हंगरी को रविवार आधी रात से नया राष्ट्रपति चुनने की राह मिल गई है, क्योंकि तमाश सुयोक ने खुद उस संवैधानिक संशोधन पर दस्तखत कर दिए हैं जो उनकी कुर्सी छीन लेगा। यह घटनाक्रम प्रधानमंत्री पीटर मैग्यार की तिसा पार्टी द्वारा संसद में यह कानून पारित कराए जाने के महज़ कुछ दिन बाद सामने आया है, और सुयोक को हटाने के महीनों लंबे अभियान का यह सबसे नाटकीय मोड़ है।
तिसा पार्टी आखिर सुयोक को क्यों हटाना चाहती थी
तमाश सुयोक को लंबे समय से पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान का करीबी माना जाता रहा है। ओरबान की पार्टी अप्रैल में सोलह साल तक हंगरी पर शासन करने के बाद सत्ता से बाहर हो गई थी। तिसा पार्टी की उसी चुनाव में जीत के बाद से पीटर मैग्यार और उनके सहयोगी लगातार सुयोक से इस्तीफा देने को कहते रहे। उनकी दलील थी कि पुरानी सरकार के दौर में नियुक्त राष्ट्रपति को नई सरकार के मुखिया के तौर पर बने रहने का कोई हक नहीं है। तिसा पार्टी सुयोक की राष्ट्रपति पद पर मौजूदगी को पुरानी, जनता द्वारा नकार दी गई सरकार की बची-खुची निशानी मानती रही, और उन्हें एक निष्पक्ष राष्ट्रप्रमुख के बजाय पुरानी व्यवस्था की कठपुतली बताती रही। जब सुयोक ने खुद इस्तीफा देने से इनकार किया, तो पार्टी के 141 सांसदों ने संसद में अपनी संख्या के दम पर एक संवैधानिक संशोधन पारित करा दिया, जो खासतौर पर उन्हें पद से हटाने के लिए बनाया गया था।
पांच दिन की मोहलत
संशोधन संसद से पास होते ही सुयोक के पास सिर्फ पांच दिन थे, या तो वे खुद उस पर दस्तखत करें, या फिर एक लंबे संवैधानिक संकट और महाभियोग की कार्यवाही का सामना करें। सुयोक ने लगभग पूरी मियाद इंतजार में गुजार दी और आखिरकार शनिवार शाम, ठीक समयसीमा खत्म होने से पहले, यह साफ किया कि वे संशोधन को मान लेंगे। उनके दस्तखत के साथ ही उनकी राष्ट्रपति पद की अवधि रविवार आधी रात को औपचारिक रूप से खत्म हो जाएगी।
अगर सुयोक दस्तखत करने से मना कर देते, तो हंगरी एक असामान्य स्थिति में फंस सकता था, जहां एक बैठा हुआ राष्ट्रपति संसद के बहुमत के फैसले का विरोध कर रहा हो और साथ ही महाभियोग की कार्यवाही सार्वजनिक रूप से चल रही हो, वह भी तब जब नई सरकार खुद अपनी सत्ता मजबूत करने में जुटी हो। ऐसी स्थिति में सुयोक हफ्तों या महीनों तक पद पर बने रह सकते थे, और इससे फिदेस तथा ओरबान को सरकार पर मनमानी का आरोप लगाने का एक और मौका मिल जाता। दस्तखत करके सुयोक ने इस टकराव से बचने का रास्ता चुना, भले ही उन्होंने अपने आखिरी बयान में इस पूरी प्रक्रिया की खुलकर आलोचना की।
जाते-जाते सुयोक का पलटवार
पद छोड़ने पर राजी होने के बावजूद, सुयोक ने अपने बयान में उसी सरकार पर निशाना साधा जिसने उन्हें हटाया। उन्होंने मैग्यार सरकार पर कानून के राज का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह संशोधन "हंगरी के संवैधानिक लोकतंत्र में एक निर्णायक मोड़" है, और कहा कि "एक स्वतंत्र समाज के बुनियादी मूल्यों... को सत्ता की खातिर कुचल दिया गया है।" यह उस शख्स की तीखी विदाई थी, जो इस वोट से पहले तक देश के सबसे बड़े संवैधानिक पदों में से एक पर काबिज था।
तिसा सरकार का अब तक का सबसे बड़ा कदम
अप्रैल की भारी जीत के बाद से तिसा पार्टी लगातार बड़े संवैधानिक बदलाव करती आई है, लेकिन एक मौजूदा राष्ट्रपति को हटाना उसका अब तक का सबसे साहसिक कदम माना जा रहा है। सोमवार को जब संसद में संशोधन पास होने के नतीजे की घोषणा हुई, तो तिसा पार्टी के 141 सांसद खड़े होकर तालियां बजाने लगे, जो यह दिखाता है कि पार्टी सुयोक को हटाने को कितना अहम मानती है।
ओरबान की धीमी प्रतिक्रिया
विक्टर ओरबान ने इस संशोधन को तानाशाही जैसा कदम बताया और समर्थकों से सड़कों पर उतरकर विरोध करने की अपील की। लेकिन उनकी यह प्रतिक्रिया एक ऐसी पार्टी की पृष्ठभूमि में आई है जो साफतौर पर कमजोर पड़ चुकी है, अप्रैल की हार के बाद से ओरबान की पार्टी लगातार सिमटती जा रही है, और ओरबान खुद सार्वजनिक तौर पर मुश्किल से ही दिखते हैं। उन्होंने संसद में अपनी सीट तक संभालने से इनकार कर दिया है, जो एक दशक से ज्यादा समय तक हंगरी की राजनीति पर हावी रहे नेता के लिए एक चौंकाने वाली बात है।
फिदेस के सोलह साल के शासन का असर
ओरबान की फिदेस पार्टी ने 2010 से लेकर इस साल तक हंगरी पर शासन किया, और इतने लंबे दौर ने उसे संसद में दो-तिहाई बहुमत तक दिला दिया। इस बड़े बहुमत के दम पर फिदेस ने हंगरी के राज्यतंत्र को अपने हिसाब से ढाल दिया, जिसमें उन पदों पर भी पार्टी के वफादारों को बिठाया गया जो सैद्धांतिक रूप से राजनीति से दूर, स्वतंत्र माने जाते थे। सुयोक की राष्ट्रपति पद पर मौजूदगी को भी व्यापक रूप से इसी व्यवस्था की उपज माना जाता रहा है, यही वजह है कि तिसा पार्टी ने उन्हें हटाने को महज़ रस्मी राजनीति नहीं, बल्कि एक अधूरा काम पूरा करने जैसा माना।
एक पूर्व न्यायाधीश की राय
वोट के बाद, हंगरी की सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रमुख आंद्राश बाका ने कहा: "राष्ट्रपति को हटाए जाने से मैं पूरी तरह सहमत हूं।" बाका के मुताबिक हंगरी में 1989 से 2010 तक वाकई कानून का राज रहा, और उसके बाद ही फिदेस ने धीरे-धीरे राज्य की संस्थाओं पर कब्जा जमाना शुरू किया और उनके शब्दों में एक "सत्तावादी राज्य" खड़ा कर दिया। उन्होंने आगे यह भी चेताया कि एक मजबूती से जमी सत्तावादी व्यवस्था को अब तोड़ पाना बेहद मुश्किल है, क्योंकि इसे चुनावी हार के बाद भी टिके रहने के लिए ही डिज़ाइन किया गया था।
सुयोक की विदाई तय हो जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि तिसा पार्टी उनकी जगह किसे लाएगी, और क्या ओरबान की सड़कों पर उतरने की अपील को उस पार्टी के समर्थकों के बीच वाकई कोई असर मिलता है, जो अभी भी सत्ता से बाहर होने की हकीकत के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।




















