने कहानी को एक मजबूत आधार दिया। आज भी जब इस गाने की धुन गूंजती है, तो वह बीते दौर के बॉलीवुड के समर्पण, रचनात्मकता और अनूठी कहानियों को जीवंत कर देती है।



















