फिल्म निर्माण के लिए महंगे स्टूडियो, लाखों रुपये के बजट या पेशेवर सिनेमा कैमरों का होना ही एकमात्र रास्ता नहीं है, यदि लगन और रचनात्मक सोच मौजूद हो तो साधारण मोबाइल फोन भी एक सशक्त माध्यम बन सकता है। मध्य प्रदेश में किशोर कुमार की जन्मस्थली के रूप में पहचाने जाने वाले खंडवा जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम मलगांव खेगांव के साधारण युवाओं ने इस बात को सच कर दिखाया है। यहाँ रहने वाले ग्रामीण युवकों के एक समूह ने आपसी सहयोग के दम पर करीब एक घंटे की अवधि वाली पूरी कॉमेडी फिल्म तैयार कर ली है। इस पूरी परियोजना की सबसे खास बात यह रही कि इसके निर्माण के लिए न तो कोई महंगा कैमरा बाजार से खरीदा गया, न ही कोई कृत्रिम सेट अथवा स्टूडियो तैयार किया गया और न ही किसी स्थापित प्रोडक्शन हाउस की वित्तीय सहायता ली गई। इन युवकों ने अपने हाथ में मौजूद स्मार्टफोन को ही मुख्य कैमरा बनाया और अपने ही गांव, खेतों, पगडंडियों, ग्रामीण सड़कों तथा पास के प्राकृतिक जंगलों को शूटिंग लोकेशन के रूप में इस्तेमाल किया। इस स्वतंत्र प्रयास से बनी फिल्म का शीर्षक ‘गब्बर इस बैक 2 (2.0)’ रखा गया है। इसका आधिकारिक ट्रेलर जारी होते ही क्षेत्रीय स्तर पर इस अनूठी पहल को लेकर काफी चर्चा और उत्साह देखा जा रहा है। तय कार्यक्रम के अनुसार यह पूरी फिल्म 20 अक्टूबर को निमाड़ क्रिएशन नामक यूट्यूब चैनल पर दर्शकों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।
रोजमर्रा के कामकाज और खेती के बीच निकाला शूटिंग का समय
इस परियोजना के सह-निर्देशक कमलेश पटेल के अनुसार, इस पूरे उपक्रम में गांव के लगभग 15 से 17 स्थानीय युवकों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। फिल्म में काम करने वाले इन कलाकारों और तकनीशियनों में से कई युवा निजी नौकरियों में कार्यरत हैं, जबकि कई अन्य अपने परिवारों के साथ पारंपरिक खेती-किसानी के काम में जुटे हुए हैं। इन युवाओं के लिए सिनेमा निर्माण कोई पूर्णकालिक आजीविका या पेशा नहीं है, बल्कि यह उनकी कलात्मक रुचि और रचनात्मक जुनून की अभिव्यक्ति है। कमलेश पटेल ने इस यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि इस टीम ने पहले 17 मिनट की अवधि वाली एक लघु फिल्म ‘गब्बर इस बैक’ बनाई थी। उस शुरुआती प्रयास को स्थानीय दर्शकों से मिले व्यापक स्नेह और सकारात्मक प्रतिक्रिया ने पूरी टीम के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा दिया। इसी बढ़े हुए हौसले के परिणामस्वरूप टीम ने इसका दूसरा भाग बनाने का साहसिक निर्णय लिया। इस बार उन्होंने लगभग एक घंटे की पूरी कॉमेडी फिल्म तैयार करने का संकल्प लिया। टीम के पास कोई वित्तीय निवेशक या बड़ा निर्माता नहीं था, न ही कोई तकनीकी विशेषज्ञ दल मौजूद था। ऐसे में सभी साथियों ने मिल-जुलकर जिम्मेदारियां बांटीं और उपलब्ध स्मार्टफोन तकनीक के सहारे इस लंबी फिल्म को मूर्त रूप दिया।
ग्रामीण परिवेश में सीमित संसाधनों के साथ इस तरह की लंबी फिल्म तैयार करना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। दिन के समय सभी सदस्य अपने तयशुदा दायित्वों में व्यस्त रहते थे, जहां कुछ साथी दफ्तरों या दुकानों पर काम करने जाते थे तो अन्य खेतों में पसीना बहाते थे। दिनभर की शारीरिक और मानसिक व्यस्तता के बाद शाम को अथवा छुट्टियों के दिन जब भी फुर्सत मिलती, सभी सदस्य एकत्र होकर दृश्यों को फिल्माने के लिए निकल पड़ते थे। काम का विभाजन भी पूरी तरह स्वाभाविक था; कुछ युवाओं ने मुख्य और सहायक भूमिकाओं में अभिनय का जिम्मा संभाला, किसी ने मोबाइल थामकर कैमरामैन का काम किया, तो किसी ने संपादन यानी एडिटिंग और अन्य तकनीकी पहलुओं को संभाला। इसी सामूहिक लगन और अनवरत अभ्यास के दम पर लगभग एक वर्ष के कड़े परिश्रम के बाद यह पूरी फिल्म बनकर तैयार हो सकी। दृश्यों के फिल्मांकन के लिए गांव की प्राकृतिक और वास्तविक जगहों का ही चयन किया गया, जिससे गांव की खुली सड़कें, हरे-भरे खेत, खुले मैदान और नजदीकी जंगली इलाके ही फिल्म के स्वाभाविक पृष्ठभूमि बन गए, जिससे किसी भी तरह के कृत्रिम सेट पर होने वाला खर्च पूरी तरह बच गया।
बचपन के रंगमंच से मिली पटकथा और निर्माण की प्रेरणा
फिल्म के दूसरे निर्देशक भावेश पटेल, जो स्वयं एक पत्रकार और जमीनी रंगकर्मी के रूप में सक्रिय हैं, इस रचनात्मक यात्रा की पृष्ठभूमि साझा करते हैं। भावेश पटेल बताते हैं कि ग्रामीण अंचल में पले-बढ़े होने के दौरान उन्हें बचपन से ही गांव के उत्सवों और मंचों पर होने वाले नाटकों में भाग लेने का भरपूर अवसर मिलता रहा। उसी जमीनी रंगमंच और अभिनय के अनुभव ने उनके मन में दृश्यों को कैमरे के जरिए पर्दे पर उतारने और स्वतंत्र फिल्म बनाने की सोच को जन्म दिया। भावेश पटेल का यह दृढ़ विश्वास है कि छोटे कस्बों, देहातों और सुदूर गांवों के बच्चों तथा युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। मूल समस्या केवल यह रहती है कि उन्हें अपनी प्रतिभा और क्षमता को अभिव्यक्त करने का उचित मंच या माध्यम आसानी से सुलभ नहीं हो पाता। इसी सोच को व्यवहार में लाने के लिए उन्होंने गांव के उत्साही साथियों को एक सूत्र में पिरोया और आधुनिक स्मार्टफोन तकनीक का सदुपयोग करते हुए शून्य बजट की इस फिल्म यात्रा का श्रीगणेश किया।
वर्तमान डिजिटल युग में मोबाइल फोन केवल सोशल मीडिया देखने या सामान्य बातचीत का साधन बनकर नहीं रह गया है, बल्कि यह सृजन का एक क्रांतिकारी उपकरण भी बन चुका है। मलगांव खेगांव के इन युवाओं ने इस बात को सिद्ध किया है कि साधारण स्मार्टफोन से भी एक व्यवस्थित कहानी को परदे पर जीवंत किया जा सकता है। इस फिल्म से जुड़े सभी कलाकार पूरी तरह स्थानीय हैं और किसी भी बड़े महानगर से अभिनय सीखकर नहीं आए हैं। वे अपनी सामान्य दिनचर्या, नौकरी और कृषि कार्यों से मिलने वाले सीमित समय का सदुपयोग करके इस रचनात्मक प्रयोग का हिस्सा बने हैं। निमाड़ क्रिएशन की पूरी टीम का यह स्पष्ट संदेश है कि यदि मन में कुछ नया करने की लगन हो, तो आर्थिक सीमाओं या भौतिक संसाधनों की कमी को कभी अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने देना चाहिए। यदि संकल्प मजबूत हो, तो सबसे छोटे स्तर और सीमित साधनों से भी एक बड़ी और प्रेरणादायक शुरुआत की जा सकती है। अब गांव के इन सभी युवाओं की निगाहें 20 अक्टूबर की तारीख पर टिकी हैं, जब यह फिल्म डिजिटल मंच पर प्रसारित होगी और दर्शक उनके इस अनूठे प्रयास का मूल्यांकन करेंगे।


















