हंगरी में दशकों तक बंद बक्सों में दफन रहे कम्युनिस्ट दौर के गुप्त पुलिस दस्तावेज आखिरकार आम जनता के अध्ययन और अवलोकन के लिए खोल दिए गए हैं। राजधानी बुडापेस्ट स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में इस ऐतिहासिक घोषणा को औपचारिक रूप दिया गया, जिसे देश के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि 45 वर्षों के निरंकुश शासन के गहरे मानसिक जख्मों को भरने और ऐतिहासिक पारदर्शिता लाने के लिए यह कदम अनिवार्य था। हालांकि, देश के भीतर इस फैसले को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है, जहां कई आलोचकों का मानना है कि यह निर्णय बहुत देर से लिया गया है और इससे समाज में नए विवाद व पारिवारिक कलह पैदा हो सकते हैं।
सोवियत दमन की ऐतिहासिक तारीख पर खुला अभिलेखागार
दस्तावेजों को सार्वजनिक करने के लिए चुना गया दिन हंगरी के इतिहास में गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखता है। ठीक 4 नवंबर 1956 को सोवियत संघ के सैन्य टैंकों ने बुडापेस्ट सहित हंगरी के विभिन्न शहरों की सड़कों पर चढ़ाई की थी, ताकि तत्कालीन कम्युनिस्ट विरोधी जनक्रांति को पूरी क्रूरता से कुचला जा सके। दशकों बाद उसी तारीख को गुप्तचर तंत्र की फाइलों को आम जनता के सामने रखकर शासन ने उस दमनकारी दौर के सच को उजागर करने का संदेश दिया है।
बुडापेस्ट के स्टेट आर्काइव्स में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री पीटर मग्यार ने इस संवेदनशील प्रक्रिया को गरिमा और संवेदनशीलता के साथ संभालने की अपील की। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे सभी नागरिकों से अनुरोध करते हैं कि लंबे समय से लंबित इस दस्तावेज प्रकाशन को मानवीय दृष्टिकोण और शालीनता से देखें। उन्होंने रेखांकित किया कि आने वाले दिनों में अनगिनत परिवारों को बेहद असहज और चौंकाने वाली जानकारियों से रूबरू होना पड़ेगा, जिनमें से कई तथ्य उनके दिवंगत हो चुके रिश्तेदारों से जुड़े होंगे। पीटर मग्यार के अनुसार, किसी भी ऐतिहासिक आघात से उबरने का एकमात्र मार्ग खुलकर चर्चा करना और कठिन सवाल पूछना ही है।
चुनावी वादे और दशकों की राजनीतिक हिचकिचाहट
गुप्त पुलिस की फाइलों को पूरी तरह खोलना प्रधानमंत्री पीटर मग्यार के चुनाव प्रचार अभियान का एक प्रमुख चुनावी वादा था। इस वर्ष अप्रैल में हुए चुनावों में भारी बहुमत से मिली जीत के बाद उनकी सरकार ने इस एजेंडे को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया। मग्यार ने इस कदम का पुरजोर बचाव करते हुए कहा कि यह वास्तव में 1989 में हंगरी में कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता उखाड़ फेंकने वाले लोकतंत्र समर्थकों द्वारा जनता से किए गए ऐतिहासिक वादे की पूर्ति है।
1989 में साम्यवाद के पतन के बाद से पिछले 36 वर्षों के दौरान हंगरी में कंजर्वेटिव, सोशलिस्ट-लिबरल और फिदेस पार्टी के नेतृत्व वाली कई सरकारें सत्ता में आईं। इन सभी हुकूमतों ने समय-समय पर इन संवेदनशील फाइलों को सार्वजनिक करने पर विचार तो किया, लेकिन राजनीतिक नफा-नुकसान और गोपनीय सूचनाओं के डर से अंततः इस पर रोक लगाए रखी। वर्ष 1998 से कानून में यह प्रावधान अवश्य किया गया था कि कोई भी व्यक्ति अपने नाम से संबंधित फाइल देखने के लिए आवेदन कर सकता था और इतिहासकारों को सीमित शोध की अनुमति थी। इसके बावजूद व्यवस्था में व्यापक अपारदर्शिता बनी रही, क्योंकि ज्यादातर मुख्य नामों पर काली स्याही फेर दी जाती थी और उत्तर-साम्यवादी गुप्तचर एजेंसियां अपने रणनीतिक हितों के लिए फाइलों के बड़े हिस्से को रोक कर रखती थीं। नतीजतन, राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने और बदनाम करने के उद्देश्य से समय-समय पर इन दस्तावेजों से चुनिंदा जानकारियां लीक की जाती रहीं। इसके अलावा, 1988 और 1989 में जब कम्युनिस्ट शासन अपनी पकड़ खो रहा था, तब तत्कालीन सुरक्षा अधिकारियों ने हजारों अहम पन्नों को नष्ट भी कर दिया था।
फॉर्म 6 कार्ड और बी-डोजियर की बारीकियां
मौजूदा चरण में जारी किए गए दस्तावेजों में प्राथमिक रूप से तथाकथित फॉर्म 6 कार्ड शामिल हैं। यह कार्ड किसी भी पंजीकृत मुखबिर का संपूर्ण व्यक्तिगत और प्रशासनिक लेखा-जोखा पेश करता है। एक सामान्य प्रविष्टि में सूचना देने वाले एजेंट का असली नाम, उसका गुप्त कोडनेम, जन्मतिथि, गृह पता और उसकी मां का नाम दर्ज होता है। इसके साथ ही कार्ड में यह भी स्पष्ट किया गया होता है कि संबंधित व्यक्ति को किस मकसद या दबाव के तहत भर्ती किया गया था, यानी क्या वह स्वेच्छा से आया था अथवा उसे ब्लैकमेल या प्रताड़ित कर भर्ती किया गया था। कार्ड पर उस गुप्तचर अधिकारी का नाम भी दर्ज होता है जो उसे नियंत्रित करता था।
इसके समानांतर, दस्तावेजों का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा, जिसे बी-डोजियर के रूप में जाना जाता है, वर्तमान में डिजिटलीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है। इस दूसरे बैच को अगले वर्ष 25 फरवरी को जनता और शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। बी-डोजियर में भर्ती प्रक्रिया की पूरी पृष्ठभूमि दर्ज है, जिसमें यह विस्तृत विवरण शामिल है कि किसी मुखबिर ने राज्य तंत्र को जो सूचनाएं दी थीं, वे सुरक्षा एजेंसियों की दृष्टि में कितनी महत्वपूर्ण या महत्वहीन थीं।
जासूसी तंत्र, ब्लैकमेल और इतिहास पर तकरार
ऐतिहासिक आकलनों के अनुसार, दिसंबर 1944 से लेकर फरवरी 1990 के बीच हंगरी में लगभग 150000 से 160000 लोगों को मुखबिर के रूप में भर्ती किया गया था। साम्यवादी राज्य तंत्र के तहत काम करने वाले इन एजेंटों में से एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जिन्हें गंभीर धमकियों के जरिए ब्लैकमेल किया गया था। सुरक्षा एजेंसियां लोगों को उनके रोजगार या पढ़ाई के अवसर छीनने, जरूरी दवाओं की आपूर्ति रोकने, या उनके निजी यौन जीवन और किसी लत से जुड़े संवेदनशील रहस्यों को समाज में उजागर करने का खौफ दिखाकर जासूसी के लिए मजबूर करती थीं। गोपनीयता और मानवीय गरिमा के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान खुलासे में भी नागरिकों की ऐसी अति-निजी जानकारियों को सावधानीपूर्वक हटा दिया जाएगा।
इस पूरे मामले पर इतिहासकारों और राजनीतिक हलकों में राय गहराई से बंटी हुई है। फाइलों को सार्वजनिक करने के लिए दशकों से अभियान चला रहे इतिहासकार क्रिस्टियन उंगवारी का कहना है कि राज्य द्वारा नागरिक के खिलाफ जुटाए गए और दर्ज किए गए हर विवरण को जानने का अधिकार आम जनता का मौलिक नागरिक अधिकार है, और यह सूचना सत्ता में बैठे लोगों की मर्जी पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
दूसरी ओर, दक्षिणपंथी अवर होमलैंड पार्टी की यूरोपीय संसद सदस्य और इतिहासकार जुजाना बोरवेंदेग ने इस पहल का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने हंगेरियन मीडिया से बात करते हुए कहा कि बचे हुए एजेंट रिकॉर्ड में से भारी बहुमत ऐसे मामलों का है जहां वास्तविक एजेंट की सही पहचान करना भी संभव नहीं है, उनके इरादों या परिस्थितियों को समझना तो दूर की बात है। बोरवेंदेग का तर्क है कि मुखबिरों की भर्ती की जमीनी परिस्थितियों और उनकी गतिविधियों के पूर्ण संदर्भ को स्पष्ट किए बिना केवल उनके नामों को सार्वजनिक करने से जनता में गंभीर भ्रम फैलेगा। आलोचकों का मुख्य डर यही है कि व्यापक जनता फाइलों में दर्ज नामों को देखकर तुरंत एकतरफा राय बना लेगी और उस दौर के मानवीय दबावों व जटिल परिस्थितियों को समझने से इनकार कर देगी।



















