आइसलैंड ने यूरोपीय यूनियन में शामिल होने के लिए बातचीत फिर से शुरू करने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। यह जनमत संग्रह ठीक 13 साल बाद आयोजित किया गया जब दोनों पक्षों के बीच इस तरह की चर्चाओं पर विराम लग गया था।
सार्वजनिक प्रसारक आरयूवी की रिपोर्ट के अनुसार, इस जनमत संग्रह में कुल 225,031 मतदाताओं में से 52.8 प्रतिशत लोगों ने सरकार के इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जबकि 47.2 प्रतिशत मतदाताओं ने इसके पक्ष में अपनी सहमति दी। इस प्रकार दोनों पक्षों के बीच हार-जीत का अंतर लगभग 12,600 वोटों का रहा।
मछली पकड़ने के अधिकार बने सबसे बड़ा मुद्दा
प्रधानमंत्री क्रिस्ट्रून फ्रोस्टाडॉत्थिर की सेंटर-लेफ्ट सरकार ने साल 2027 तक इस जनमत संग्रह को कराने का वादा किया था, लेकिन वैश्विक तनाव और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर की गई टिप्पणियों के चलते इस प्रक्रिया को समय से पहले ही आगे बढ़ा दिया गया। हालांकि, लगभग 400,000 की आबादी वाले इस द्वीपीय राष्ट्र में बहस का मुख्य केंद्र सुरक्षा के मुद्दे न होकर इनका पारंपरिक मछली उद्योग रहा।
लगभग 270,000 लोग मतदान के लिए पात्र थे और आरयूवी के मुताबिक, इस बार मतदान का प्रतिशत 82.5 दर्ज किया गया, जो साल 2009 के बाद से आइसलैंड में किसी भी चुनाव में सबसे अधिक है।
पुराने ऐतिहासिक और आर्थिक कारण
आइसलैंड पहले से ही यूरोपीय यूनियन के सिंगल मार्केट और शेंगेन बॉर्डर-फ्री जोन का हिस्सा है, लेकिन पूर्ण सदस्यता इसे कस्टम यूनियन और अंततः यूरो मुद्रा के दायरे में ले आती। आइसलैंड ने साल 2008 के वित्तीय संकट और वहां की बैंकिंग व्यवस्था के ढहने के बाद 2009 में यूरोपीय यूनियन की सदस्यता के लिए आवेदन किया था।
जब साल 2013 में एक यूरोस्केप्टिक सरकार सत्ता में आई, तब तक यह आवेदन काफी आगे बढ़ चुका था लेकिन उसने बातचीत को रोक दिया। उस समय मछली पकड़ने के अधिकार सबसे बड़ी बाधा बने थे और आज भी स्थिति वैसी ही बनी हुई है। मछली और समुद्री उद्योग आइसलैंड के कुल निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है और कई 'नहीं' वोट देने वालों को डर था कि यूरोपीय यूनियन की कॉमन फिशरिज पॉलिसी के तहत वे अपने मुनाफे वाले मछली पकड़ने के क्षेत्रों पर से नियंत्रण खो बैठेंगे।
प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया और जनमत संग्रह का दायरा
राजधानी में शनिवार को अपना वोट डालने के बाद प्रधानमंत्री क्रिस्ट्रून ने कहा कि इस अभियान ने दुनिया में आइसलैंड की स्थिति को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि यह एक शानदार दिन है और वे लोग इस वोटिंग का इंतजार वर्षों से कर रहे थे, साथ ही उन्होंने जोड़ा कि उनकी सरकार परिणाम चाहे जो भी हो, अपना काम जारी रखेगी।
मतपत्र पर सवाल यह था कि क्या आइसलैंड को यूरोपीय यूनियन के साथ परिग्रहण वार्ता फिर से शुरू करनी चाहिए। एक 'हाँ' का वोट यूरोपीय यूनियन में शामिल होने का अंतिम निर्णय नहीं होता, बल्कि यह एक परिग्रहण समझौते की दिशा में कदम होता, जिसे बाद में दूसरे जनमत संग्रह में अनुमोदित किया जाना आवश्यक था। इसी प्रकार, 'नहीं' के फैसले ने भविष्य में कभी भी बातचीत दोबारा शुरू करने के विकल्प को पूरी तरह से बंद नहीं किया है।
सुरक्षा चिंताएं और भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि
यद्यपि आर्थिक मुद्दों ने इस अभियान में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा, फिर भी सुरक्षा से जुड़े पहलू भी पीछे नहीं रहे। आइसलैंड नाटो का संस्थापक सदस्य है, लेकिन इसके पास अपनी कोई सेना नहीं है और रक्षा मामलों के लिए यह पूरी तरह सहयोगियों पर निर्भर करता है।
देश ने रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के दौरान यूक्रेन का समर्थन किया है और अधिकारियों ने द्वीप के करीब रूसी नौसैनिक गतिविधियों में आई तेजी पर अपनी चिंता जताई है। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अपने अधिकार में लेने की इच्छा जताए जाने से भी चिंताएं और बढ़ गई हैं।



















