राजस्थान की राजधानी जयपुर में प्राथमिक बाल विकास और शुरुआती शिक्षा की बुनियादी व्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। शहर के मध्य में स्थित पार्वती नगर इलाके में 3 से 6 साल के छोटे बच्चों के लिए चलने वाला आंगनबाड़ी केंद्र महज छह फीट के एक छोटे से कियोस्क में संचालित किया जा रहा है। आमतौर पर जिस आकार के कियोस्क में पान या छोटे-मोटे सामान की दुकान चलती है, वहां दस छोटे बच्चों को बैठाकर पढ़ाया जा रहा है और उनका खाना भी तैयार किया जा रहा है।
एक ही छोटी दुकान में रसोई, क्लास और बच्चों का बैठना
पार्वती नगर के इस आंगनबाड़ी केंद्र में जगह इतनी सीमित है कि वहां जरूरी रजिस्टर और पोषाहार का सामान रखने के बाद एक या दो वयस्कों के खड़े होने की जगह भी नहीं बचती। इसके बावजूद यहां हर दिन करीब दस मासूम बच्चे एक-दूसरे से सटकर बैठने को मजबूर हैं। इसी छह फीट के संकरे कमरे के भीतर बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए खेल आयोजित करने की कोशिश की जाती है और उन्हें शुरुआती अक्षर ज्ञान भी दिया जाता है। कमरे के अंदर पैर रखने की जगह न होने के कारण आंगनबाड़ी सहायिका को बाहर गली में खड़े होकर बच्चों पर निगरानी रखनी पड़ती है।
आंगनबाड़ी सहायिका ने बताया कि बच्चों के आने से ठीक पहले इसी छोटी दुकान के भीतर उनका खाना पकाया जाता है। इसके बाद बच्चों को उसी जगह पर खाना खिलाया जाता है और वहीं पढ़ाना भी पड़ता है। इतने छोटे और घुटन भरे स्थान में बच्चों के खेलकूद और सहज गतिविधि की कोई गुंजाइश नहीं बचती, जिससे उनके स्वाभाविक मानसिक विकास पर भी असर पड़ रहा है।
महज 750 रुपये का सरकारी किराया है बदहाली की मुख्य वजह
राजधानी जयपुर जैसे महंगे शहर में इस तरह की दयनीय स्थिति में आंगनबाड़ी केंद्र चलने के पीछे सरकारी नियमों की लाचारी सामने आई है। सहायिका के मुताबिक सरकार की तरफ से शहरी क्षेत्रों में आंगनबाड़ी केंद्र का भवन किराए पर लेने के लिए हर महीने महज 750 रुपये का किराया दिया जाता है। जयपुर के किसी भी इलाके में 750 रुपये प्रति माह के बजट में इससे बड़ी या बेहतर जगह मिलना पूरी तरह असंभव है। यही कारण है कि व्यवस्थापकों को लोहे या टीन के छोटे से कियोस्क में केंद्र चलाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी अधिक विकट है, जहां राज्य सरकार की ओर से भवन किराए के मद में केवल 200 रुपये प्रति माह दिए जाते हैं। इतनी मामूली रकम में गांव या शहर कहीं भी बच्चों के बैठने लायक एक सुरक्षित और हवादार कमरा मिलना नामुमकिन साबित हो रहा है। जब राज्य की राजधानी में शासन-प्रशासन की नाक के नीचे यह हाल है, तो दूर-दराज के इलाकों में आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
राजस्थान में 11 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्र किराए के भवनों में
पूरे राजस्थान में बुनियादी बाल देखभाल और पोषण के लिए कुल 63,000 आंगनबाड़ी केंद्र पंजीकृत हैं। इन कुल केंद्रों में से 11,500 आंगनबाड़ी केंद्र अपने खुद के सरकारी भवनों के बिना किराए की जगहों पर संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा राज्य भर में 3,284 आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन बेहद जर्जर और खतरनाक हालत में पहुंच चुके हैं, जहां बच्चों को बैठाना जोखिम भरा बना हुआ है।
स्कूलों की स्थिति भी चिंताजनक: झोपड़ी और लोहे के पिंजरे में पढ़ाई
राजस्थान में केवल आंगनबाड़ी केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राथमिक और सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे का बुरा हाल है। राज्य के बाड़मेर जिले के आजाद नगर में सरकारी स्कूल किसी पक्के भवन के बजाय एक साधारण झोपड़ी में चलता हुआ पाया गया है। वहीं खुद राजधानी जयपुर के एक सरकारी स्कूल को लोहे के पिंजरे जैसी संरचना में चलाया जा रहा है, जहां नन्हे बच्चों को आसपास फैले कचरे की बदबू और नशेड़ियों के जमावड़े के बीच पढ़ाई करने को मजबूर होना पड़ रहा है। ये सभी उदाहरण राज्य में शिक्षा और बाल कल्याण व्यवस्था के जमीनी संकट को उजागर करते हैं।





















