सनातन परंपरा में प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। यह पावन तिथि विघ्नहर्ता भगवान गणेश की उपासना के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। जहां शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है, वहीं कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। सावन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी के नाम से जाना जाता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर प्रथम पूज्य देव गणेश जी की आराधना करते हैं। मान्यता है कि गजानन संकष्टी पर विधि-विधान से पूजा अर्चना करने से जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है।
गजानन स्वरूप का धार्मिक महत्व और अर्थ
भगवान गणेश के अष्टविनायक स्वरूपों में गजानन रूप का विशेष स्थान है। गजानन शब्द दो शब्दों के योग से बना है, जिसमें गज का तात्पर्य हाथी से है और आनन का अर्थ मुख होता है। इस प्रकार गजानन का शाब्दिक अर्थ गज के मुख वाले देव है। सावन माह की इस संकष्टी चतुर्थी पर भगवान श्री गणेश के इसी विशिष्ट गजानन स्वरूप का पूजन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जो भी भक्त निष्ठापूर्वक इस दिन व्रत का पालन करते हैं और गणेश जी की आराधना करते हैं, उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा कार्यों में आ रही बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।
गजानन संकष्टी चतुर्थी 2026 की तिथियां और शुभ मुहूर्त
पंचांग की गणना के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का शुभारंभ 1 अगस्त को प्रातः 11 बजकर 7 मिनट पर हो रहा है। वहीं, इस चतुर्थी तिथि का समापन 2 अगस्त को प्रातः 11 बजकर 15 मिनट पर होगा। इस पवित्र दिन पर पूजा-अर्चना के लिए अनेक शुभ मुहूर्त बन रहे हैं।
दिनभर के प्रमुख शुभ मुहूर्तों का विवरण इस प्रकार है
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:47 बजे से प्रातः 05:31 बजे तक।
- प्रातः संध्या मुहूर्त: प्रातः 05:09 बजे से प्रातः 06:16 बजे तक।
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:19 बजे से दोपहर 01:11 बजे तक।
- चंद्रोदय समय: संकष्टी चतुर्थी के दिन रात्रि 9 बजकर 43 मिनट पर चंद्रमा का उदय होगा।
गजानन संकष्टी चतुर्थी की संपूर्ण पूजा विधि
संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को शास्त्रों में वर्णित पूजन विधि का पालन करना चाहिए। इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है
- प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त हों और स्नान करने के पश्चात स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
- इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष खड़े होकर हाथ में थोड़ा जल और अक्षत लेकर पूरी निष्ठा से व्रत का संकल्प लें।
- घर के पूजा स्थल पर या उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण में एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर साफ लाल रंग का वस्त्र बिछाएं।
- चौकी पर भगवान गणेश जी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें।
- गणेश जी को रोली, अक्षत, दूर्वा, मोदक, लड्डू, मौसमी फल और लाल पुष्प श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
- प्रतिमा के समक्ष गाय के घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
- भगवान गणेश के सामने बैठकर गणेश चालीसा और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ करें। इसके उपरांत 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का 108 बार जाप करें।
- मंत्र जाप के बाद विघ्नहर्ता गणेश जी की भावपूर्ण आरती करें।
- रात्रि में 9 बजकर 43 मिनट पर चंद्रमा के दर्शन होने पर एक पात्र में जल लेकर उसमें थोड़ा दूध, रोली और अक्षत मिलाएं तथा चंद्र देव को अर्घ्य प्रदान करें।
- चंद्र देव की पूजा और अर्घ्य समापन के पश्चात ही भगवान गणेश के प्रसाद से व्रत का पारण करें।



















