फ्रांस में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और बजट की भारी कमी के खिलाफ विद्यार्थियों का आक्रोश अब व्यापक जनांदोलन का रूप ले चुका है। राजधानी पेरिस से लेकर कई बड़े औद्योगिक व तटीय शहरों तक छात्र अपने शिक्षण संस्थानों के मुख्य दरवाजों पर ताले लगाकर धरने पर बैठ गए हैं। देश के सबसे बड़े श्रमिक संघों और शिक्षक संगठनों के इस आंदोलन से जुड़ने के बाद यह प्रदर्शन महज छात्र असंतोष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक टकराव की शक्ल ले ली है। पिछले कई दिनों से चल रहे इस तनावपूर्ण गतिरोध के दौरान सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव भी देखने को मिले हैं, जिससे फ्रांस का सामाजिक और राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है।
सैकड़ों स्कूलों की तालाबंदी और भारी संख्या में गिरफ्तारियां
शिक्षा मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों के चलते 500 से अधिक स्कूल या तो पूरी तरह ठप हो गए अथवा वहां की नियमित कक्षाओं में आंशिक बाधा पहुंची। देश भर के विभिन्न हिस्सों में छात्रों ने शिक्षण भवनों को अवरुद्ध करने के लिए सड़कों की निर्माण सामग्री और कचरे के डिब्बों में आग लगाकर अवरोधक खड़े कर दिए। ओबरविलियर्स में ल्यसी बार्थेलो के समीप नकाबपोश युवाओं को मार्च निकालते और नारे लगाते देखा गया। तनाव इतना बढ़ चुका है कि बीते सप्ताह के दौरान सड़कों पर हुए हिंसक संघर्षों में 215 युवा प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं, जबकि कानून व्यवस्था बनाए रखने में जुटे 715 पुलिसकर्मी भी चोटिल हुए हैं। पुलिस प्रशासन ने अब तक 6,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है, जो इस आंदोलन के विस्तार और उग्रता को दर्शाता है।
हिंसा की घटनाएं और गंभीर रूप से घायल छात्र
इस आंदोलन के दौरान उत्तरी शहर लांस में एक बेहद दुखद घटना सामने आई, जहां एक छात्र गंभीर रूप से जख्मी हो गया। इस घटना को लेकर परस्पर विरोधी विवरण मिले हैं, जिनमें कहा गया कि या तो उस युवक ने दंगा नियंत्रण पुलिस द्वारा दागे गए स्टन ग्रेनेड को उठा लिया था या फिर वह ग्रेनेड उसके बेहद करीब फटा था। इसके अलावा सेंट-ओवेन-लोमोन में 14 वर्षीय छात्र ईडन के साथ घटी घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। ईडन के सिर पर आंसू गैस का ग्रेनेड लगने से उसके जबड़े में दोहरा फ्रैक्चर हो गया और उसे अत्यंत जटिल व बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ा। ईडन की मां ने एक भावुक संवाददाता सम्मेलन में रोते हुए कहा कि उनका दिल पूरी तरह टूट चुका है। उन्होंने कहा कि यह बेहद शर्मनाक, भयानक और हिंसक है, तथा यह किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए था क्योंकि सुरक्षाबल उन मासूम बच्चों से निपट रहे हैं जो केवल पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल मांग रहे हैं।
सरकार का रुख और वार्ता की अपील
बढ़ते जनआक्रोश के बीच राष्ट्रीय शिक्षा मंत्री एडुआर्ड जेफ्रे ने स्पष्ट किया कि छात्रों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने घायल युवाओं के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए इस पूरी स्थिति को एक त्रासदी करार दिया। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि आंदोलन की आड़ में चरम हिंसा की प्रवृत्ति घर कर चुकी है। शिक्षा मंत्री के अनुसार, उन्होंने पहले दिन से बातचीत का रास्ता खुला रखा था न कि संस्थानों की तालाबंदी का। उनका कहना था कि शुरुआत से ही बेहद हिंसक तत्वों ने छात्र संगठनों में घुसपैठ कर ली है, जिनका आचरण पूरी तरह अस्वीकार्य है। इसके जवाब में छात्र संगठन लेस लिसिएंस के उपाध्यक्ष लुई लेतूब्लों ने कहा कि शिक्षा मंत्री ने यदि छात्रों की बात सुनी है, तो अब केवल सुनने से काम नहीं चलेगा बल्कि उन्हें तुरंत धरातल पर ठोस कार्रवाई करनी होगी।
श्रमिक संगठनों का समर्थन और आंदोलन का विस्तार
इस छात्र आंदोलन को फ्रांस के सबसे बड़े श्रमिक संघ 'फ्रेंच डेमोक्रेटिक कॉन्फेडरेशन ऑफ लेबर' (CFDT) का खुला समर्थन मिल चुका है। प्रमुख यूनियनों के इस संयुक्त मोर्चे ने पेरिस, ल्योन, मार्सिले सहित करीब 30 प्रमुख शहरों में छात्रों के समर्थन में सड़कों पर उतरने का आह्वान किया है। इसके साथ ही शिक्षकों के सबसे बड़े संगठन एसएनईएस-एफएसयू ने भी अपने सभी सदस्यों से मंगलवार के राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन में सक्रिय भागीदारी की अपील की है। युवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और पुलिस के साथ संभावित झड़पों को रोकने के लिए कई अभिभावक और यूनियन कार्यकर्ता बांह पर सफेद पट्टी बांधकर प्रदर्शनकारियों के चारों तरफ एक सुरक्षा घेरा बनाते नजर आए, ताकि युवाओं और सुरक्षाकर्मियों के बीच सीधा टकराव टाला जा सके।
सितंबर से जल रही असंतोष की आग
शैक्षणिक बदहाली को लेकर यह आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसकी नींव सितंबर महीने में पेरिस में पड़ी थी। हाई स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा शुरू की गई इस मुहिम में धीरे-धीरे विश्वविद्यालयों के छात्र भी शामिल होते चले गए। छात्रों की मुख्य मांग कक्षाओं में छात्रों की अत्यधिक संख्या, जर्जर और असुरक्षित स्कूल भवन तथा शिक्षकों की गंभीर कमी को तुरंत दूर करने की है। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकॉर्नू ने रविवार को माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों और शैक्षणिक कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान के लिए कई कदमों की घोषणा की थी और व्यवस्था में दिखने वाले बदलावों का वादा किया था। हालांकि मुख्य आंदोलनकारी छात्र संगठन 'यूनियन सिंडिकेल लिसिएन' (USL) ने इस घोषणा को पूरी तरह नाकाफी करार देते हुए कहा कि सरकार ने उनकी प्रमुख मांगों पर कोई ठोस प्रस्ताव नहीं रखा है। प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंसा के आगे सरकार कोई रियायत नहीं बरतेगी और घायल सुरक्षाकर्मियों व प्रताड़ित शिक्षकों के साथ मजबूती से खड़ी रहेगी।
गहराता राजनीतिक ध्रुवीकरण
फ्रांस में अगले राष्ट्रपति चुनाव में अभी कई महीनों का समय बाकी है, लेकिन इस छात्र आंदोलन ने देश के राजनीतिक गलियारों में भारी उथल-पुथल मचा दी है। वामपंथी और दक्षिणपंथी खेमों के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सरकार और दक्षिणपंथी नेताओं ने इस उपद्रव को भड़काने के लिए धुर वामपंथी दल 'ला फ्रांस इंसौमीज' (LFI) को कसूरवार ठहराया है। प्रधानमंत्री लेकॉर्नू ने एलएफआई द्वारा आंदोलन को भड़काने के प्रयासों को गैर-जिम्मेदाराना बताया। वहीं दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने कहा कि यह अब कोई सामान्य छात्र आंदोलन नहीं रह गया है, बल्कि पेशेवर उपद्रवियों द्वारा संगठित दंगा है जिसका संचालन एलएफआई के सांसद कर रहे हैं। उन्होंने दंगों से निपटने के लिए एक सख्त नया कानून बनाने की मांग की। दूसरी ओर, एलएफआई नेता ज्यां-ल्यूक मेलेंशों ने इसे 1968 के ऐतिहासिक श्रमिक व छात्र आंदोलन के बाद का सबसे शक्तिशाली युवा उभार बताते हुए पुलिस पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाया और नागरिकों से युवाओं के बचाव में सड़कों पर उतरने का आह्वान किया। मार्सिले के वामपंथी मेयर बेनोइत पायन ने अपने शहर में भड़की हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि हालांकि सार्वजनिक सेवाओं और भविष्य को लेकर युवाओं की चिंताएं पूरी तरह जायज हैं, लेकिन उन्हें अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखनी चाहिए।



















