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कृषि विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति संशोधन कानून असंवैधानिक घोषित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुक्खू सरकार के नियम रद्द किएहिमाचल प्रदेश
28 अग॰ 2026, 11:49 am (2 घंटे पहले)· 2

कृषि विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति संशोधन कानून असंवैधानिक घोषित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुक्खू सरकार के नियम रद्द किए

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कृषि और बागवानी विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति पर सुक्खू सरकार द्वारा बनाए गए संशोधित नियमों को रद्द करते हुए यूजीसी दिशा-निर्देशों के तहत नई चयन प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।

हिमाचल प्रदेश में कृषि तथा उद्यानिकी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर राज्य सरकार को बड़ा झटका लगा है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कुलपति चयन में निर्णायक शक्ति प्रदान करने वाले संशोधित कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों को असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा किया गया बदलाव विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के वर्ष 2018 के नियमों के सीधे विपरीत था।

यूजीसी नियमों के उल्लंघन पर अदालत का कड़ा रुख

उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की पीठ ने नरेंद्र कुमार सांख्यन तथा संजीव कुमार चौहान की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार द्वारा कुलपति चयन की प्रक्रिया में किए गए बदलावों को अदालत में चुनौती दी थी। खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश कृषि, उद्यानिकी एवं वानिकी (संशोधन) अधिनियम 2023, इसमें वर्ष 2025 में किए गए संशोधन तथा वर्ष 2026 के नियमों को असंवैधानिक और शुरुआत से ही शून्य घोषित कर दिया।

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दो प्रमुख राज्य विश्वविद्यालयों में नई चयन प्रक्रिया का आदेश

इस न्यायिक आदेश का प्रभाव राज्य के दो प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों पर पड़ेगा। पालमपुर स्थित चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय तथा सोलन स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय में अब कुलपति पदों पर नए सिरे से नियुक्ति होगी। उच्च न्यायालय ने दोनों विश्वविद्यालयों में यूजीसी विनियम 2018 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करते हुए तुरंत नई चयन प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।

फरवरी 2026 का विज्ञापन और पृष्ठभूमि

दोनों कृषि एवं उद्यानिकी विश्वविद्यालयों में काफी लंबे समय से स्थायी कुलपतियों के पद खाली पड़े थे। इस स्थिति से निपटने और चयन प्रक्रिया में अंतिम अधिकार प्राप्त करने के लिए सुक्खू सरकार ने संबंधित कानून में संशोधन किया था। इसके पश्चात फरवरी 2026 में सरकार ने इन पदों के लिए विज्ञापन भी जारी किया था। हालांकि, संशोधित प्रावधानों में चयन का मुख्य नियंत्रण सरकार के पास रखे जाने के कारण यह मामला न्यायशास्त्र के सिद्धांतों और केंद्रीय अकादमिक मानकों के उल्लंघन के आधार पर अदालत की चौखट तक पहुंचा।

सवाल-जवाब

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुक्खू सरकार के किस फैसले को रद्द किया है?
अदालत ने कृषि और उद्यानिकी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति में सरकार को निर्णायक भूमिका देने वाले संशोधित अधिनियम और नियमों को रद्द कर दिया है।
यह मामला किन दो विश्वविद्यालयों से जुड़ा हुआ है?
यह फैसला पालमपुर स्थित चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय और सोलन स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने किस कानून और नियमों को असंवैधानिक घोषित किया है?
अदालत ने हिमाचल प्रदेश कृषि, उद्यानिकी एवं वानिकी (संशोधन) अधिनियम 2023, वर्ष 2025 के संशोधन तथा वर्ष 2026 में बनाए गए नियमों को असंवैधानिक ठहराया है।
इस मामले की सुनवाई किस बेंच ने की?
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने की।
अदालत ने आगे नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में क्या निर्देश दिया है?
उच्च न्यायालय ने दोनों विश्वविद्यालयों में यूजीसी विनियम 2018 के तहत नए सिरे से कुलपति चयन प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·41 मिनट पहले

यह फैसला उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और केंद्र-राज्य प्रशासनिक नियंत्रण के बीच चल रहे टकराव में एक बड़ा मील का पत्थर है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा यूजीसी के वर्ष 2018 के नियमों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना यह स्पष्ट करता है कि शैक्षणिक नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप को केंद्रीय मानकों के जरिए सीमित किया जा सकता है। सुक्खू सरकार के इस कानून के रद्द होने से अब यह तय हो गया है कि पालमपुर और सोलन के इन दोनों विश्वविद्यालयों में भविष्य की चयन प्रक्रिया पूरी तरह से विनियामक मानकों के अनुरूप होगी, जिससे राज्य सरकारों के लिए अकादमिक मामलों में मनमाने संशोधनों की गुंजाइश काफी हद तक कम हो जाएगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·41 मिनट पहले

यह कानूनी झटका केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि विधि और संवैधानिक सीमाओं का स्पष्ट उल्लंघन है। अदालत द्वारा अधिनियम और नियमों को 'शुरुआत से ही शून्य' घोषित करना यह रेखांकित करता है कि वैधानिक प्रक्रिया में यूजीसी के केंद्रीय मानकों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अब जब उच्च न्यायालय ने सख्त निर्देश दे दिए हैं, तो दोनों विश्वविद्यालयों में नई चयन प्रक्रिया की कानूनी वैधता को लेकर सरकार पर कड़ी निगरानी बनी रहेगी और भविष्य की नियुक्तियों में न्यायिक नजीर का यह मामला एक कड़ा कानूनी मानक तय करेगा।

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