पारंपरिक टेलीविजन के सामने इन दिनों अस्तित्व का बड़ा संकट खड़ा हो गया है, जिसकी सबसे बड़ी वजह उसका पुराना और सख्त फिक्स्ड शेड्यूल रहा है। दर्शकों को अपने पसंदीदा धारावाहिकों या कार्यक्रमों को देखने के लिए तय समय यानी रात 8 या 9 बजे का इंतजार करना पड़ता था। यदि कोई एक एपिसोड भी छूट जाता था, तो अगले दिन प्रसारित होने वाले रिपीट टेलीकास्ट पर ही पूरी निर्भरता रह जाती थी। इसके बिल्कुल विपरीत, ओटीटी प्लेटफॉर्म ने दर्शकों को समय और सुविधा की पूरी छूट दी है। आज के बिंज-वॉचिंग के इस दौर में लोग जब चाहें, कहीं भी और अपनी मर्जी के हिसाब से जितना चाहें उतना कंटेंट देख सकते हैं। बस में सफर के दौरान मोबाइल स्क्रीन पर शो देखना हो या वीकेंड की रात में एक ही बार में पूरी सीरीज खत्म करना हो, इस तरह की आधुनिक फ्लेक्सिबिलिटी की बराबरी कभी भी ट्रेडिशनल टीवी का फिक्स्ड शेड्यूल नहीं कर सकता है।
पारंपरिक सास-बहू ड्रामे बनाम नए दौर की ओरिजिनल कहानियां
टेलीविजन चैनलों के टीआरपी-बेस्ड रेटिंग सिस्टम ने उनके पूरे कंटेंट को एक ही ढर्रे और एक जैसे पैटर्न में बांधकर रख दिया है। पिछले कई सालों से लगातार चले आ रहे सास-बहू के ड्रामे, बिना सिरपैर के आने वाले ट्विस्ट और जरूरत से ज्यादा ओवर-ड्रामाटाइजेशन ने आज के युवा और समझदार दर्शकों को टेलीविजन स्क्रीन से पूरी तरह दूर कर दिया है। इसके मुकाबले ओटीटी ने भारतीय दर्शकों के सामने ‘मिर्जापुर’, ‘पंचायत’, ‘पाताल लोक’ और ‘स्कैम 1992’ जैसी बेहद रियलिस्टिक, थ्रिलिंग और एकदम अलग जॉनर की कहानियों को परोसा है। दर्शक अब वही दो दशक पुराना और घिसा-पिटा सास-बहू का फॉर्मूला देखने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं और अपने टीवी सेट पर वापस नहीं लौटना चाहते हैं।
लंबे कमर्शियल ब्रेक और विज्ञापनों से बढ़ती खीझ
पारंपरिक टीवी पर प्रसारित होने वाले 30 मिनट के किसी भी सीरियल में से लगभग 12 से 15 मिनट का समय सिर्फ कमर्शियल विज्ञापनों में ही निकल जाता है। बार-बार आने वाले ब्रेक और ये लंबे विज्ञापन देखने के पूरे अनुभव को बेहद खराब कर देते हैं। दूसरी तरफ, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर मिलने वाले बिना रुकावट यानी ऐड-फ्री सब्सक्रिप्शन के विकल्पों ने दर्शकों को टीवी के विज्ञापनों से बुरी तरह चिढ़ा दिया है। यही मुख्य कारण है कि कॉर्ड-कटिंग का यह नया ट्रेंड अब भारत के छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में भी बेहद तेजी के साथ फैल रहा है। लोग अपने महंगे डीटीएच कनेक्शन को समय-समय पर रिचार्ज कराने के बजाय अपने स्मार्ट टीवी पर एक अच्छा इंटरनेट कनेक्शन और दो से तीन ओटीटी ऐप्स के सब्सक्रिप्शन लेना कहीं ज्यादा सस्ता और किफायती मान रहे हैं।
लाइव स्पोर्ट्स और अवॉर्ड शो का डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख
लंबे समय तक खेलकूद यानी स्पोर्ट्स और बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाले लाइव अवॉर्ड शो पारंपरिक टीवी चैनलों के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा कवच साबित होते रहे हैं। यही एक बड़ी वजह थी जिसके कारण लोग अपने घरों में केबल और डीटीएच कनेक्शन को संभालकर रखते थे। लेकिन जिओ सिनेमा और जिओ हॉटस्टार जैसी दिग्गज कंपनियों ने लाइव स्पोर्ट्स के डिजिटल स्ट्रीमिंग राइट्स खरीदकर इस आखिरी गढ़ को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। जब आज के समय में मोबाइल फोन और स्मार्ट टीवी पर लाइव 4K मैच की स्ट्रीमिंग बिल्कुल मुफ्त या फिर बेहद कम कीमत पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है, तो आम दर्शक भला सिर्फ स्पोर्ट्स के लिए अपना टीवी कनेक्शन क्यों रिचार्ज करवाएगा?
टेलीविजन इंडस्ट्री के सामने अस्तित्व की बड़ी चुनौती
यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि ओटीटी का विस्तार सिर्फ फिल्मों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा अस्तित्व का संकट बन चुका है। हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पारंपरिक टेलीविजन रातोंरात एकदम गायब हो जाएगा। ग्रामीण भारत के जिन इलाकों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी पूरी तरह से डेवलप नहीं हो पाया है, वहां टीवी शायद कुछ समय तक और अपनी जगह बनाए रखेगा। लेकिन अगर टेलीविजन इंडस्ट्री को लंबे समय तक बाजार में टिके रहना है, तो उसे अपने कंटेंट की क्वालिटी को काफी सुधारना होगा, विज्ञापनों के भारी बोझ को कम करना होगा और पूरी तरह से डिजिटल फॉर्मेट को अपनाना होगा। अन्यथा, जिस तरह से रेडियो आज कुछ खास और सीमित दर्शकों तक ही सिमटकर रह गया है, आने वाले दशक में ट्रेडिशनल टीवी का हस्र भी कुछ वैसा ही देखने को मिल सकता है।



















