उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर रामपुर की खानपान परंपराओं में यहां का प्रसिद्ध ब्राउन पेड़ा एक विशेष स्थान रखता है। वर्ष 1965 से लगातार तैयार किया जा रहा यह पारंपरिक मिष्ठान आज छह दशकों के बाद भी अपने मूल स्वाद और पहचान को पूरी तरह बरकरार रखे हुए है। त्योहारों के मौसम में जहां बाजार में कई तरह की आधुनिक मिठाइयां उपलब्ध होती हैं, वहीं रामपुर के इस पारंपरिक पेड़े की मांग देश ही नहीं बल्कि विदेश में बसे रामपुर के निवासियों के बीच भी बनी रहती है। लोग जब भी रामपुर आते हैं, तो इस स्वाद को अपने साथ ले जाना कभी नहीं भूलते। इस खास मिठाई की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी, शुद्ध खोया और धीमी आंच पर पकाने की पारंपरिक कला है, जिसे अब आप अपने रसोईघर में भी आसानी से तैयार कर सकते हैं।
60 साल पुराना इतिहास और रामपुर की खास सांस्कृतिक पहचान
रामपुर में इस विशेष ब्राउन पेड़े के निर्माण की शुरुआत लगभग 60 वर्ष पूर्व हुई थी। समय के साथ खाद्य पदार्थों को बनाने की तकनीक में भारी बदलाव आए हैं, परंतु इस पेड़े की निर्माण प्रक्रिया आज भी उसी पारंपरिक ढर्रे पर चल रही है। यही कारण है कि दशकों पुराना प्रामाणिक स्वाद आज भी हर बाइट में महसूस होता है। मुख्य रूप से त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और मांगलिक अवसरों पर इस मिठाई की मांग में भारी वृद्धि दर्ज की जाती है। रामपुर से बाहर रहने वाले प्रवासी जब भी अपने गृह नगर लौटते हैं, तो वापसी में इस पेड़े के डिब्बे पैक करवाकर ले जाना अपनी यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा मानते हैं।
ताजा भैंस के दूध से तैयार खोया ही है असली स्वाद का आधार
इस प्रामाणिक पेड़े की मिठास का असली रहस्य इसके प्रमुख घटक खोए की गुणवत्ता में निहित है। पेड़ा तैयार करने के लिए किसी भी बाजारू मावे के बजाय केवल ताजा सामने निकाले गए भैंस के दूध से बने खोए का उपयोग किया जाता है। स्थानीय दुकान संचालक मुमताज के अनुसार, पेड़े के अंतिम स्वाद का निर्धारण शक्कर या भुनाई से पहले ही हो जाता है, जब दूध की शुद्धता की जांच की जाती है। यदि दूध उच्च गुणवत्ता का और शुद्ध वसा युक्त होगा, तो उससे निर्मित खोया भी स्वाभाविक रूप से समृद्ध और दानेदार बनेगा। यही कारण है कि निर्माण की शुरुआत से ही दूध के मापदंडों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जो इसे आम बाजारू मिठाइयों से एकदम अलग बनाता है।
मावे और शक्कर का सटीक अनुपात
दूध से शुद्ध खोया तैयार हो जाने के पश्चात पेड़ा बनाने के मुख्य चरण की शुरुआत होती है। इस रेसिपी में सामग्री का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, हर पांच किलो शुद्ध मावे में ठीक एक किलो शक्कर मिलाई जाती है। शक्कर की यह मात्रा किसी अंदाज पर निर्भर नहीं होती, बल्कि पूरी तरह से तय पैमाने पर आधारित होती है। मुमताज बताते हैं कि यदि मिश्रण में शक्कर की मात्रा जरा सी भी बढ़ा दी जाए, तो मावे का प्राकृतिक स्वाद दब जाता है और पेड़े का पारंपरिक संतुलन बिगड़ जाता है। इसी निर्धारित अनुपात के कारण पेड़े में अत्यधिक मिठास के बजाय एक संतुलित और सोंधा स्वाद बना रहता है।
धीमी आंच पर भुनाई और खास रंग-बनावट
सामग्री के सही मिश्रण के बाद पकाने की तकनीक का नंबर आता है, जो इस मिठाई को इसका विशिष्ट रूप और स्वाद प्रदान करती है। मावे और शक्कर के मिश्रण को कड़ाही में रखकर अत्यंत धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए भुना जाता है। इस प्रक्रिया में जल्दबाजी की कोई गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि तेज आंच पर मावा जल सकता है और उसका स्वाद कड़वा हो सकता है। मिश्रण को तब तक पकाया जाता है जब तक कि मावा अपना प्राकृतिक तेल न छोड़ दे और उसका रंग बदलकर सुंदर हल्का ब्राउन न हो जाए। पकने के बाद इसे ठंडा करके आकार दिया जाता है और ऊपर से बारीक पिसी हुई चीनी का छिड़काव किया जाता है। हाथ में लेते ही इसकी नरम बनावट का एहसास होता है और मुंह में रखते ही यह आसानी से घुलने लगता है।
व्रत के लिए उपयुक्त और 15 दिनों की शेल्फ लाइफ
रामपुर के इस ब्राउन पेड़े की एक और बड़ी खासियत यह है कि इसे धार्मिक व्रत और उपवास के दौरान भी बिना किसी झिझक के खाया जा सकता है। चूंकि यह केवल शुद्ध दूध के मावे और शक्कर से निर्मित होता है, इसलिए यह उपवास के नियमों के अनुकूल है और उपवास के समय शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के साथ मिठास की कमी को भी पूरा करता है। इसके अलावा, इसकी शेल्फ लाइफ भी काफी अच्छी होती है। यदि इसे सही तरीके से पकाकर किसी एयरटाइट डिब्बे में बंद करके फ्रिज में रखा जाए, तो यह करीब 15 दिनों तक पूरी तरह ताजा और खाने योग्य बना रहता है। इस वजह से त्योहारों से कई दिन पहले भी इसे बनाकर सुरक्षित रखा जा सकता है।



















