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50 साल से एक ही स्वाद: छपरा की इस दुकान का कलाकंद अब दुबई तक पहुंच रहा हैखानपान
3 घंटे पहले· 2

50 साल से एक ही स्वाद: छपरा की इस दुकान का कलाकंद अब दुबई तक पहुंच रहा है

बिहार के छपरा जिले में 50 साल पुरानी शंभू मिष्ठान भंडार का कलाकंद अपनी शुद्धता और स्वाद के लिए मशहूर है, जिसकी मांग अब दुबई तक पहुंच चुकी है.

रिया मेननरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता 2 मिनट पढ़ें AI के लिए
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बिहार के छपरा जिले में एक ऐसी मिठाई की दुकान है, जिसका कलाकंद खाने के लिए लोग सिर्फ आसपास के गांवों से नहीं, बल्कि दुबई तक से ऑर्डर भेजते हैं. यह दुकान गरखा प्रखंड के बसंत बाजार में है और करीब 50 साल से यहां का कलाकंद अपने खास स्वाद के लिए मशहूर है.

50 साल से चला आ रहा एक ही परिवार का हुनर

इस दुकान का नाम शंभू मिष्ठान भंडार है. इसकी शुरुआत शंभू प्रसाद ने की थी और आज इसे उनके बेटे बबलू प्रसाद और पोते मिलकर संभाल रहे हैं. यानी यह अब दूसरी पीढ़ी के हाथों में है, लेकिन मिठाई का स्वाद पहले जैसा ही बना हुआ है. दुकान की उम्र 50 साल से ज्यादा हो चुकी है, फिर भी न रेसिपी बदली, न सामग्री की क्वालिटी में कोई कमी आई.

कोयले की आंच पर तैयार होता है असली खोवा

बबलू प्रसाद बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों से शुद्ध दूध मंगाया जाता है और उसी दूध से कोयले की आग पर खोवा तैयार किया जाता है. लोगों के सामने ही खोवा निकाला जाता है, ताकि किसी तरह का शक न रहे. इस खोवे में इलायची, किशमिश और काजू मिलाकर कलाकंद को उसका खास स्वाद दिया जाता है. उनके मुताबिक गांव से आसानी से मिलने वाला शुद्ध दूध ही इस मिठाई की असली जान है, और यही वजह है कि शुद्धता में कभी कोई कमी नहीं आती.

पुराने ग्राहक आज भी वहीं लौटकर आते हैं

ग्राहक जयप्रकाश सिंह बताते हैं कि वे बचपन में अपने पिता के साथ यहां कलाकंद खाने आते थे और आज भी उसी दुकान से मिठाई खरीदते हैं. उनके मुताबिक पहले शंभू प्रसाद खुद मिठाई बनाया करते थे, अब यह जिम्मेदारी उनके बेटे बबलू प्रसाद और पोते ने संभाल ली है, लेकिन स्वाद में कोई फर्क नहीं आया. जयप्रकाश सिंह का कहना है कि दूर-दूर से लोग सिर्फ इस दुकान का कलाकंद खाने के लिए यहां पहुंचते हैं और आज भी मिठाई में वही शुद्धता बरकरार है.

दुबई तक पहुंच रही है छपरा की मिठास

बबलू प्रसाद के मुताबिक जिले के कोने-कोने से लोग यहां मिठाई खाने आते हैं, लेकिन इसकी लोकप्रियता सिर्फ छपरा तक सीमित नहीं है. दुबई में रहने वाले लोग भी यहां से कलाकंद खरीदकर ले जाते हैं. उन्होंने बताया कि एक दिन पहले ही यहां से 3 किलो कलाकंद खरीदकर लोग दुबई ले गए हैं.

छोटी दुकान, लेकिन भरोसा बड़ा

बबलू प्रसाद कहते हैं कि उनकी दुकान भले छोटी है, लेकिन सफाई और शुद्धता को लेकर कभी कोई समझौता नहीं किया जाता. उनका दावा है कि बड़ी-बड़ी दुकानों में भी ऐसी शुद्ध और स्वादिष्ट मिठाई मिलना मुश्किल है. यही वजह है कि पुराने ग्राहकों का भरोसा आज भी इस दुकान पर बना हुआ है और नई पीढ़ी के ग्राहक भी लगातार जुड़ रहे हैं.

इसका आप पर असर

  • भारत में: यह कहानी दिखाती है कि गांव-कस्बों की पुरानी और शुद्ध सामग्री वाली मिठाई की दुकानें आज भी बड़े ब्रांड्स को टक्कर दे सकती हैं और परिवार का पुश्तैनी कारोबार पीढ़ियों तक टिकाऊ बन सकता है.
  • छपरा में: गरखा प्रखंड के बसंत बाजार स्थित शंभू मिष्ठान भंडार जाने वाले लोग अब भरोसे के साथ शुद्ध और स्वादिष्ट कलाकंद खरीद सकते हैं, जिसकी क्वालिटी सालों से एक जैसी बनी हुई है.

प्रेरणा और सीख

  • एक ही चीज़ को बेहतरीन तरीके से करते रहना: शंभू प्रसाद और अब बबलू प्रसाद ने रेसिपी या क्वालिटी से समझौता किए बिना करीब 50 साल तक एक ही स्वाद बनाए रखा, जिससे ग्राहकों का भरोसा कभी नहीं टूटा.
  • शुद्धता और पारदर्शिता से भरोसा बनता है: ग्राहकों के सामने ही कोयले की आंच पर खोवा तैयार करना दिखाता है कि पारदर्शी तरीके से काम करने से ग्राहक बिना किसी शक के दोबारा लौटते हैं.
  • पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाना: पिता से बेटे और अब पोते तक दुकान का हुनर पहुंचना बताता है कि पुश्तैनी कारोबार को सही तरीके से आगे बढ़ाया जाए तो वह पीढ़ियों तक टिक सकता है.
  • स्थानीय संसाधनों का सही इस्तेमाल: गांव से आसानी से मिलने वाले शुद्ध दूध का इस्तेमाल करके एक छोटी सी दुकान ने अपनी पहचान दुबई जैसे शहर तक पहुंचा दी.

सवाल-जवाब

यह मशहूर कलाकंद की दुकान कहां है?
यह दुकान बिहार के छपरा जिले के गरखा प्रखंड अंतर्गत बसंत बाजार में है.
दुकान का नाम क्या है और यह कितनी पुरानी है?
दुकान का नाम शंभू मिष्ठान भंडार है और यह करीब 50 साल पुरानी है.
दुकान की शुरुआत किसने की थी और अब कौन चला रहा है?
दुकान की शुरुआत शंभू प्रसाद ने की थी, और अब इसे उनके बेटे बबलू प्रसाद और पोते मिलकर चला रहे हैं.
कलाकंद कैसे तैयार किया जाता है?
ग्रामीण इलाकों से शुद्ध दूध लाकर कोयले की आग पर खोवा निकाला जाता है, जिसमें इलायची, किशमिश और काजू मिलाए जाते हैं.
यह मिठाई दुबई तक कैसे पहुंचती है?
दुबई में रहने वाले लोग यहां से कलाकंद खरीदकर ले जाते हैं, हाल ही में एक ही दिन में 3 किलो कलाकंद दुबई ले जाया गया था.
ग्राहक इस दुकान की मिठाई पर भरोसा क्यों करते हैं?
ग्राहकों का कहना है कि दशकों पहले जो स्वाद और शुद्धता मिलती थी, वही आज भी बरकरार है, इसलिए पुराने ग्राहक बार-बार यहीं लौटते हैं.
रिया मेनन
लेखक के बारे मेंरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता अमृतसर
विशेषज्ञताफूड लेखन, रेसिपी, पाककला रुझान, कुकिंग टिप्स, रेस्तराँ रिव्यू, वैश्विक व्यंजन, घरेलू खाना, फूड संस्कृति, लाइफस्टाइल फूड कंटेंट, पाकशास्त्र

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला के रुझानों, रेसिपी, रेस्तराँ संस्कृति, फूड रिव्यू और खाना बनाने की टिप्स को कवर करती हैं। वे फूड प्रेमियों और घरेलू रसोइयों के लिए दिलचस्प सामग्री साझा करती हैं।

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला पत्रकारिता, रेसिपी विकास, फूड संस्कृति, रेस्तराँ रुझानों और लाइफस्टाइल कुकिंग कंटेंट में विशेषज्ञता रखती हैं। वे रोज़मर्रा के घरेलू खाने के विचारों और पारंपरिक रेसिपी से लेकर आधुनिक फ़्यूज़न व्यंजनों, फूड नवाचारों और डाइनिंग अनुभवों तक — सब कुछ कवर करती हैं। सहज और दिलचस्प कहानी कहने पर ज़ोर देते हुए रिया वैश्विक व्यंजनों, मौसमी रेसिपी, खाना बनाने की तकनीकों और फूड से जुड़े लाइफस्टाइल रुझानों की पड़ताल करती हैं। उनका काम पाठकों को नए व्यंजन खोजने, अपनी कुकिंग बेहतर बनाने और फूड व पाकशास्त्र की बदलती दुनिया से अपडेट रहने में मदद करता है।

पूरा प्रोफ़ाइल देखें ↗
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